#जीवनसंवाद : खाली बोरे सरीखे मन!

#जीवनसंवाद : खाली बोरे सरीखे मन!
#जीवनसंवाद : खाली बोरे सरीखे मन!

#JeevanSamvad: मन को वजनी तो होना चाहिए लेकिन अहंकार, ईर्ष्या और कुंठा से नहीं. उसमें प्रेम, सहायता और स्नेह का वजन जरूरी है. हम जिन चीज़ों के पीछे जिंदगी भर भागते हैं, अंत मेंं उसकी कीमती हमें बहुत अधिक नहीं मिलती.

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आशा है, आप सबने बोरे अवश्य ही देखे होंगे. वही बोरे जिसमें अनाज भरा जाता है. तरह-तरह के होते हैं और उनमें उनकी क्षमता के अनुसार सामान भरा जा सकता है. बोरों को अकसर अहंकार हो जाता है कि वही सब कुछ हैं. वह न हो तो मजाल है, कुछ इधर से उधर हो जाए! उनके बिना तो कुछ भी संभव नहीं. लेकिन बोरी का अहंकार बहुत जल्दी टूट जाता है. जब तक अनाज भरा रहता है बोरा तब तक ही शक्तिशाली है. इधर अनाज/सामान निकला नहीं कि उधर छोटा सा बच्चा भी बोरी को अपनी सुविधानुसार कहीं भी पटक देता है.

बच्चा भरी हुई बोरी नहीं उठा सकता. जबकि बोरी तो यही समझ रही है कि उसे कोई हिला नहीं सकता. असल में सम्मान तो सामान का हो रहा होता है. लेकिन बोरे का भ्रम यही है कि सारी प्रतिष्ठा उसकी है! जैसे ही बोरी खाली होती है, उसका अभिमान भी टूट जाता है. बच्चे तक उसे जहां तहां देखने लगते है. हालांकि खाली होने के बाद भी उसे संभाल कर रखा जाता है लेकिन पहले जैसी बात नहीं होती. वह सम्मान नहीं होता जो बोरे के भारी रहते होता.

यह बोरी का भारी रहना क्या है? यही तो हमारा मन है. मन को हमने सदियों से ऐसे ही तैयार किया है. कभी खानदान के नाम पर, कभी नौकरी के नाम पर, कभी किए गए कुछ कामों के आधार पर. हमें मन अभिमान से भरता रहता है. वह भूल जाता है कि जिस दिन जीवन से दया, करुणा और प्रेम का भार निकल जाएगा उस दिन मन की हैसियत खाली बोरी सरीखी हो जाएगी! भरी हुई बोरियों का दाम कितना होता है यह कहने की जरूरत नहीं है. लेकिन खाली बोरी... उसकी क्या कीमत? उसका तो कोई मोल ही नहीं है भरे के सामने!



तो मन में क्या होना चाहिए. मन को वजनी तो होना चाहिए लेकिन अहंकार, ईर्ष्या और कुंठा से नहीं. उसमें प्रेम, सहायता और स्नेह का वजन जरूरी है. हम जिन चीज़ों के पीछे जिंदगी भर भागते हैं, अंत में उसकी कीमती हमें बहुत अधिक नहीं मिलती. जिनके पीछे नहीं दौड़ते वह जरूर आसानी से सुलभ हो जाती है. ठीक वैसे ही जैसे बच्चा जो नहीं मानता, उसे आप वह सरलता से दिलाते हैं लेकिन जिन चीज़ों की वह जिद करता है, उसे सरलता से नहीं मिलती.

जीवन के लिए हमारे और बच्चे में कोई अंतर नहीं. जीवन दोनों में कोई भेद नहीं करता. बच्चों को अकसर सीमा का बोध नहीं होता. नहीं पता होता कि उन्हें कहां तक जाना है. लेकिन विडंबना तो यह हैै कि हममें से कई लोगों को पूरी जिंदगी ही पता नहीं चल पाता कि कहां तक जाना है.


एक छोटी सी कहानी से आज की बात समाप्त करता हूं. बहुत साल पहले की बात है. एक गांव में पंचायत ने जरूरी सामान लाने ले जाने के लिए घोड़ा गाड़ी के लिए घोड़ा खरीदने का फैसला किया. गाड़ी पहले से ही खाली पड़ी थी. घोड़ा आ गया लेकिन गांव गरीब था. कुछ ही दिनों में उनको लगा इसका खर्च उठाना मुश्किल है. तो एक समझदार (ऐसे लोग जो केवल इसलिए बुद्धिमान समझे जाते हैं क्योंकि वह आड़ी तिरछी सलाह भी ऐसे देते हैं जैसे अचूक दवा हो) आदमी ने सुझाव दिया, इसका भोजन आधा कर दीजिए. आधा कर दिया गया. घोड़ा, उसके बाद भी पूरी शक्ति से काम करता रहा.

लोगों ने कहा अरे हम तो उसे पहले ही बहुत खिला रहे थे. कुछ दिन बाद उस समझदार आदमी ने कहा खर्चा अभी भी ज्यादा है और आधा कर दीजिए. गांव वालों को लगा ठीक ही कह रहा है. क्योंकि घोड़ा अभी भी भरपूर काम कर रहा था. तो उसका भोजन और आधा हो गया. घोड़ा फिर भी काम करता रहा. तो गांव को लगा यह केवल हवा और पानी से जीवित रहेगा. एक दिन घोड़ा मर गया. उसेे मरना ही था. क्योंकि उसकी भी सीमा थी. हर चीज़ की एक सीमा है.

उस सीमा को समझिए. अपनी जिंदगी में ऐसे समझदार आदमी से बचिए जो अपने थोड़े से फायदे के लिए किसी का जीवन समाप्त कर सकते हैं. अपने मन को हल्का, स्वस्थ और अनुरागी बनाइए. उसमें करुणा का वजन डालिए. लेकिन उसे अहंकार और कुंठा से दूर रखने की कोशिश कीजिए.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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