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#जीवनसंवाद: विवाह का घोषणा पत्र और पति-पत्नी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 25, 2019, 9:28 AM IST
#जीवनसंवाद: विवाह का घोषणा पत्र और पति-पत्नी!
#जीवन संवाद

जैसा अक्सर होता है, वायदे तय करते/घोषणा पत्र बनाते समय हमारी पूरी नजर केवल इस बात पर टिकी होती है, कि किसी तरह अभी का काम बने. इसलिए जैसे ही 'काम' बन जाता है, हम वायदों/घोषणा पत्र की अनदेखी शुरू कर देते हैं

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  • Last Updated: November 25, 2019, 9:28 AM IST
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पति-पत्नी के बीच में होने वाले विवाद इतने अधिक विविधतापूर्ण होते हैं कि किसी एक की 'थ्योरी' दूसरे पर लागू न होने के पर्याप्त कारण हैं. हरेक दूसरे से अलग है. उस पर भी विवाह तो दो अलग-अलग 'ग्रह' से आए लोगों का घोषणा पत्र है. हमारे विवाह के घोषणा पत्र और राजनीतिक पार्टी के घोषणा पत्र में बहुत अंतर नहीं है. एक घोषणा पत्र का उद्देश्य विवाह हो जाना है. दूसरे का उद्देश्य सत्ता पाना है. दोनों में ही एक 'कॉमन मिनिमम प्रोग्राम' (न्यूनतम साझा कार्यक्रम) होता है.

जैसा अक्सर होता है, वायदे तय करते/घोषणा पत्र बनाते समय हमारी पूरी नजर केवल इस बात पर टिकी होती है, कि किसी तरह अभी का काम बने. इसलिए जैसे ही 'काम' बन जाता है, हम वायदों/घोषणा पत्र की अनदेखी शुरू कर देते हैं.
हर बात पर बहाने और बहानों की बातों से ही जीवन को चलाने लगते हैं. इसे अधिक दिन तो चलाया नहीं जा सकता, इसलिए जैसे-जैसे दिन बीतते जाते हैं निजी जिंदगी में तनाव का स्तर बढ़ता जाता है.


हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिनमें मूल समस्या यही होती है कि किसी तरह आज शांति कायम रखी जाए. कल का, कल देखेंगे! यह पूरा रवैया कुछ ऐसा है मानिए हमें शहर में आग लगने की खबर मिल गई है, लेकिन हम यही मानकर चलते हैं कि आग हम तक आज तो नहीं पहुंचेगी. संभव है कि आग आज ना पहुंचे लेकिन यह कैसे हो सकता है कि आप उसकी आंच से भी बचे रहें.

हमारे समाज में विवाह के समय ना केवल परिवार की ओर से भरपूर झूठ बोले जाते हैं. बल्कि भावी पति-पत्नी भी यथासंभव ऐसी ही बातें करते हैं जिससे उनकी ऐसी बातों का पता चलता है, जिन पर केवल मुग्ध हुआ जा सकता है.
उस समय हमारे दिमाग में केवल यही चल रहा होता है कि कैसे खुद को श्रेष्ठ बताया जा सके. हम अपने आसपास श्रेष्ठता की दीवार बुनने में लगे रहते हैं. जबकि इस समय का उपयोग इस बात के लिए होना चाहिए कि हम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ लें. यह घर की नींव बनाने जैसा काम है.


देश में किसी भी क्षेत्र में नींव के निर्माण पर सबसे कम ध्यान देने का चलन है. हम बच्चों पर कम ध्यान देते हैं, क्योंकि हमें उनकी बातें समझ में ही नहीं आतीं. हम समझना भी नहीं चाहते. इन सब में वक्त लगता है, इसने आत्मीयता और प्रेम भी. हम बच्चों का मुंह उनकी मांगों से भर देना चाहते हैं. थोड़ा ठहर कर सोचिए यह हाल उनका कर रहे हैं, जिन्हें हम अपना भविष्य कहते हैं.


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इससे हमारी संजीदगी का पता चलता है. हम जीवन के सबसे महत्वपूर्ण निर्णय विवाह के समय घोषणा पत्र बनाने में जुटे रहते हैं. यह हमारे मध्यमवर्गीय समाज के इतनी कड़वी सच्चाई है कि अनेक पाठकों को यह बात अखर सकती है.
इसलिए मेरा आग्रह है कि इस लेख को कई बार, बार-बार पढ़िए. संभव है, ऐसा करने के बाद आप इससे सहमत होने की तरफ़ बढ़ें. ऐसा भी नहीं कि जिन बातों पर हमारी सहमति बन जाए, आगे उन पर विवाद न हों. लेकिन ऐसा होने की सुखद सुखद संभावना बनी रहती है. इसलिए, रिश्तों के निर्माण के समय जितना संभव हो खुद को सही-सही अभिव्यक्त किया जाए. इससे जीवन में तनाव, निराशा को बहुत हद तक संभाला जा सकता है.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
Network18
एक्सप्रेस ट्रेड टावर, 3rd फ्लोर, A विंग
सेक्टर 16 A, फिल्म सिटी, नोएडा (यूपी)
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: November 22, 2019, 12:15 PM IST
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