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#जीवनसंवाद : आत्महत्या कैसे टलेगी!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 22, 2020, 7:13 PM IST
#जीवनसंवाद : आत्महत्या कैसे टलेगी!
#जीवनसंवाद : आत्महत्या कैसे टलेगी!

#JeevanSamvad: जीवन से प्रेम कीजिए. उसे ठुकराने के विचार जब कभी मन में आए संवाद कीजिए. अगर आपके पास कोई सुनने वाला नहीं है. तो खोजिए. वह अवश्य ही कहीं आसपास है.

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बात पुरानी है. लगभग पच्चीस साल पुरानी. एक बहुत स्वस्थ और प्रतिभाशाली छात्रा ने अचानक एक दोपहर न जाने किस बात से नाराज होकर जीवन से विदा लेने का फैसला किया. जब मैं स्कूल पहुंचा तो पता चला उसने अपनी जीवन को समाप्त करने का फैसला कर लिया था. हम एक ही स्कूल में नहीं पढ़ते थे, वह हमारी नजदीकी रिश्तेदार की बहुत लाडली और सौ में से लगभग इतनी ही नंबर लाने वाली बिटिया थी. उसकी रुचि गणित और विज्ञान में बहुत अधिक थी. जबकि मेरा रुझान इन विषयों की ओर अधिक नहीं था. यह भी सच है कि मेरे और उसके नंबरों में बहुत अधिक अंतर था!

इसके बाद भी हम एक दूसरे से परिचित थे क्योंकि हम बचपन से एक-दूसरे को जानते थे. हम घनिष्ट रिश्तेदार थे. उसने जब उस दोपहर अपना फैसला सुनाया, तो उस वक्त घर पर कोई नहीं था. उसके व्यवहार में कोई भी ऐसी चीज़ नहीं मिली जिससे उसके परेशान होने का प्रमाण मिलता. हां, यह जरूर संभव है कि उसे किसी बात का बुरा लगा हो. क्योंकि साफ कहना और अपनी बात पर लड़ जाना उसके स्वभाव का हिस्सा था. हम सबके अपने-अपने स्वभाव होते हैं. जैसे आम होते हैं. बबूल होते हैं. नीम और कटहल भी होते हैं. उसका भी अपना स्वभाव था. लेकिन उसके स्वभाव में इस तरह का निरीह समर्पण होगा. इसका मुझे अंदाज़ा नहीं था.

उसके पहले मैंने उसके पिता जितना किसी दूसरे पिता को अपनी बिटिया को प्रेम करते नहीं देखा था. पिता उस पर बहुत गर्व करते थे. उन पिता को मैं भोपाल जाने पर मिलता ही हूं, आगे के वर्षों में हमारी उनसे समझ गहरी होती गई. लेकिन उनके भीतर का खालीपन स्थाई है. उसे इस जीवन में भरता मैं नहीं देखता. उनकी गहरी आध्यात्मिक अभिरुचियों ने उनके परिवार को बहुत हद तक बिखरने से बचाया है. मेरे जीवन में किसी के आत्महत्या का यह पहला प्रसंग था. उसके पहले जिन लोगों के बारे में यह सुनाई देता था, वह मुझसे तनिक दूरी पर थे. उनसे इतने निकट के परिचय नहीं थे.



अपनी पूरी ऊर्जा लगाने के बाद मैं यह समझ पाया था कि उसे कोई ऐसी बात चुभ गई थी, जिसने उसके अस्तित्व पर उसकी दृष्टि में सवाल खड़े कर दिए थे. क्या जरूरी नहीं कि जो बहुत अच्छे नंबर लाता हो, बहुत सफल दिखता हो. भीतर से ठोस और मजबूत हो. यह भी जरूरी नहीं कि हमारी नजर में सफल व्यक्ति अपनी दृष्टि में बहुत सुखी हो. अगर ऐसा होता तो सफल और मेधावी लोग आत्महत्या क्यों करते! उसके बहुत बाद, मैंने अपने आसपास दो ऐसे नौजवान लोगों को आत्महत्या करते पाया जो बाहर से बहुत सुखी दिखते थे.




