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#जीवनसंवाद : अदृश्‍य खूंटी से बंधा मन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 24, 2019, 9:27 AM IST
#जीवनसंवाद : अदृश्‍य खूंटी से बंधा मन!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जिंदगी आजाद खयाल है. उसे खूंटियों और रस्‍सियों से मत बांधिए. यह डिप्रेशन और निराशा की ओर ले जाने वाला रास्‍ता है. निर्णय लेने, बदलते समय को समझने में बड़ी बाधा है.

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  • Last Updated: December 24, 2019, 9:27 AM IST
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हमारा मन किन चीजों से बना होता है. ऐसा कौन सा डर है, जिससे हम बिना भयभीत हुए डरते रहते हैं. बचपन से जो सिखाया जाता है वही सीखते हुए हमारी चेतना पर भय की परतें जमती जाती हैं. यह छोटी सी कहानी डर की परतों को अच्छे से समझाती है. मन की गुलामी को अभिव्यक्त करती है. रेगिस्तान में सफर कर रहा काफिला एक सराय पर रुका. काफिले में सौ ऊंट थे. काफिले के लोग बेहद थके थे, उनको बहुत आगे जाना था. सराय तक पहुंचते हुए आधी रात बीत चुकी थी.

सोने से पहले ऊंटों को खूंटी के सहारे रस्सी से बांधना होता था, कहीं ऊंट रात में भटक ना जाएं. काफिले का सरदार परेशान था, क्योंकि 99 ऊंट तो बांध दिए गए थे, लेकिन एक ऊंट को बांधने के लिए खूंटी और रस्सी कम पड़ गई थी. काफिले के लोग सराय के बूढ़े मालिक के पास गए.उससे कहा कि खूंटी और रस्सी दें. बूढ़े मालिक ने न में सिर हिलाते हुए कहा, हमारे पास तो कुछ भी नहीं है. हां, एक तरकीब है.
तुमने जि‍स तरह बाकी ऊंटों को बांधा है, वैसे ही उस एक को भी बांध दो.

सरदार ने कहा ऐसे कैसे बांधें. ऊंट अंधेरे में कहीं निकल गया तो सुबह परेशानी बढ़ जाएगी.
बूढ़े मालिक ने थोड़ा जोर देकर कहा, तुम्हारे बाकी ऊंट भी खूंटी और रस्सी के सहारे नहीं टिके हैं. वह तो उस भय से बंधे हैं, जिनसे बचपन से उन्हें बांधा गया है. वह मन से गुलाम हैं. वह बल से नहीं मन से कमजोर हैं.
सरदार के पास कोई और रास्ता नहीं था. उन्होंने अंतत: उस बूढ़े के कहे अनुसार ऊंट के नजदीक जाकर खूंटी ठोकने का अभिनय किया, गले में रस्सी डालते हुए कहा, कहीं जाना नहीं. ठीक वैसे ही जैसे बाकी ऊंटों से कहा था.

उसके बाद सब जाकर सो गए. सुबह हुई. निकलने का वक्त हुआ. बाकी ऊंटों को खोल दिया गया. उस ऊंट को यह सोचकर नहीं खोला गया कि इसे तो बांधा ही नहीं गया था. सब चलने को तैयार हो गए. बस उस एक ऊंट को छोड़कर. उसे बहुत हिलाया, डुलाया गया गया लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. वह उठने को तैयार ही नहीं था. काफिले का सरदार फिर सराय मालिक के पास गया. उसने कहा, लगता है आप जादूगर हैं. चलकर, ऊंट को उठने के लिए कहिए. उस बुजुर्ग ने कहा, जैसे बांधा था, वैसे ही खोल दो. सरदार ने कहा लेकिन हमने उसे बांधा नहीं था. बुजुर्ग ने कहा, लेकिन बांधे का नाटक तो किया था. अब जाकर वैसा ही नाटक फिर से करो.


बुजुर्ग की बात मानी गई. खूंटी ‘खुलते’ ही ऊंट उठकर खड़ा हो गया. सरदार ने सराय मालिक के पास जाकर उनके प्रति आदर प्रकट किया गया. जीवन का अनुभव समेटे उस व्‍यक्ति ने कहा,
हम सब मन की खूंटी और रस्‍सी से से बंधे होते हैं. सारा डर मन का है. हम अभय से बहुत दूर हैं. जब तक मन से डर नहीं निकलेगा, वह गुलामी की खूंटी से ही बंधा रहेगा.
थोड़ा-थोड़ा अपने मन को टटोलिए. ऐसे कौन-कौन से डर हैं जो आपको जकड़े हुए हैं. जब भी आप कोई निर्णय लेना चाहते हैं, अपने बारे में नौकरी, शादी, प्रेम और संबंधों के बारे में हमेशा आपको मन पर बंधी गुलामी की वही ऊंट वाली खूंटी और रस्‍सी आपका रास्‍ता रोक लेती है. कुछ वक्‍त ऐसी खूंटियों, रस्‍सियों को जरूर द‍ीजिए तो आपको स्‍नेहिल, आत्‍मीय और प्रेम की ओर बढ़ने से रोकती हैं. जिंदगी आजाद खयाल है. उसे खूंटियों और रस्‍सियों से मत बांधिए. यह डिप्रेशन और निराशा की ओर ले जाने वाला रास्‍ता है. निर्णय लेने, बदलते समय को समझने में बड़ी बाधा है.
पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
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First published: December 23, 2019, 9:37 AM IST
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