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#जीवन संवाद : प्रायश्चित के फूल!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 26, 2020, 10:11 PM IST
#जीवन संवाद : प्रायश्चित के फूल!
#जीवन संवाद : प्रायश्चित के फूल!

#JeevanSamvad: हम बहुत सहजता से दूसरों के लिए दरवाज़े बंद करते जाते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में हम भूल जाते हैं कि इससे हमारे घर को आने वाली रोशनी और ताज़ा हवा पर भी फर्क पड़ता है.

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अपनी गलती का एहसास होना! मन से उसे स्वीकार करना. संभव है जिसके प्रति यह हुआ हो उससे भौतिक दूरी इतनी अधिक होगी कि संपर्क न किया जा सके. यह भी हो सकता है कि वह संपर्क ही ना करना चाहे. ऐसी स्थिति में मन को उबारने के लिए सबसे अच्छा है तरीका है, अपने अंतर्मन से उस घटना पर विचार करते हुए क्षमा मांगी जाए. अपने किए के प्रति स्वयं के दृष्टिकोण से क्षमा याचना को हम प्रायश्चित कहते हैं. इसमें दूसरे पर ध्यान न देकर सारा दायित्व स्वयं पर लिया जाता है.

अपने देश में राजाओं के लंबे-चौड़े अतीत के बीच अशोक का नाम इतने अधिक आदर और सम्मान के साथ क्यों लिया जाता है. अशोक को महान बनाने वाली बहुत सी बातें हैं. अपने जीवन में अशोक ने किसी युद्ध में पराजय का सामना नहीं किया. भाइयों की हत्या तो सत्ता के लिए अनेक सम्राटों ने की है. राजा/बादशाह होने के बाद जनता की भलाई के लिए बहुत सारे काम अनेक राजा करते रहे. लेकिन इन सबसे अलग अशोक ने कलिंग युद्ध के बाद स्वयं को उस प्रायश्चित की अग्नि से गुजारा, जिसमें तपने का साहस भारत में दूसरे किसी सम्राट की ओर से देखने को नहीं मिलता. उसके बाद अशोक के जीवन की दिशा ही बदल गई. मानवता को अहिंसा और बुद्ध से परिचित कराने की दिशा में अशोक ने सबसे बढ़कर काम किया.

कलिंग युद्ध में जो कुछ हुआ वह तो युद्ध में होता ही था. लेकिन अशोक का मन इतने से ही नहीं बदला. पंडित जवाहरलाल नेहरू की प्रसिद्ध कृति 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' पर आधारित श्याम बेनेगल का तथ्यात्मक धारावाहिक 'भारत एक खोज' हमें बताता है कि कलिंग युद्ध के समय सम्राट अशोक की पत्नी गर्भवती थीं. अशोक उनकी देखभाल की उचित व्यवस्था करके गए थे. लेकिन लौटने पर पाते हैं कि बच्चे की गर्भ में मृत्यु हो गई. राज्य वैद्य बताते हैं कि इसके बाद वह कभी गर्भधारण नहीं कर पाएंगी. अशोक युद्ध और गर्भ में बच्चे की मृत्यु को जोड़ देते हैं.



इससे कुछ समय पहले ही अशोक के भाई किस्सा जो उनके साथ थे, अशोक द्वारा सबक सिखाए जाने की प्रक्रिया में उन्हें जीवन का मार्ग मिल गया. वह बौद्ध भिक्षु बन गए थे. अशोक शांति की तलाश में किस्सा के पास जाते हैं. वह कहते हैं, क्या लाखों सैनिकों के रक्त में मेरे हाथ सने होने के कारण ईश्वर ने बच्चा मुझसे छीन लिया है. मुझे इसकी सजा मिली है? किस्सा बहुत सुंदर जवाब देते हैं, जिसका सारांश है, 'ईश्वर हत्या के बदले हत्या नहीं करता. लेकिन तुम्हारे लिए जरूरी है कि तुम प्रायश्चित करो. तुम इससे स्वयं को अपराध से मुक्त कर सकते हो. शांति, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलते हुए.'





