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#जीवनसंवाद: मन के भ्रम!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 17, 2019, 9:11 AM IST
#जीवनसंवाद: मन के भ्रम!
जीवन संवाद

Jeevan Samvad: जब हम जिंदगी में अनुभव की जगह धारणा को देते हैं, तो हम स्‍वयं को ऐसी बाड़ के भीतर बांध रहे होते हैं, जो बाहर से आने वाली ताजी हवा को रोकने का काम करती है.

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  • Last Updated: December 17, 2019, 9:11 AM IST
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हमारे एक मित्र के घर के सामने सुंदर, लुभावना नन्हा फलदार जंगल है. आंवला, बेल, गलगल, अमरूद की संगत के लिए देवदार, पीपल, कदम, नीम मौजूद हैं. चारों ओर बिखरे चंपा, चमेली, गुड़हल, गुलाब, बोगन बेलिया, डहेलिया दिमाग में चल रही उथल-पुथल को शांत करने के लिए सुरम्य वातावरण तैयार करते हैं. मैं जब भी इनके घर जाता कहता, चलो हरियाली की ओर चलते हैं. मेरे मित्र हमेशा कहते, वहां बहुत से नियम-कायदे हैं. जाना आसान नहीं है.

रविवार को उनके यहां जाना हुआ. इस बार मैंने जिद पकड़ ली. इतनी सुंदर जगह है, आज वहां चलना ही है. हम तीन-चार लोग वहां पहुंच गए. पता चला यह जगह सबके लिए सुलभ है. विशेषकर मेरे मित्र की कॉलोनी में रहने वाले लोगों के लिए. इस उपवन में आने-जाने के कोई नियम नहीं हैं. आप सरलता से प्रकृति की गोद में कुछ समय बिता सकते हैं. मेरे मित्र के परिवार में उनके माता-पिता भी हैं, जिनके लिए यह जगह शांति और सुकून देने वाली है. वह लगभग तीन वर्ष से वहां पर रह रहे हैं, गए कल पहली बार.

हमें वहां मिले उपवन के प्रबंधक ने शिकायती लहजे में मित्र से कहा, 'यह तो बनाया ही आपकी कॉलोनी के लिए है. इतने दिनों से आप यहां रह रहे हैं, तो आए क्यों नहीं! यहां तो देश के दूर-दराज इलाकों से लोग आते रहते हैं. न जाने कितने बरस बाद शुद्ध, स्वादिष्ट अमरूद भी हमें खाने को मिले.

यह एक छोटा-सा उदाहरण है जो हमें बताता है कि हम किस तरह अपने मन में चीजों, व्यक्तियों के लिए भ्रम पैदा कर लेते हैं. अपनी ओर से धारणा बना लेते हैं. एक कांटेदार बाड़ से अपनी भावना, स्नेह और आत्मीयता को घेर लेते हैं. इसमें जहां एक तरफ सामान्य सहज भावना का प्रवेश वर्जित हो जाता है, वहीं दूसरी ओर हम मन को सहज आनंद से वंचित कर लेते हैं.

सुख, प्रसन्नता से जीवन जीने के लिए बहुत सारी नहीं, बस कुछ चीजों का ही ख्याल रखना होता है. हमें किन चीजों की इच्छा रखनी है. हमारी आस्था कहां होनी चाहिए. वह कौन से काम हैं, जो नहीं करने हैं. कुल जमा जिंदगी का हिसाब यही है.


जब हम जिंदगी में अनुभव की जगह धारणा को दे देते हैं, तो असल में हम खुद को ऐसी बाड़ के भीतर बांध रहे होते हैं, जो बाहर से आने वाली ताजी हवा को रोकने का काम करती है.
जीवन के इसी मोड़ पर संवाद की भूमिका सबसे जरूरी हो जाती है. संवाद का यही काम है कि वह उन सभी मानसिक बाधाओं को रोकने का काम करे, जो मन में स्नेह, आत्मीयता को बांधने का काम करती हैं. मन को हमें बांध नहीं, नदी की तरह रखना है.

बांध में पानी का वह स्वाद नहीं मिलता, जो नदी में होता है. जिंदगी के रंग देने के लिए जरूरी है, उसकी गति न रुके. बहने से ही उसे ऊर्जा, आनंद और मिठास मिलती है.


जिंदगी पर नदी के नियम लागू होते हैं, बांध के नहीं. इसलिए हमें बहना सीखना है. रुकना नहीं. थमना नहीं. खुद को दिखाए, बताए गए भ्रम से हम जितना अधिक दूर रख पाएंगे, जिंदगी का उतना अधिक स्वाद ग्रहण कर पाएंगे.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 16, 2019, 11:31 AM IST
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