#जीवन संवाद : मन का पोषण!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 1:29 PM IST
#जीवन संवाद : मन का पोषण!
जीवन संवाद

हम जब तक मन तक ‘विचार’ पहुंचाने वाली पाइप लाइन को ठीक नहीं करेंगे, मन का पोषण संभव नहीं. मन की सफाई सतह पर करने से ही बात नहीं बनने वाली. इसके लिए गहरे उतरना होगा. बिना डरे, झिझके! अक्सर हम अपने ही मन में उतरने से डरने लगते हैं.

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जीवन के लिए हमने जो चुना, उसके अनुरूप ही खुद को तैयार करना होगा. अपनी चाहत को इच्छा बनाते समय सजग रहने की जरूरत है. हम अक्सर दूसरों को बर्दाश्त करने की बात कहते रहते हैं, लेकिन किसी और को समझने, सहने की तुलना में अपने को सहना कहीं अधिक कठिन होता है.

हम दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप को लेकर अधिक गंभीर हैं. स्वयं हमारे भीतर क्या चल रहा है, इस ओर ध्यान कम जाता है. आपने सुना ही होगा, अधिकांश लोग कहते रहते हैं, मैं अब उसे बर्दाश्त नहीं कर सकता. मेरे सहने की भी सीमा है! यह सीमा क्या है, इसे कैसे तय किया जाए. इस पर हम कभी चिंतन नहीं करते. हमारी जीवनशैली कुछ ऐसी हो गई है कि हमने खुद को स्वयं से दूर कर दिया. मैं क्या हूं, मैं क्या कर रहा हूं. यह प्रश्न हमें हमेशा सजग बनाए रखते हैं. जब कभी हम उन जीवन मूल्यों से दूर जाते हैं, जिनसे जीवन की जड़ें जुड़ी हैं, तो यही प्रश्न हमारे कवच कुंडल बन जाते हैं.



#जीवन संवाद : प्रेरणा कहां से आती है!

हमारे बीच तनाव का कारण क्या है? तनाव हवा में पैदा नहीं होता. वह किसी न किसी की जगह लेता है. वह जगह लेता है, प्रेम, स्नेह और आत्मीयता की. उस आत्मीयता की जिसकी कमी से हमारी आत्मा रूखी हो चली है.
सर्दियों के दिनों में त्वचा रूखी हो जाती है, तो आप क्रीम का सहारा लेते हैं. दूसरे उपाय करते हैं. गर्मी में लू से बचने के भी अनेक तरीके हैं. इस तरह आप पाएंगे कि शरीर के लिए मौसम के अनुकूल, उसकी जरूरत के अनुसार हम उपाय करते रहते हैं, जबकि हमारा मन जो जीवन का सबसे बड़ा आधार है, उसके पोषण, स्नेहन के लिए कोई ठोस उपाय नहीं.

#जीवनसंवाद : दुख सहने की कला!

हम जब तक मन तक ‘विचार’ पहुंचाने वाली पाइप लाइन को ठीक नहीं करेंगे, मन का पोषण संभव नहीं. मन की सफाई सतह पर करने से ही बात नहीं बनने वाली. इसके लिए गहरे उतरना होगा. बिना डरे, झिझके! अक्सर हम अपने ही मन में उतरने से डरने लगते हैं.

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हमें लगता है, कहीं हमारी कोई गलती, चूक हमें ही न दिख जाए. अरे! जब गुण तुम्हारे अपने हैं, दोष किसी और के थोड़े हुए. सब तुम्हारा ही है. अपने ही भीतर गहरे उतरना, एक अभ्यास है. स्वयं को समझने का. अपने को उदार, प्रेमपूर्ण और बेहतर बनाने की दिशा में इससे भला कुछ भी नहीं.

#जीवनसंवाद : जो साथ नहीं हैं! 

कबीर ने कितनी कोमलता से कहा है,
‘ जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ, मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ.’ इसके अनेक अर्थ हैं. इसे यहां स्वयं को समझने, संवाद करने के लिए इसे सार रूप में गहण किया जाना चाहिए.

शिमला से आरती श्रीवास्तव ‘जीवन संवाद’ के बच्चों के बारे में सूत्र से बेहद प्रभावित हैं. वह लिखती हैं, जैसे ही मैंने ‘बच्चे हमसे हैं, हमारे लिए नहीं’ का सूत्र वाक्य अपनाया. बच्चों को लेकर नजरिया ही बदल गया. उनका पालन, मदद करनी है, लेकिन उनसे अपने लिए बदले में ‘देवदार’ सरीखी अपेक्षा नहीं रखनी. हमें जिम्मेदारी का निर्वाह तो करना है, लेकिन बदले में खुद, बच्चों पर अपेक्षा का बोझ नहीं लादना. आत्मा पर यह सबसे गहरा भार होता है.

#जीवनसंवाद : खुद तक वापसी का रास्ता !
जो स्वयं को इससे निकाल ले गए. बचा पाए, उनका मन ही सबसे पोषित, पल्लवित और प्रसन्न है. इसलिए, व्यस्तता को थोड़ा विराम देकर, मन के भीतर गहरे उतरने का प्रयास करें. थोड़ा ठहरने की काशिश करिए. इससे जीवन की गुणवत्ता पर सकारात्मक असर दिखेगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: August 27, 2019, 7:42 AM IST
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