ध्यान रहे यहां जिस छात्रा की बात हो रही है वह भी बाहर से बहुत सुखी दिखती थी. इस तरह यह तीन लोग उस उम्र से थे जिसमें कोंपले फूटती हैं. तरंगें उठती है. मन नए सपने बुन रहा होता है. फिर इन्होंने यह रास्ता क्यों चुना.

जो लोग आत्महत्या के बहुत किनारे से लौट आए हैं. उनके अनुभव हमारे बहुत काम के हैं. यह बताते हैं कि गहरी नाराजगी, कई बार क्षणिक भी, गुस्सा, दूसरे को सबक सिखाने की जिद, अपनी बात सही सिद्ध करने का अहंकार, प्रेम का टूटा तार, हृदय को इतना विचलित कर देता है कि वह नियंत्रण में नहीं रहता. किसी तरह उन दो से चार मिनटों को संभाल लिया जाए तो खतरा से टल जाता है. हम सबने चेखव की कहानियां पढ़ी हैं. उनकी एक कहानी में कोचवान, जो अपने मन पर लगे बोझ, दुखों के पहाड़ को रात में घोड़े को सुनाते हुए दूर करना चाहता है अक्सर मेरी स्मृति में ठहरता रहता है.


ज़रा उसकी मनोदशा पर जाइए. उसके आसपास कोई नहीं है तो वह घोड़े को ही पूरी कहानी सुना कर अपना मन हल्का कर लेना चाहता है. लेकिन इन सब के आसपास बहुत सारे लोग थे. लेकिन वह न तो सुन सके, न यह लोग अपनी बात उन्हें समझा सके.

हमारा मन अंधेरी गुफा की तरह है. अगर उसमें गहरे साथ के उजाले नहीं होंगे. प्यार और विश्वास के पक्के रंग नहीं होंगे. सब कुछ सही लेने का विश्वास नहीं होगा. तो आत्महत्या कम नहीं होंगी. सब कुछ जरूरी है दोस्तों, लेकिन जिंदगी से बड़ा कुछ नहीं.


उनकी आंखों में देखा है, मैंने दुख की अनगिनत परतों को जिन्होंने अपनों को अपने सामने मुंह चुराकर मरते देखा है. उन मां-बाप के आंसू तो रुक जाते हैं, जिनके बच्चे इस तरह के फैसले कर लेते हैं. लेकिन उनकी जिंदगी की रोशनी धुंधली पड़ने लगती है. जीवन की लौ कमजोर होती जाती है. पूरी उम्र वह किसी श्रापित की तरह बिताने लगते हैं, उन प्रश्नों की खोज में, जिनसे उनकी संताने हार गई थीं!

मैं यहां फिर निवेदन करूंगा कि ज़िंदगी सबसे बढ़कर है. वह किसी भी अपमान/ दुख दर्द/पीड़ा से बढ़कर है. जिन प्रश्नों के उत्तर मनुष्य जिंदा रहकर नहीं खोज सकता वह मारकर कभी नहीं मिल सकते. जिस दुनिया को आप जीते जी नहीं बदल पाए उसे मर कर कैसे बदला जा सकता है! आत्महत्या एक सज़ा है, उनके लिए जिनसे आप सबसे गहरा प्रेम करते हैं. अनुराग करते हैं. लाड़ करते हैं.

जीवन से प्रेम कीजिए. उसे ठुकराने के विचार जब कभी मन में आए संवाद कीजिए. अगर आपके पास कोई सुनने वाला नहीं है. तो खोजिए. वह अवश्य ही कहीं आसपास है. अगर उसे मिलने में थोड़ी भी दिक्कत हो रही है. तो आप हमसे संपर्क कर सकते हैं. बस, इतना ध्यान रहे जीवन से बढ़कर कुछ नहीं! शुभकामना सहित ....

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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First published: May 14, 2020, 8:53 AM IST
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