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#जीवनसंवाद : लॉकडाउन और हिंसा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 29, 2020, 10:50 AM IST
#जीवनसंवाद : लॉकडाउन और हिंसा!
#जीवनसंवाद : लॉकडाउन और हिंसा!

#JeevanSamvad: लॉकडाउन खत्म हो जाएगा, लेकिन जिन बच्चों और महिलाओं को इस दौरान हिंसा का सामना करना पड़ रहा है उनके घाव भरने में बहुत वक्त लगेगा. हिंसा के जख्म शारीरिक कम, मानसिक अधिक होते हैं.

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  • Last Updated: April 29, 2020, 10:50 AM IST
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परिवार के साथ रहने के लिए तरसते लोग मन की मुराद पूरी होते ही इस तरह बदल जाएंगे किसने सोचा था. कोरोना के पहले तक हर कोई यही बात करता रहता था कि उसे परिवार के साथ रहने का समय नहीं मिल रहा. बच्चों के साथ समय बिताना मुश्किल है. जब ऑफिस जाते हैं तो बच्चे सोते रहते हैं, लौटते हैं तो बच्चे सोते मिलते हैं. बड़े शहरों, महानगरों की तो कम से कम यही कहानी थी. लेकिन कोरोना के बाद एक महीने से अधिक समय में यह सब कुछ इतनी तेजी से बदला है कि जिसकी हमने कभी अपेक्षा, कल्पना तक नहीं की थी.

अब तो हर कोई घर पर है. जो लोग कहीं फंसे हुए हैं, दूसरों की शरण में हैं. उनको छोड़ दिया जाए तो भी बहुत सारे लोग परिवार के साथ हैं. इसमें परिवार के सभी वर्गों के लोग शामिल हैं. राजा से लेकर फकीर तक, मंत्री से लेकर आमजन तक सभी के पास परिवार के साथ रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं. ऐसे मुश्किल वक्त में जब अलग-अलग जगह से संकट बढ़ता दिख रहा है भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सबसे अधिक जरूरत मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने की है. परिवार के बीच बढ़ी घरेलू हिंसा, बच्चों और महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार में भारी बदलाव की जरूरत बता रहे हैं.

हमें ध्यान रखना होगा कि जिन्हें हम युवा कह रहे हैं, जो इस समय माता-पिता की भूमिका में हैं. उनके ऊपर दोहरी जिम्मेदारी है. पहली अपने बच्चों को संभालने की, दूसरी उन्हें संभालने की जिनके वह स्वयं बच्चे हैं. बचपन और बुढ़ापा हमारी उम्र के दो अलग-अलग लेकिन एक जैसे स्वभाव के पड़ाव हैं. जीवन संवाद को मिलने वाले ई-मेल और संदेशों में इस बात का जिक्र है कि बच्चे बात नहीं सुन रहे और माता-पिता को चुनौती समझाने में असुविधा हो रही है.



इससे उबरने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप यह समझें कि हम असामान्य परिस्थितियों में हैं. आप जब तक बाहर जाते रहे हैं बाहरी दुनिया का हिस्सा रहे हैं. आप दुनिया को ज्यादा अच्छे से समझ रहे हैं, इसलिए आपको ही यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी. आपको बच्चों को समझाना होगा. उनके बीच रहते हुए अपने कामकाज को निपटाने की आदत विकसित करनी होगी. अभी हम छोटी-छोटी बात से परेशान होकर उनके साथ हिंसा कर बैठते हैं. इसकी सफाई में हम यही कहते हैं कि यह कोई नई बात नहीं बचपन में हमारे साथ भी सब हुआ था.




ऐसा कहते हुए हम भूल जाते हैं कि बचपन में हमें प्रेम देने के लिए आसपास एक पूरा माहौल था. रिश्तेदारों और पड़ोसियों की बड़ी फौज थी जो गुस्से और प्रेम का संतुलन बनाए रखती थी. अब ऐसा नहीं है बड़ी संख्या में परिवार अकेले हैं. ऐसे परिवारों को आजकल एकल परिवार (न्यूक्लियर फैमिली) कहा जाता है. असल में ऐसे परिवारों में बच्चे सबसे अधिक परेशान हैं. क्योंकि हमारे हिस्से में जो दादा-दादी, चाचा-चाची और परिवार के दूसरे लोगों का प्रेम सहज ही आ जाता था अब इन सब की जिम्मेदारी केवल माता-पिता पर है.

इससे इन परिवारों में माता-पिता की भूमिका निभा रहे दंपतियों पर बहुत अधिक दबाव है. वह सबके हिस्से का प्यार तो नहीं दे सकते लेकिन वह अपने अनियंत्रित गुस्से के कारण बच्चों को बहुत अधिक हिंसा दे रहे है. यह लॉकडाउन देर सवेर खत्म हो जाएगा, लेकिन जिन बच्चों और महिलाओं को इस दौरान हिंसा का सामना करना पड़ रहा है उनके घाव भरने में बहुत वक्त लगेगा. हिंसा के जख्म शारीरिक कम, मानसिक अधिक होते हैं. इसलिए इस समय यह बहुत जरूरी है कि हमारी दिनचर्या में कुछ रचनात्मकता हो. सकारात्मकता हो. जिससे ऊर्जा गुस्से की ओर जाने की जगह प्रेम की ओर बढ़े. बच्चों को बहुत अधिक समझाने से कुछ हासिल नहीं होता. जब तक हम व्यवहार में उनके सामने उदाहरण न रख सकें.

बहुत अधिक समझाने की जगह हमें स्वयं में थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन करना होगा. हर चीज़ को बहुत बड़ा और अपने अहंकार से जोड़ने की जगह समन्वय की ओर जाना होगा. इसी तरह अपने माता-पिता को हर स्तर पर तर्क के सहारे समझाने की जगह भावनात्मक ऊर्जा का उपयोग करना होगा. स्वयं को नियंत्रित और स्नेह के धागे में बांधकर ही आप रिश्तों का खूबसूरत स्वेटर बुन सकते हैं. गुस्से से तो इसके फंदे बिगड़ते ही जाएंगे. यह उलझता ही जाएगा. लॉकडाउन पूरी दुनिया का संकट है. इसे अपना निजी संकट मत बनाइए. सहने का अभ्यास कीजिए. यह गुजरने ही वाला है, लेकिन इस दौरान अपने व्यवहार से बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के मन में हिंसा, और तनाव के बीज बोने से हर संभव बचना होगा. ऐसा नहीं करने से हम इस संकट के बाद इससे कहीं अधिक भारी संकट की ओर बढ़ जाएंगे.

दयाशंकर मिश्र
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First published: April 29, 2020, 10:50 AM IST
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