#जीवनसंवाद : स्नेह पर धूल!

#जीवनसंवाद : स्नेह पर धूल!
#जीवनसंवाद : स्नेह पर धूल!

#JeevanSamvad: इस कोरोना संकट के समय में जितना भी अतिरिक्त समय हम को हासिल है. उसका उपयोग संबंधों की जड़ों को सींचने में करना है, तनों को सहारा देने में जिससे हमारे प्रेम रूपी जीवन को संबल मिलता रहे.

  • Share this:
प्रेम, अनुराग और स्नेह पर भी धूल जमना संभव है! पहली नजर में भले यह थोड़ी अचरज वाली बात लगे, लेकिन मनोविज्ञान के नजरिए से देखेंगे तो यह बात एकदम सामान्य सी लगेगी. हम जिन लोगों के समय में रहते हैं, साथ रहते हैं. जिनसे संपर्क नियमित रूप से बना रहता है. स्नेह की धारा उनके साथ सतत रूप से बहती रहती है. लेकिन जैसे ही इसमें अंतर पैदा होता है. प्रेम नदी की गति धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगती है. कुछ है जो थोड़ा-थोड़ा ठहरने लगता है. बाहर से एकदम नहीं दिखता लेकिन भीतर कुछ दरकने तो लगता है. भारत में इसीलिए इतने तरह के उत्सव हैं, मिलने जुलने के प्रसंग रचे गए. जिससे सामाजिकता बनी रहे. साथ खड़े होने का अभ्यास बना रहे.

एक-दूसरे साथ खड़े रहने जैसा ही है इसका दिखते रहना. कुएं में पानी कम ज्यादा होता रहता है. लेकिन जब तक दिखता रहता है तब तक भरोसा बना रहता है. इसमें आशंका के भंवर नहीं बनते. इसलिए होने के अहसास को कभी कमतर नहीं समझना चाहिए.

इस कोरोना संकट के समय में जितना भी अतिरिक्त समय हम को हासिल है. उसका उपयोग संबंधों की जड़ों को सींचने में करना है, तनों को सहारा देने में जिससे हमारे प्रेम रूपी जीवन को संबल मिलता रहे. 'जीवन संवाद' को मिलने वाले प्रश्नों में अक्सर इस बात का उल्लेख होता है कि कोई किसी को समझने की कोशिश नहीं कर रहा.



शिकायतें गहरी होती जा रही हैं. शिकायत बढ़ने से तनाव की खरपतवार तेज़ी से उगती है. प्रेम उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ता, जितनी तेज़ी से शिकायत. यह स्वाभाविक है, बस इन्हें जमने नहीं देना है. मन में गहरे नहीं बैठने देना है. मन में जमे कचरे से भीतर का उजाला संकट में आने लगता है. इसलिए स्नेह पर धूल नहीं जमने देना है. धूल मन में जितनी गहरी बैठती जाती है संबंधों में पीड़ा उतनी ही बढ़ती जाती है. जितना मन के भीतर होगा, कष्ट उतना ही गहरा होता जाएगा. इसलिए हमें इस बात का निरंतर अभ्यास करना चाहिए कि हम अपने जीवन को ऐसे छोटे-छोटे मैल जमने से बचा सकें.




यह बहुत मुश्किल काम नहीं है. हां, हमें इसका अभ्यास नहीं है. हमारी आदत नहीं है. जो चीज हमारी यादों में शामिल नहीं होती, हमारी जिंदगी से धीरे-धीरे बाहर होती जाती है. भले ही वह कितनी ही वैज्ञानिक बात क्यों ना हो. ‌ मन को विज्ञान और कुज्ञान से कोई लेना-देना नहीं होता. उसे तो आप जिस रास्तेे दौड़ा देते हैं वह उस रास्ते सरपट दौड़ने लगता है.


घोड़े को मंजिल से क्या वास्ता. उसे तो आप जिधर चाहे उधर ले जाएं. जब तक उसकी लगाम आपके हाथ में हैं, वह आपके बताए रास्ते पर ही चलेगा. उसे अच्छे/बुरे, वैज्ञानिक/अवैज्ञानिक, उचित/अनुचित से कोई सरोकार नहीं. वह तो आपके आदेशों का पालन करने के लिए तत्पर है. उसकी ट्रेनिंग ही कुछ ऐसी हुई है. हमने देखा है कि एक पतली सी जंजीर से विशाल हाथी बंधा रहता है. उसके मन में कभी इस बात का ख्याल नहीं आता कि इसे तोड़कर आजाद हो सकता है. क्योंकि बचपन से उसे यही सिखाया गया है. यहां हाथी की जगह उसके मन को पढ़िए.

मन को जैसी ट्रेनिंग दी जाए. वह उसके अनुकूल ही काम करता है. अगर मन को प्रेम, अनुराग और स्नेह से वंचित रखेंगे. इन पर धूल जमने देंगे. तो वह उसी में रम जाएगा. वह संबंधों केे प्रति सतर्क नहीं हो सकता. सहज नहीं हो सकता. मन को ऑक्सीजन देने का काम प्रेम का है. उसे स्वस्थ रखने का काम, प्रेम का है. इसलिए उसके प्रति सतर्कता सबसे जरूरी है.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें:

#जीवनसंवाद: मन के अंधेरे!

#जीवनसंवाद: आज में जीना!
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading