#जीवन संवाद : एकांत की घबराहट!

जीवन संवाद

कोरोना ने हम सबको एक अनचाहे एकांतवास की ओर धकेल दिया है. कैसी विडंबना है, कुछ समय पहले तक हम समय न मिलने पर घर परिवार को वक्त न देने से परेशान रहते थे, अब अचानक से सबके साथ रहते हुए हम परेशान दिख रहे हैं.

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कोरोना ने हम सबको एक अनचाहे एकांतवास की ओर धकेल दिया है. कैसी विडंबना है, कुछ समय पहले तक हम समय न मिलने पर घर परिवार को वक्त न देने से परेशान रहते थे, अब अचानक से सबके साथ रहते हुए हम परेशान दिख रहे हैं. हमारा मन पाइथागोरस प्रमेय के मुकाबले कहीं जटिल और गहरा है. कोरोना ने इस पर अनचाहे ही प्रकाश डाल दिया है! उसके चेतन और अचेतन में एकदम उल्टी चीजें चलती रहती हैं. बाहर कुछ, और भीतर कुछ दूसरा. कोरोना पर एक बहुत ही विस्तृत, गहन मनोवैज्ञानिक शोध की आवश्यकता है. इससे अनजाने ही हमारे मन में बैठे विभिन्न भाव, रस के बारे में जानने का अवसर उत्पन्न हुआ है.

भारतीय लोक जीवन में एक बात बहुत ही सरलता से दोहराई जाती रही है. किसी भी चीज़ की अति की मनाही है. किसी भी चीज़ की. प्रकृति ने संतुलन का इतना सरल वातावरण हमारे आस-पास बुना हुआ है कि हम उसे आंखों और आत्मा पर पट्टी बांधे बिना अनदेखा नहीं कर सकते.

इसलिए, हमने लालची विकास, कथित आधुनिक सुख और महत्वाकांक्षाओं की लंबी रोड से प्रकृति को झूठा साबित करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा.


जिनके पास भोजन नहीं है, कुछ भी संचय नहीं है. वह भी इतने घबराए नहीं दिख रहे, जितनी घबराहट में वह हैं जिनको भविष्य की चिंता खाए जा रही है. वह घबराहट में ज़्यादा दिख रहे हैं, जिनके पास हर तरह की सुविधा है. परिवार और बच्चोंं के साथ रहते हुए बड़ी संख्या में लोग व्याकुल दिख रहे हैं. यह व्याकुलता किसके लिए! किसी सामाजिक सरोकार और भूखे को भोजन देने, संकट में पड़े लोगों की सहायता करने के लिए नहीं. यह व्याकुलता उस मन की है, जिससे खासकर पुरुषों का गहरा लगाव है. पुरुष स्वयं को इतना उन्मुक्त और अराजक समझते हैं कि उनके लिए घर पर रहना एक मानसिक संकट जैसा बन गया है.

यह संकट असली जरूरतमंदों का कम और ऐसे व्याकुल लोगों का अधिक है, जिनके पास सृजनात्मकता का काल है.पढ़ने के लिए किताबों से दूर, बच्चों के दुलार और लगाव से परे जाकर हम अपनी व्याकुलता को अनजाने ही बढ़ा रहे हैं.


'वर्क फ्रॉम होम' भारतीयों केे लिए नई कार्य संस्कृति है. एक नया अनुभव है. जिसमें ढलने और उसके बुनियादी नियम सीखने में बहुत सारा समय बाकी है. इसलिए हम सबको बहुत मुश्किल दिख रहा है. बहुत सारे प्रोफेशन में मुश्किल भी लग रहा है. लेकिन दुनिया जिस तरह आर्थिक मंदी की चपेट में जा रही है, मेरा विनम्र निवेदन है कि इससे नजरेंं मत बचाइए. वर्क फ्रॉम होम' की संस्कृति आने वाले समय की सच्चाई साबित होने की पूरी क्षमता रखती है.

इसलिए, घर से काम करने का अभ्यास पूरे दिल से करिए. बच्चों के साथ रहकर कैसे काम किया जा सकता है, इस कला को सीखने में समय लगेगा, लेकिन यह अनिवार्य होने से बहुत दूर नहीं है. अतः घर परिवार के साथ अपने कामकाज में तालमेल के लिए प्रयास शुरू कर देना चाहिए. यह एकांतवास महाभारत के नायक पांडवों की तरह सीमित अवधि का नहीं है. यह उससे कहीं अधिक कठिन होने जा रहा है.


इसलिए, इससे भागने और घबराने से काम नहीं चलेगा. बहुत से पाठक मुझे लिख रहे हैं. संदेश भेज रहे हैं कि वह इस अप्रत्याशित 'लॉक डाउन' से घबराने लगे हैं. निराश होने लगे हैं. डिप्रेशन की ओर बढ़ने लगे हैं. उन सभी से मेरा निवेदन है कि अपने इस वक्त को काटने/टालने की कोशिश मत कीजिए. इसके सृजनात्मक और रचनात्मक उपयोग के तरीके खोजिए. मन को नई चुनौतियों के लिए तैयार कीजिए. स्वयं को नई मानसिक यात्रा पर ले जाइए. मन को मजबूत और कठिन परिस्थितियों का सामना करने लायक बनाइए. अपने भीतर के प्रेम को और गहरा कीजिए. रिश्तों को नया आकार दीजिए. ऐसा भी हो सकता है कि जिस दिन यह सब खत्म हो जाए, उस वक्त आप परेशान होने लगें कि काश! थोड़ा समय और मिल जाता. अगर आप कुछ ज्यादा परेशान होने लगे हैं तो मुझसे अपनी परेशानियों को साझा कर सकते हैं.

संपर्क : Email : dayashankarmishra2015@gmail.com. आप मेरे फेसबुक और ट्विटर हैंडल पर भी अपने सवाल साझा कर सकते हैं.

(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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