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#जीवनसंवाद: आइए, अब लौटें!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 13, 2020, 10:57 AM IST
#जीवनसंवाद: आइए, अब लौटें!
#जीवनसंवाद: आइए, अब लौटें!

Jeevan Samvad: अपनी ईएमआई (कर्ज की मासिक किस्‍त) को संभालिए, इससे पहले कि वह आपके मन, दिमाग को दीमक की तरह खोखला कर दे. 'थोड़ा धीरे' को समझिए, इससे सुख गहरा होता है.

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  • Last Updated: January 13, 2020, 10:57 AM IST
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आपको यह बात थोड़ी मुश्किल लग सकती है. कुछ कठिन, अजीब लग सकती है. लेकिन यह हमारी उस जीवनशैली की याद है, जिसे हमने कहीं रास्‍ते में छोड़ दिया है. थोड़ा पीछे की ओर चलिए. हम जीवन में सुविधा का विस्‍तार धीमे, लेकिन सुकून के साथ करते थे. घर में आने वाली चीजों का क्रम इसी के अनुसार होता था. पहले बच्‍चों की किताब, उनके स्‍कूल, जरूरत की चीज आती. यह उस समय की बात है जब टीवी, फ्रि‍ज,सोफा का एक साथ घर में होना बड़ी बात मानी जाती थी. हमारे मध्‍यमवर्गीय परिवार धीरे-धीरे इसकी ओर बढ़ते. जिनके घर टीवी नहीं होता, उनके पड़ोसी इसे दूसरों के साथ साझा करते. जिनके घर फ्रि‍ज नहीं होता, उनकी आइसक्रीम भी प्यार से जमाई जाती.

पड़ोसी के साथ बच्‍चों का रिश्‍ता इतने गहरे प्रेम से जुड़ा था कि उनके घर के बड़ों को अपने घर के बड़ों सरीखा सम्‍मान दिया जाता. उस समय निजता जिसके लिए आज हम प्राइवेसी शब्‍द का अधिक उपयोग करते हैं, नहीं थी. उसके बाद भी परस्‍पर प्रेम और अनुराग के स्‍वर गूंजते रहते थे. सहज विश्‍वास समाज का अटूट हिस्‍सा था.

पड़ोसी के घर, बच्‍चों को छोड़ते समय मन में बच्‍चे का डर तो दूर पड़ोसी की असुविधा तक की बात नहीं होती थी. 'जीवन संवाद' के लेखक ने अपने पड़ोसियों के घर महीनों का वक्‍त गुजारा है. कभी एक पल को मन में यह भाव नहीं आता था कि अब कैसे रहेंगे! हमने घर से फ्लैट, मोहल्‍ले से कॉलोनी की यात्रा में खुद को बहुत बदल लिया. पहले सबका ख्‍याल पहले रहता था. अब केवल अपना ख्‍याल रहता है. जीवन के असली सुख से दूरी यहीं से आरंभ हुई.


अब पड़ोसी, दूसरी कॉलोनी में रहने वाले परिचित में कोई अंतर नहीं बचा. पड़ोसी के घर में हमारी उपस्थिति इतनी असहज हो गई है कि इससे बचने के लिए हमने निजता में दखल, प्राइवेसी जैसे शब्‍द लोकप्रिय कर दिए. हमारे साथ एक मजेदार घटना हुई. कुछ समय पहले हम एक नई कॉलोनी में रहने गए. वहां कुछ दिन रहते हुए बीते थे कि सामने वाले फ्लैट से पड़ोसी ने रात ग्‍यारह बजे दरवाजे पर दस्‍तक दी. उनके घर पानी नहीं आ रहा था. बच्‍चों को पानी की तुरंत जरूरत थी.

हमने उनका स्‍वागत किया. लेकिन मन में एक छोटा सवाल आया. उनके पड़ोसी पांच बरस से एक ही हैं, लेकिन उनने हमें क्‍यों चुना! हमें पता चला कि दोनों परिवार आज तक एक-दूसरे के घर कभी गए ही नहीं. इतनी सीमित बातचीत है कि अमेजॉन से सामान लाने वाला तो शायद घर के भीतर आ सकता है, लेकिन पड़ोसी नहीं!

आइए, अब जरूरतों को इकट्ठा करने की बात करते हैं. पहले हमें जिन चीजों की दरकार होती थी, उन्‍हें धीमे-धीमे जुटाते. इसका असर यह होता कि हमारे पास कर्ज कम होता. तब पर्सनल लोन/ क्रेडिट कार्ड/घूमने/ हनीमून के लिए मिलने वाले कर्ज की बात बाजार में नहीं थी. जीवन का सहज नियम था, पहले बचत उसके बाद खर्च.

दस-पंद्रह बरस वाला हमारा जीवन अब कितना पुराना लगने लगा है. अब तो जरूरत अभी पूरी होनी चाहिए. भले ही हमारे बटुए में पैसा हो या न हो. पहले बचत हमारी जिंदगी का हिस्‍सा थी. अब खर्च हमारी प्रतिष्‍ठा बन गया है.पिछले पांच बरस में दिल्‍ली, मुंबई, नोएडा, गुरुग्राम, जयपुर, इंदौर, रांची से आ रही खबरों का अध्‍ययन बताता है कि डिप्रेशन, गहरी चिंता और आत्‍महत्‍या का कारण ऐसी जरूरतों को जीवनशैली बनाते जाना है, जिनसे केवल झूठी प्रतिष्‍ठा हासिल होती है. मन हमेशा दूसरे के पास क्‍या है, इसमें ही अटका रहता है.

मन अपनी कस्‍तूरी को छोड़कर दूसरों के आकर्षण में इतना रमा कि हम अपनी महक ही भूल गए. आइए, अब लौटें उस सुख की ओर जो भीतर से उपजता है. अपने को दीन-हीन और कमजोर मानना छोड़‍िए. अपनी उस जीवनशक्ति पर यकीन करिए, जो आपकी रगों में दौड़ती है. उस पर नहीं जो दुनिया आपको सिखाती रहती है.


अपनों से प्रेम करिए. तभी बच्‍चे प्रेम करना सीखेंगे. उन्‍हें जिंदगी के लिए तैयार करने का यह अर्थ नहीं है कि हम उन्‍हें मनुष्‍य की जगह मशीन बनाने में जुट जाएं. अपनी ईएमआई (कर्ज की मासिक किस्‍त) को संभालिए, इससे पहले कि वह आपके मन, दिमाग को दीमक की तरह खोखला कर दे. थोड़ा धीरे को समझिए, इससे सुख गहरा होता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: January 9, 2020, 12:27 PM IST
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