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#जीवन संवाद : तनाव का आंतों तक पहुंचना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: December 11, 2019, 11:34 AM IST

Jeevan Samvad: तनाव शरीर में काई की तरह जमता है. दीमक की तरह उसे खोखला करता है. उसके बाद सूखी, जर्जर हो चुकी जीवन शक्ति को बुलडोजर की तरह गिरा देता है.

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  • Last Updated: December 11, 2019, 11:34 AM IST
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हममें से अधिकांश लोग तनाव को सिर दर्द से ही जोड़कर देखते हैं. दिमाग, मन के परेशान होने पर कुछ बेचैनी, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द स्वाभाविक है. सिरदर्द, बेचैनी के ठीक होने पर मानते हैं कि सबकुछ ठीक हो गया. आप भी ऐसा सोचते हैं, तो इसे हमें 'मिथक' कहना पड़ेगा. आज हम इस मिथक को तोड़ने की ओर बढ़ रहे हैं.

अगर तनाव की ओर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह कुंठा के रूप में धीरे-धीरे मनोरोग की ओर बढ़ता जाता है. तनाव हमारे शरीर के बेहद महत्वपूर्ण हिस्सों आंतों, लीवर को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है. इससे पूरी पाचन प्रक्रिया डिस्टर्ब हो सकती है.

तनाव शरीर में काई की तरह जमता है, दीमक की तरह उसे खोखला करता है. उसके बाद सूखी, जर्जर जीवन-शक्ति को बुलडोजर की तरह गिरा देता है.


'जीवन संवाद' के सुधी, सजग पाठक सचिन वर्मा ने तनाव के शरीर पर प्रभाव को लेकर परिवार का अनुभव साझा किया है. उन्होंने बताया कि पत्नी को पेट में उठे गंभीर दर्द की वजह से कुछ दिन पहले कौशांबी, गाजियाबाद के एक हॉस्पिटल में एडमिट कराया. अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन सहित सभी जरूरी जांचें की गईं. यह सब किडनी में स्टोन, अपेंडिसाइटिस, गॉल ब्लैडर में स्टोन का पता लगाने के लिए किया गया. जब जांच में कुछ नहीं निकला, तो फिर एन्डोस्कोपी हुई, जिसमें पेट में अल्सर निकले. डॉक्टरों के मुताबिक यह अल्सर तेज मिर्च मसाले खाने की वजह से नहीं, बल्कि तनाव (स्ट्रेस), ज्यादा सोचने और सोचकर परेशान होने की वजह से हुए.

डॉक्टरों का कहना है कि ज्यादा तनाव से सिर्फ सिरदर्द ही नहीं होता, बल्कि पेट में ज्यादा एसिड बनता है. ज्यादा एसिड के स्राव (Secretion) से पेट के भीतर जख्म बनने लगता है. उसके बाद तेज गैस बनती है, जिसका असर धीरे-धीरे पीठ और सिर तक में होता है. दर्द बढ़ता जाता है. डॉक्टरों के मुताबिक तनाव से ज्यादा एसिड का स्राव होने से पेट में इंफेक्शन के साथ ही इतना तेज दर्द होता है कि यह स्टोन या अपेंडिसाइटिस के दर्द को भी पीछे छोड़ देता है. उसके लिए सिर्फ दर्द निवारक इंजेक्शन ही शुरुआती राहत देने का इकलौता उपाय होता है.

सचिन वर्मा की पत्नी की देखभाल कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि तनाव से उभरे आंतों के छालों को भरने में दो से तीन महीने का समय लगता है. मरीज लगातार दर्द से परेशान रहता है, इसलिए उसको तनावमुक्त (स्ट्रेस फ्री) रखना पहली प्राथमिकता है, जिससे अल्सर पर दवाएं असर कर सकें. इस बीमारी की पहली पहचान तब होती है, जब आमतौर पर चिंतामुक्त, तनाव से दूर रहने वाले किसी व्यक्ति के पेट में अचानक किसी घटना के बाद दबाव बने, मरोड़ उठने लगे तो फौरन ही डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि पेट की 70 फीसदी बीमारियों की वजह मानसिक तनाव है. सचिन ने अपनी पत्नी से जुड़े सभी दस्तावेज भी हमें भेजे हैं, जिससे उनके अनुभव की सत्यता की पुष्टि हो सके.

यहां ध्यान देने की बात यह है कि हमारे आसपास अक्सर इन दिनों लोगों के बीच पेट की बीमारियां बढ़ने लगी हैं. यह खतरनाक संकेत है. हमें अपनी सभी बीमारियों को मन के जुड़ाव से समझने की ओर बढ़ना होगा.
मानसिक जटिलता का 'चक्रव्यूह' जीवन को इतनी अधिक गहराई से प्रभावित करता कि कई बार इस पर विश्वास करना मुश्किल हो जाता है. लेकिन यह एक कड़वी सच्चाई है. शरीर के रोग का मन से बहुत ही निकट, वैज्ञानिक संबंध है. हम जितनी सरलता से इसे महसूस करेंगे इसका मुकाबला करना उतना ही आसान होगा.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 10, 2019, 8:38 AM IST
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