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#जीवनसंवाद: अपना पता भूलना !

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 13, 2019, 4:19 PM IST

Jeevan Samvad: रिश्ते हमें उस वक्त संभालने के लिए होते हैं, जब बाहर की दुनिया से हमें ठुकराया जा रहा हो. जब सब कह रहे हों, तुमने क्या कर दिया. उस समय तो यह साहस, स्नेह दें कि कोई बात नहीं, आगे बढ़ो. वही रिश्ता सबसे जरूरी है.

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  • Last Updated: December 13, 2019, 4:19 PM IST
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हमारी मूल पहचान क्या है. हम अपने को कैसे अभिव्यक्त करते हैं. किन चीज़ों से करते हैं. यह समझना कुछ वैसा ही है, जिस तरह ट्रेन में सफर के लिए स्टेशन का टिकट लेना. जितना स्पष्ट हम वहां होते हैं, अगर उतना ही जिंदगी के दूसरे निर्णय करते समय हो जाएं, तो हमारे जीवन से जुड़ी अनेक दुविधा, संकट स्वयं समाप्त हो जाएंगे. एक किस्सा सुनते हैं.

लखनऊ में सड़क किनारे एक व्यक्ति फूट-फूटकर कर रो रहे थे. उनके कपड़ों से लग रहा था कि उनके जीवन में आर्थिक संकट नहीं होना चाहिए. लेकिन वह जिस तरह से रो रहे थे, उससे यह अहसास हो रहा था कि संकट गहरा है.

वहां से गुजर रहे एक बुजुर्ग ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा, क्या हुआ. क्या चाहिए? उस युवक ने कहा, मेरे पास सबकुछ है. घर, पैसा, परिवार कोई कमी नहीं. बस मैं अपने घर का पता भूल जाता हूं, कभी-कभी.


अब क्या किया जाए. कैसे इस बात का पता चले कि उनको जाना कहां है. वह कहां जाएं. बजुर्ग ने उनसे कहा, देखिए, शायद आपकी यह बात आपके घर वालों को पता होने के कारण उन्होंने आपकी जेब में कोई पर्ची छोड़ी हो. संयोग से उनकी बात सही निकली. रोना छोड़कर वह अपने घर की ओर रवाना हो गए.

उनका संकट हल हो गया. संभव है, उनको कुछ समय के लिए याददाश्त गुम होने वाली बीमारी हो, लेकिन हम सबका संकट तो हर दिन बिना बीमारी के ही गहरा हो रहा है.
हम अपनी नौकरी, रिश्तों, बैंक बैलेंस, सुविधा का तो पूरा खयाल रख रहे हैं, लेकिन अपने से हमारा संबंध टूट रहा है. हम अपना पता भूल गए हैं. जब तब हम अपना पता भूले रहेंगे, खुद तक कैसे पहुंचेंगे. जब तक स्वयं से कटे रहेंगे, उस सुख तक नहीं पहुंच सकते, जहां जाना चाहते हैं. जो होना चाहते हैं. तनाव, आत्मघाती विचार एक दिन में पैदा नहीं होते. यह अंतर्मन से दूरी, तनाव के घुटन के बढ़ने से पैदा होते हैं. इसलिए जब भी कोई बात बुरी लगे, कहिए जरूर. रो लीजिए. झगड़ लीजिए, लेकिन मन में पीड़ा को गहरे मत बैठने दीजिए.

कुछ ऐसे हम अपना पता भूलने लगते हैं...1. रिश्तों में स्नेह का घटता निवेश.
2. अपने लिए समय नहीं निकाल पाना.
3. स्वयं से संवाद का टूटते जाना.
4. दर्द बाहर नहीं आने से घुटन बढ़ते जाना.
5. चाहतों का चक्रव्यूह.

इसलिए, जरूरी है कि हम अपने अंतर्मन के प्रति सजग, सरस रहें. यह जितना सरस, स्नेहिल, पवित्र रहेगा, हम अपना पता भूलने से उतने ही दूर रहेंगे. एक अनुभव मैंने किया है, संभव है, आपने भी किया हो. हमारे बीच ऐसे लोग भी हैं, जो अभी भी मोबाइल से दूर हैं. ऐसे लोगों की याददाश्त, चीज़ों, रिश्तों को सलीके से संभालने की क्षमता उनके मुकाबले कहीं ठोस है, जो हमेशा मोबाइल से घिरे हुए हैं. हम तकनीक का उपयोग नहीं कर रहे हैं, बल्कि तकनीक हमारा इस्तेमाल कर रही है. इसलिए, अपने जीवन में तकनीक के इस्तेमाल को संभालने, सहेजने के प्रति सतर्क होना निजी जीवन के लिए जरूरी है.

कहते हैं, ऐसे कुएं का पानी मीठा होता है, जिसके आसपास थोड़े से पेड़ पौधे होते हैं. वैसे ही जिनके पास रिश्तों की चादर होती है, वहां तनाव, डिप्रेशन नहीं टिकते. हां, चादर मैली, कटी-फटी नहीं होनी चाहिए. ठंड से हमें अच्छी तरह सिले हुए गर्म कपड़े बचाते हैं. हमारे मन, चेतना को भी ऐसे ही गर्माहट वाले रिश्तों की दरकार होती है.


रिश्ते हमें उस वक्त संभालने के लिए होते हैं, जब बाहर की दुनिया से हमें ठुकराया जा रहा हो. जब सब कह रहे हों, तुमने क्या कर दिया. उस समय तो यह साहस, स्नेह दें कि कोई बात नहीं, आगे बढ़ो. वही रिश्ता सबसे जरूरी है. इसलिए, ऐसे संबंधों के प्रति हमेशा विनम्र, स्नेहिल रहें, जो आपके जीवन को ऊर्जा, प्रेम और आत्मीयता देते हैं. छोटे-छोटे मतभेद, मनमुटाव को संबंधों का जायका खराब करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 13, 2019, 10:00 AM IST
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