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#जीवनसंवाद: आत्मा के उजाले!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 6:58 PM IST

JeevanSamvad: जिंदगी में असली संकट यहीं से आरंभ होता कि लोगों से मिलते-जुलते हुए हम अपने हित पूरे करने पर बहुत अधिक ध्‍यान देते हैं. हमने दोस्‍त, मित्र, सखा होने की जगह हितग्राही बनने पर इतना अधिक ध्‍यान लगाया कि संवाद का स्‍नेह, प्रेम सब सूख गया.

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  • Last Updated: December 11, 2019, 6:58 PM IST
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हमारी जिंदगी में कोई न कोई ऐसा जरूर होता है, जिसके मिलने से आत्मा तक आनंद समा जाता है. मैं अपने लिए ऐसे लोग तलाशता रहता हूं, क्योंकि ऐसे लोग एक जगह नहीं होते, हमारे शहर भी बदलते रहते हैं, इसलिए जरूरी है कि ऐसे ‘उजले’ लोग हर जगह होने चाहिए, जिनसे मिलकर आत्मा खिल उठे. ऑफिस में, घर के समीप, गांव में, शहर में, अपनी कॉलोनी में, हर जगह. हम कहीं भी अपने आपको अकेला नहीं छोड़ सकते. नकारात्मक विचार हर जगह हमारा पीछा करते रहते हैं, इसलिए, जरूरी है कि हमें संभालने वाला कहीं न कहीं मौजूद हो.

मैं हमेशा ऐसे लोगों के संपर्क में रहने की कोशिश करता हूं, जिनसे मिलकर इतना अच्‍छा महसूस हो कि अगर तनाव की छाया कहीं से आ रही हो, तो वह मुझ पर असर न करे. यह एकदम जरूरी नहीं कि ऐसे लोग हमारी कितनी मदद कर सकते हैं! दुनियादारी के कायदों में. जिंदगी में असली संकट यहीं से आरंभ होता कि लोगों से मिलते-जुलते हुए हम अपने हित पूरे करने पर बहुत अधिक ध्‍यान देते हैं. हमने दोस्‍त, मित्र, सखा होने की जगह हितग्राही बनने पर इतना अधिक ध्‍यान लगाया कि संवाद का स्‍नेह, प्रेम सब सूख गया.

इसलिए, हमारे मिलने का सुख खत्‍म हो गया. मिलने का समय, मिलने की चाहत खत्‍म होती गई. ऐसा करते हुए हम सब निरंतर अकेले होते गए. हम जब भी कोई निर्णय करते हैं, तो हमारे ध्‍यान में केवल एक ही बात रहती है कि यह तो मैं कर रहा हूं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि जैसा हम कर रहे हैं, असल में वैसा ही अनेक लोग कर रहे होते हैं. जो विचार मेरे मन में आ रहा है, वह दूसरे के मन में नहीं आएगा. इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती.

यह बात सकारात्‍मक से अधिक नकारात्‍मक विचार पर लागू होती है. इसका छोटा-सा प्रयोग करके देखिए. जिस व्‍यक्ति के मन में आपके लिए थोड़ी-सी भी नकारात्‍मकता है, उसके सामने आते ही हमारा मन खिन्‍न होने लगता है. यह नकारात्‍मकता जितनी अधिक पुरानी होती जाती है, नाराजगी, खिन्‍नता का भाव उतना ही गहरा होता जाता है.


अब थोड़ा ठहरकर सोचिए, यह कैसे संभव है कि किसी के लिए आपके मन में गहरा असंतोष, नाराजगी हो और उसे इसका पता न चले! उसे पता चलता ही है, भले ही आप यह मानें, न मानें. इसलिए अपने मन को ऐसे लोगों, विचारों से दूर रखना जरूरी है. ओढ़ा हुआ प्रेम आत्‍मा को सुख नहीं देता. वह तो उसमें उजाले की जगह गहरा अंधेरा भरता है. इसलिए, ओढ़िए मत, कह दीजिए. अगर इसके बाद भी मन का मैल न धुले, तो अपनी ओर से मुक्‍त हो जाइए. अटके मत रहिए.

हमारा शरीर, मन लाख कष्‍ट सह सकते हैं, लेकिन वह मैल, इस ओढ़े हुए भार को सहने की क्षमता नहीं रखते. इससे उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है. वह बीमार पड़ने लगते हैं. मन के विकार यहीं से जन्‍मते हैं. इनको सही जगह, समय पर पहचानना जरूरी है. इससे मन की प्रसन्‍नता और चित्‍त के आनंद को सरलता से पाया जा सकता है. जब किसी से मन खट्टा हो तो उन पलों की ओर लौटिए, जिनमें आप उनके साथ आनंद में थे. जिससे मुंह फुलाए बैठे हैं, उसके अनुराग की याद संबंधों के लिए संजीवनी बनेगी.

इससे मन में कटुता कम होगी. प्रेम और आत्‍मीयता के झोंके आत्‍मा को नकारात्‍मक ‘प्रदूषण’ के बीच भी उजाले की ओर ले जाने में कामयाब रहेंगे. जिस तरह हवा चलने से प्रदूषण घटता है. पर्यावरण साफ होता रहता है, वैसे ही बिगाड़ के दिनों में प्रेम के झोंके आत्‍मा को मैला होने से बचाते हैं. मैं स्‍वयं यह प्रयोग किए हैं, आप भी कीजिए. जिंदगी से स्‍नेह बढ़ेगा.पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 11, 2019, 11:32 AM IST
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