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#जीवन संवाद: असफलता से अपमानित न होना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 12, 2019, 4:19 PM IST

Jeevan Samvad: हमें समझना होगा कि सब कुछ हमारी सीमा में नहीं है. जीवन में ऐसा बहुत कुछ है, जो हमारी पहुंच से बाहर है. उससे केवल तालमेल बैठाया जा सकता है, उसे नियंत्रित नहींं किया जा सकता.

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  • Last Updated: December 12, 2019, 4:19 PM IST
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समाज के रूप में हम जिस सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं, वह है- स्वयं को हर छोटी-बड़ी असफलता से निपटने में असफल पाना. जिस तेजी से उदासी, निराशा और तनाव गहरा होता जा रहा है, उससे निपटना समाज के लिए मुश्किल होता जा रहा है. 'फूट डालो और राज करो' की नीति का जिक्र अक्सर हम अंग्रेजों के संदर्भ में करते हैं, लेकिन जिस तरह सपनों की दौड़ में हम अकेले होते जा रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि हमारी महत्वाकांक्षा ने हम सब में आपस में फूट पैदा कर दी है. हम सब अकेले होते जा रहे हैं. समाज में रहते हुए हमें हराना मुश्किल होता है, लेकिन जैसे ही हम अकेले पड़ते हैं हमारी क्षमताएं, सीमित होती जा रही हैैं.   ‌‌‌

अपने लिए थोड़ी सी स्वतंत्रता, 'निजी दुनिया' बुनने की कोशिश में हम सब कब अकेले होते गए पता ही नहीं चला. इसलिए, असफलता को सहना हमारे लिए मुश्किल होता जा रहा है.

असफलता को बर्दाश्त नहींं करने की स्थिति में हम स्वयं इतना अधिक अपमानित महसूस करने लगते हैं कि स्वयं के ही दुश्मन बन बैठते हैं. अपनेे भीतर कुंठा, दूसरे के लिए नाराजगी कुछ इस तरह तैयार करते जाते हैं, कि भीतर घुटन बढ़ती जाती है. कई बार ऐसा संभव है कि परिस्थितियां आपके बस में ना हों, ऐसे में केवल आपको खुद को संभालना होता है.


अगर ट्रेन किसी वजह से आपका स्टेशन आने के पहले ही रुक जाए तो आप क्या कर सकते हैं! इस फिक्र में परेशान होते हैं, जहांं जाना था, वहां नहीं पहुंच पाएंगे. देरी की वजह से नाराजगी झेलनी पड़ेगी. ऐसी बातें सोच-सोच कर आप अपना मन खराब कर सकते हैं. परेशान हो सकते हैं. संभव है कुछ बीपी भी बढ़ा लें. लेकिन इससे कुछ हो नहीं सकता, क्योंकि ट्रेन को चलाना आपके वश में नहीं है. इसलिए, मन को शांत रखने में ही आपकी भलाई है. आप कुछ संदेश भेज कर पहले से लोगों को सूचना दे सकते हैं देरी से आने की. इससे अधिक आप कुछ कर नहीं सकते. कुछ यही हाल हमारी जिंदगी में ऐसी परिस्थितियोंं का होता है जो अचानक घेर लेती हैं.

ऐसी मुश्किल में हम खुद को कोसने लगते हैं. भाग्य को कसूरवार ठहराने लगते हैं. मन इतना अधिक कड़वा कर लेते हैं कि उसकी छाया तन पर पड़ने लगती है. यह सब स्वयं को अपमानित करने की प्रक्रिया है. अंतत: हमें समझना होगा कि सब कुछ हमारी सीमा में नहीं है. जीवन में ऐसा बहुत कुछ  है, जो हमारी पहुंच से बाहर है. उससे केवल तालमेल बैठाया जा सकता है, उसे नियंत्रित नहींं किया जा सकता. टाला तो बिल्कुल नहीं जा सकता. हमें इस सच को स्वीकार करना सीखना होगा. हम जितनी जल्दी से समझ लेते हैं, उतनी ही शीघ्रता से हम सहज होते जाते हैं.

 इसका यह अर्थ नहीं कि आप अपनी सीमाओं का विकास न करें, बल्कि यह है कि आप समझें कि आप क्या हो सकते हैं. कहां तक जा सकते हैं. अगर आप 100 मीटर दौड़ की क्षमता रखते हैं, तो आपको क्रिकेट के मैदान से दूर ही रहना होगा.


असल बात यह है कि ऊर्जा को सही समय पर समझें. अपनी असफलता को बर्दाश्त करने, सहने की क्षमता जीवन को सामान्य बनाए रखने की प्रक्रिया में पहला कदम है. जब हर तरफ से अंधेरा होता है, रोशनी उसे ही मिलती है, जिसके मन में उसके लिए गहरी आस्था होती है. आस्था उसके ही मन में रहती है जो स्वयं से अपमानित नहीं होता. अपने भीतर की ऊर्जा और विश्वास को उस समय बनाए रखता है, जब दुनिया आपको यह समझाने के इरादे से आगे बढ़ रही हो कि आप गलत रास्ते पर हैं. खुुद से प्रेम करिए, यह अपने को बचाने की सबसेे उपयोगी दवा है.पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 12, 2019, 10:05 AM IST
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