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#जीवनसंवाद: मन का बोझ उतारते रहिए!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 1:00 PM IST

Jeevan Samvad: मन के बोझ के प्रति सतर्क रहिए. जिस तरह घर में थोड़ा-थोड़ा करके कबाड़ इकट्ठा होता है, वैसे ही मन में भी खरपतवार उगते रहते हैं. मन का खयाल, घर की तरह रखिए.

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  • Last Updated: August 20, 2019, 1:00 PM IST
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जीवन के अनुभव पर हम एक पर्वतारोही से संवाद कर रहे थे. उन्होंने बहुत सुंदर बात कही, जैसे-जैसे वह पहाड़ के ऊपर चढ़ते जाते हैं, केवल उन्हीं चीजों को साथ रखते हैं जो बहुत जरूरी होती हैं. फालतू चीजों के साथ ऊपर चढ़ना संभव नहीं है. मेरे विचार में यह पहाड़ पर चढ़ने के साथ ही जीवन के लिए भी उतनी ही जरूरी बात है. हमें इस बात का सबसे अधिक खयाल रखना होगा कि मन पर कम से कम बोझ रहे. मन भारी होने पर जिंदगी में कुछ भी हल्का नहीं हो सकता.

जीवन पहाड़ पर चढ़ने जैसा ही है. अगर आपने अतिरिक्त बोझ से मुक्ति की क्षमता हासिल कर ली है, तो ऊंचाई पर चढ़ते वक्त आपको कम से कम मुश्किल आएगी. यह उदाहरण आपको थोड़ा मुश्किल लग सकता है, लेकिन कभी थोड़ा ठहर कर सोचिएगा कि भारत में किस पेशे से जुड़े लोगों की उम्र सबसे अधिक होती है. आप पाएंगे कि राजनेताओं की औसत उम्र अधिक है. सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण पेशे में रहते हुए वह दूसरे लोगों के मुकाबले कहीं अधिक सेहतमंद, महत्वाकांक्षी बने रहते हैं. उनके भीतर जीवन के प्रबंधन की क्षमता कहीं अधिक होती है. वह जरूरी चीजों को समय पर पूरा करने और बेकार की चीजों से दूर रहने में माहिर होते हैं.

हमें जीवन के प्रति समन्वयकारी होना है! जहां से जो अच्छा मिल रहा है, ग्रहण कीजिए और आगे बढ़ जाइए. अटके रहने से जिंदगी नहीं चलती. जिंदगी आगे बढ़ने का नाम है. बादलों के घर लेने के बाद भी सूरज ठहर कर बैठता नहीं. रुकता नहीं. जिंदगी का दम नहीं घुटने देना है.


मन के बोझ के प्रति सतर्क रहिए. जिस तरह घर में थोड़ा-थोड़ा करके कबाड़ इकट्ठा होता है, वैसे ही मन में भी खरपतवार उगते रहते हैं. मन का खयाल, घर की तरह रखिए.

जो लोग आपको पसंद नहीं है, उनसे दूर हो जाइए. दूरी बना लीजिए. बहुत मजबूरी में निबाह करना भी पढ़े तो भी सुरक्षित दूरी संभव है. लेकिन अपने भीतर किसी तरह की कुंठा, कड़वाहट जीवन के प्रति मत आने दीजिए. नौकरी बदल जाएगी. नई जगह मिल जाएगी. घर बदल जाएगा, नए पड़ोसी मिल जाएंगे. लेकिन मन में बैठी कुंठा को, हताशा और निराशा को आंतों की कोठी से निकालना मुश्किल हो जाता है. आंतों का उदाहरण इसलिए दिया गया, क्योंकि तनाव के बारे में नई जानकारी यह है कि यह भारत में बहुत तेजी से हमारे दिमाग, शरीर विशेषकर आंतों को प्रभावित कर रहा है.

इस बारे में अगले अंक में विस्तार से संवाद करेंगे. इस समय फिलहाल इतना ही कि मन को यथासंभव कोमल, उदार, स्नेही और प्रसन्न चित्त बनाए रखिए. तनाव का मुकाबला करने में अपने पर भरोसा रखने के साथ ही यही गुण आपकी संजीवनी का काम करेंगे.

मेरा आग्रह केवल इतना है कि अपने मन के बोझ का निरंतर हिसाब करते रहें. हम अक्सर उस पर पड़ने वाले दबाव, तनाव की उपेक्षा करते रहते हैं. हम यह सोचकर चलते हैं कि हम किसी भी स्थिति का सामना कर सकते हैं, लेकिन उस स्थिति के लिए अपने मन को तैयार नहीं करते. हमेशा ध्यान रहे कि शारीरिक तैयारी की तुलना में मानसिक तैयारी कहीं अधिक जरूरी है. हमें इसी तैयारी के तहत अपने मन को जांचते रहना है. उसकी सेहत का हिसाब रखना शरीर जितना ही जरूरी है. चीजों को टालिए मत, उनकी उपेक्षा मत कीजिए केवल अपनी प्राथमिकता तय कीजिए. आप पाएंगे कि आपका मन भी रुई की तरह हल्का होने लगेगा. हम सबको मिलकर जीवन को हल्का ही बनाना है. जितने बोझ उतरते जाएंगे, हम उतना ही ऊपर उठते जाएंगे.पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 9, 2019, 8:57 AM IST
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