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#जीवनसंवाद: पुरुष वाला मन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 5:01 PM IST
#जीवनसंवाद: पुरुष वाला मन!
Jeevan Samvaad

Jeevan Samvad: रिश्ते में स्त्री और पुरुष वाले मन का भेद कभी उन्हें उस सुख के तट पर नहीं ले जाएगा, जिसके लिए उन्होंने 'साथ' रहना चुना है.

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  • Last Updated: November 25, 2019, 5:01 PM IST
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बात अजीब लग सकती है. क्या मन का भी स्त्रीलिंग, पुलिंग होता है! मन जिसके शरीर में रहता है, उसके जैसा हो जाता है. अथवा मन तो केवल मन होता है. हमारा मन अपने समाज, परिवार और परिवेश से खाद, पानी ग्रहण करता है. हम सांस्कृतिक रूप से पुरुषवादी समाज रहे हैं. पुरुषत्व की चेतना हमारे विचार में गहराई से समाई है. पुरुष होने का दंभ इतना गहरा है कि पुरुष वाले मन कुछ अजीब से अहंकार, श्रेष्ठता की सतही भावना से भरे हुए हैं.

अपने देश में पुरुष होने से इतना गहरा अंतर पड़ता आया है कि आधुनिक समय की ओर बढ़ने के बावजूद हम दुनिया के साथ कदमताल में बहुत पीछे हैं. यह कैसे खत्म होगा! इसके लिए अंतर्मन की गहरी यात्रा, परंपरावादी विचार से मुक्ति जरूरी है. बेटे-बेटी को जब तक हम केवल संतान नहीं मानेंगे तब तक यह दूर नहीं होगा. हम सबके बीच अनेक ऐसे मित्र हैं, जिनके बाह्य मन में तो बराबरी का भाव रहता है, लेकिन अंतर्मन में अभी भी पुरुष वाला मन तैरता रहता है.

दुनिया भर की उच्च शिक्षा और किताबें उनके मन को पुरुष वाले मन से मुक्त नहीं करा सकी हैं. इसकी वजह उनके अंतर्मन को मिली वह सामंती खाद और पानी है जो निरंतर ऐसे विचारों से जकड़े रहती है, जहां पुरुष का निर्णय ही श्रेष्ठ माना जाता है. श्रेष्ठता का भावपुरुष में इतना गहरा है कि दांपत्य जीवन को गहराई से प्रभावित करता है.


अब एक ओर तो हम ऐसे समाज के रूप में बढ़ रहे हैं जहां बेटियों को शिक्षा और आगे बढ़ने के सभी मौके बराबरी से उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है. दूसरी ओर, जब शिक्षित, बराबरी की योग्यता वाली पत्नी के साथ दांपत्य जीवन का आरंभ होता है तो पुरुष मन अक्सर विचलित होने लगता है. उसने अपने पिता से, दादा से विरासत में जो अधिकार संपन्नता पाई है उससे मुक्ति आसान नहीं है. हमारे एक परिचित हैं, अक्सर वह परिवार की जगह मित्रों को समय देने के हिमायती होते हैं. उनके जो मित्र उन्हें ऐसा करने से उन्हें रोकते हैं, उनसे उनका आग्रह होता है कि ' मैं पुरुष हूं, पुरुष के लिए नियम का पालन संभव नहीं. बातों तक तो सब ठीक है लेकिन पुरुष के स्वभाव में अराजकता है. वह स्वतंत्र और श्रेष्ठ है. इसलिए उसके लिए बंधनों में बंधना मुश्किल है.'


यह वही बात है, जिससे लेख का आरंभ हुआ है, 'पुरुष वाला मन'. रिश्ते में स्त्री और पुरुष वाले मन का भेद कभी उन्हें उस सुख के तट पर नहीं ले जाएगा, जिसके लिए उन्होंने 'साथ' रहना चुना है. साथ रहने का निर्णय, गहरी पारस्परिक ईमानदारी, सद्भाव और एक-दूसरे के सम्मान से जुड़ा होना जरूरी है. जब दो लोग साथ चलने का निर्णय कर लेते हैं, तो उनके स्वभाव में भिन्नता, पसंद-नापसंद के अंतर स्वाभाविक हैं. इससे रिश्ते में तनाव नहीं आता, तनाव तो वहां से आरंभ होता है, जहां से किसी एक में श्रेष्ठता का भाव गहराने लगता है. हम स्त्रियों के लिए नारे तो सुंदर-सुंदर गढ़ने लगे हैं, लेकिन अपने मन में पुरुष वाले भाव से रिक्त किए बिना इनका जीवन के सौंदर्य, कोमलता पर प्रभाव नहीं दिखेगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 25, 2019, 8:27 AM IST
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