#जीवनसंवाद : किससे कहें!

#जीवनसंवाद : किससे कहें!
#जीवनसंवाद : किससे कहें!

#JeevanSamvad: बहुत जरूरी है कि संवाद को बढ़ाया जाए. बातचीत को निरंतर किया जाए. इससे मन की पीड़ा, अकेलापन और दर्द भीतर दबे नहीं बैठे रहेंगे. जब हम बाहर जाते हैं, तो हमें बेचैनियों को कहने सुनने के नए साथी मिलते हैं. अब इस साथ की गुंजाइश तेज़ी से कम होने वाली है.

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हमारी जिंदगी में तकनीक और सोशल मीडिया कुछ इस तरह से आए मानो शांत शहर में कोई तूफान आ गया. तूफान का अंदाजा नहीं था लेकिन न जाने हवाओं ने कब अपना इरादा ही बदल दिया. हमारे जीवन अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं. बात करते हुए भी हम कहीं और खोए हैं. मिलते हुए भी नहीं मिल रहे! मन और आत्मा तकनीक में ही चिपकते जा रहे  हैं. इसलिए मिलना कहां हो रहा है. मिलने के लिए शांति की गहराई जरूरी है. एक-दूसरे को सुने बिना, साथ कैसे रहेगा!

इसलिए, हमें एक-दूसरे को थोड़ा अधिक समय देने की जरूरत है. जितना भी समय हमारे पास है, उसके हिस्सों का खूबसूरती से उपयोग करना होगा. अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से नियमित संवाद हमें अनेक संकटों से बचा सकता है. संकट का सामना करने की हमारी शक्ति को कई गुना बढ़ा सकता है. दुनिया इस समय एक नाव में बदल गई है. सब एक ही नाव पर सवार हैं. लहरों में नाव डगमगा रही है, इस बीच नाव में छेद हो गया है. छेद को लोग दुरुस्त करने में लगे हैं. उसे ठीक किया ही जा रहा है कि कुछ लोग घबराहट में सोचने लगे हैं कि खुद तैरकर किनारे पर पहुंच जाएंगे. किनारा दिख तो नजदीक रहा है लेकिन है बहुत दूर. वहां साथ तो पहुंचा जा सकता है लेकिन अकेले पहुंचते-पहुंचते दम फूलने का खतरा है.

कोरोना हमें एक बहुत नई किस्म की दुनिया रचने पर मजबूर कर रहा है. इस संकट को दो तरीके से देखा जा रहा है. एक परंपरागत विचार है जो मानता है कि सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाएगा. दूसरे वह लोग हैं जो बता रहे हैं कि दुनिया में अपने नियम कायदे लागू होंगे. इनकी कुछ हद तक शुरुआत भी हो चुकी है.




इस दूसरी वाली दुनिया से ही निकला है 'वर्क फ्रॉम होम'. घर में रहकर दफ्तर का काम करना. जितने भी तरह के काम हो सकते हैं जिनमें शारीरिक शक्ति और मदद की जरूरत नहीं है वह सभी घर से ही करने पर जोड़ दिया जा रहा है. ‌इसके अपने आर्थिक कारण भी हैं. लेकिन सामाजिक कारण इससे कहीं अधिक गहरे हैं. इससे हमारा मिलना जुलना बहुत गहराई से प्रभावित होगा. हम सब अपने अपने लैपटॉप और डिजिटल स्क्रीन के बंदी बनकर रह सकते हैं.



इससे जीवन में नीरसता और अकेलापन तेज़ी से बढ़ सकता है. इसके लिए बहुत जरूरी है कि संवाद को बढ़ाया जाए. बातचीत को निरंतर किया जाए. इससे मन की पीड़ा, अकेलापन और दर्द भीतर दबे नहीं बैठे रहेंगे. जब हम बाहर जाते हैं, तो हमें बेचैनियों को कहने सुनने के नए साथी मिलते हैं. अब इस साथ की गुंजाइश तेज़ी से कम होने वाली है.

इसलिए, हमको इस बात को गंभीरता, तेज़ी से समझने की जरूरत है कि हमारे पास दुख-दर्द को कहने वाले लोग होने ही चाहिए. अगर ऐसे लोगों से किसी भी वजह से संपर्क टूटा है तो उसे जोड़ने का काम करिए. ऐसे लोग नहीं हैं तो उनकी तलाश कीजिए, जिनसे आसानी से, किसी भी वक्त कुछ भी कहा जा सके.


जिनसे कुछ कहते हुए डर न हो, मन में, किसी तरह का! कुछ दिन पहले जीवन संवाद को रायपुर से पाठक सुनीता दुबे ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से उनको लग रहा था कि मन में कुछ घुट रहा है. बात बात में उनका मन खराब हो जाता था. जिंदगी से कुछ ऊब होने लगी थी. उसी समय उनके एक पुराने मित्र ने उन्हें दो सुझाव दिए. पहला उन्होंने कहा तुरंत डॉक्टर के पास चलते हैं.
अच्छा काम यह किया कि सीधे मनोचिकित्सक के यहां गए. मनोचिकित्सक के यहां जाना साहस की बात है. इसको अभी हम सामान्य रूप में ग्रहण नहीं कर पाते. हमें डर लगा रहता है कि लोग हमें पागल न कहने लगें. जबकि किसी के पास फुर्सत ही नहीं हमारा हाल जानने की. इसलिए सुनीता जी ने बहुत अच्छा काम किया. दूसरी सलाह मिली कुछ रचनात्मक और जीवन से जुड़ा पढ़ने की. इसी कड़ी में इंटरनेट पर उनको 'जीवन संवाद' मिला.

उनका कहना है कि अब वह नियमित रूप से इसे पढ़ रही हैं. इससे उनको जीवन के प्रति ऊर्जा और रचनात्मक दृष्टिकोण मिला है. दुख को संभालने की शक्ति मिली है. 'जीवन संवाद' की ओर से उन्हें शुभकामना. उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सलाम. आप सभी से यह अनुरोध दोहराना चाहता हूं कि मन में अगर उलझन खुद ना सुलझा पा रहे हैं. जिंदगी से प्रेम का रस कम हो रहा हो तो इसे टालिए मत क्योंकि यह कभी भी गंभीर खतरा बन सकता है.


किससे कहें का सवाल नहीं होना चाहिए. यह जरूरी तो है लेकिन इतना जरूरी नहीं जिसके लिए अपने जीवन को दांव पर लगा दिया जाए. ऐसे लोगों की तलाश कीजिए जिनसे हम अपना दर्द साझा कर सकें. इससे जीवन को तनाव से लड़ने की शक्ति रोशनी और ऊर्जा मिलेगी! शुभकामना सहित.

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)


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