वह कहते हैं, 'अशोक आप, पश्चाताप की अग्नि में जल रहे हैं. यह अच्छा है. अभी तक आपकी आत्मा मरी नहीं. आप बच्चे की मृत्यु के उत्तरदायी नहीं है. लेकिन हजारों सैनिकों की मृत्यु के उत्तरदायी हैं. मन से घृणा निकालकर ही शांति पाई जा सकती है. युद्ध में विजय महान होती है, लेकिन जब आप स्वयं पर विजय पाते हैं तो वह महानतम होती है.'


अशोक यही मार्ग चुनते हैं. उनका नाम युद्धों में अभूतपूर्व विजय और शक्ति के लिए याद नहीं किया जाता. बल्कि उस विचारशैली के लिए याद किया जाता है, जो लंबे समय तक भारतीय जीवन शैली का हिस्सा थी. प्रायश्चित! अशोक ने प्रायश्चित के फूल लगाए पूरी दुनिया में. वही अब अशोक का नाम चारों दिशाओं में सुगंधित कर रहे हैं.

आप सोच रहे होंगे कि 'जीवन संवाद' में अचानक अशोक का किस्सा क्यों! प्रायश्चित के फूलों की जरूरत क्यों आ पड़ी है. यह इसलिए, क्योंकि कोरोना का संकट भारतीय जनमानस को एक ऐसे मोड़ पर ले आया है जहां उसके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ केवल प्रेम बची है. कोरोना से हमें यही बचाएगा. 'जीवन संवाद' के पाठक मुझे इन दिनों अकेलेपन और रिश्तों के संघर्ष के बारे में लिख रहे हैं. सवालों में सच्चाई है, लेकिन अपने प्रति नरमी बरतते हुए दूसरे की ओर संकेत थोड़ा अधिक है. दूसरे पर जरूरत से अधिक जोर हमारे हृदय में प्रेम की कमी और स्वयं पर भरोसे को दिखाता है.

किसी भी रिश्ते के टूटन के पीछे अनेक कारण होते हैं. हम अधिकांशतः वह कारण चुनते हैं जो हमें अधिक भाता है. हमारे मन को जिससे अधिक सांत्वना मिलती है. हम बहुत सहजता से दूसरों के लिए दरवाजे बंद करते जाते हैं. लेकिन इस प्रक्रिया में हम भूल जाते हैं कि इससे हमारे घर को आने वाली रोशनी और ताज़ा हवा पर भी फर्क पड़ता है.


किसी के दुख देने पर गुस्सा सहज है. लेकिन इसे मन का स्थाई भाव नहीं बनने देना है. बदले की भावना सबसे अधिक स्वयं को नुकसान पहुंचाती है. जीवन को बदलापुर बनाने से कुछ हासिल नहीं होता. स्वयं को श्रेष्ठ मानने से प्रतिशोध की भावना निरंतर बढ़ती ही रहेगी. श्रेष्ठ वह नहीं जो बदले के लिए काम करे, बल्कि वह है जो आगे निकलकर अपने जीवन के इस छोटे से समय का वैसा उपयोग कर सके जैसा अशोक ने किया.

आप कह सकते हैं कि अशोक विजेता थे, असली समस्या तो पीड़ित के मन में होती है. इसके लिए हमें अपने उन संतों नायकों की ओर जाना पड़ेगा, जिन्होंने कष्ट सहकर हमें रास्ता दिखाया. सुकरात, गौतम बुद्ध बार-बार यही दोहराते हैं कि क्षमा से श्रेष्ठ कुछ नहीं. प्रेम से श्रेष्ठ कुछ नहीं. जलते हुए मन में अगर समय रहते प्रेम और अनुराग की ठंडक ना रखी जाए तो वह बहुत जल्द कुंठित, हिंसक और दुखी मन में बदल जाता है. डिप्रेशन यहीं से आरंभ होता है.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 20, 2020, 10:01 AM IST
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