#जीवन संवाद : दुःख के बीज!

#जीवन संवाद : दुःख के बीज!

#जीवन संवाद : दुःख के बीज!

#JeevanSamvad: मन में बैठे जालों को साफ करना, उतना ही जरूरी है जितना ड्राइंंग रूम में एक-एक चीज़ को चमकाते रहना. दुख के बीज इन जालों में अटके रहते हैं, वहीं से हमारी धमनियों में धीरे-धीरे दुख प्रवाहित करते रहते हैं.

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हम किसी से पूछें कि तुम किसके कारण दुखी होते हो, तो वह अपने अतिरिक्त सारे नाम गिना देता है. उसकी सूचियां बहुत लंबी होंगी. इतनी लंबी होंगी कि कहीं थम नहीं पाएंगी. लेकिन ऐसी सूची में वह सत्य नहीं होता जो हम से कह सके कि यह सब व्यर्थ है. नदी देखी ही होगी, आपने! वह बहती तो किनारों के साथ हैं, लेकिन रहती नहीं. वह बहने के लिए जीती है. जीने के लिए बहती नहीं. बात-बात में शर्त नहीं लगाती हमारी तरह. अपनी मौज में वह लगभग वैसे ही यात्रा पर है, जैसी यात्रा पर हम. नदी और हम, दोनों एक सरीखी यात्रा पर हैं. लेकिन हमारा स्वभाव नदी की तरह नहीं. हम जीवन में जगह-जगह बांध बनाते जाते हैं.

छोटे-छोटे सुख की अभिलाषा में दुःख के बीज बोते जाते हैं. हमें बीज बदलने पर ध्यान देना है, फल बदलने से कुछ नहीं होगा! यह प्रकृति का सरल नियम है कि फल बीज के अनुसार ही होते हैं. लेकिन हम इसे जीवन में उल्टा समझ बैठे हैं. कल देर रात किसी मित्र ने मुझे एक फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट भेजा. जिसमें 'जीवन संवाद' के एक लेख के छोटे से हिस्से पर असहमति दर्ज की गई थी. यह निंदा थी, आलोचना नहीं. आलोचना में प्रेम होता है, निंदा में ऐसा होना जरूरी नहीं . वह बहुत दुखी थे, कि जिसने ऐसा लिखा है, उसे बिना पढ़े ही यह सब नहीं लिखना चाहिए था.

मैंने आग्रहपूर्वक उनसे निवेदन किया, अगर कोई सचमुच में तुम्हें दुःखी करना चाहता है, तो कभी ऐसा मत होने देना. हमें अपने विवेक और ऊर्जा का उपयोग करने में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए. खासकर, मानसिक उर्जा! यह बहुत कमाल की चीज़ है. दूसरे के दिए हुए दुख से दुखी होते रहना तो पंचतंत्र वाली उस कहानी जैसी बात हुई कि 'शिकारी आता है, जाल फैलाता है, हमें जाल में नहीं फंसना चाहिए' सारे तोते यही रटते हैं. जाल में फंसते रहते हैं.


शिकारी उनको जाल में नहीं फंसाता. वह अपनी मूल्य विहीन और रटंतू शिक्षा के कारण ऐसा करते हैं. जबकि तोतों को शिक्षा देने वाले का उद्देश्य पवित्र और हितकारी था. इसलिए अच्छे उद्देश्य की शिक्षा से ही काम नहीं बनेगा, उसका जीवन से भी गहरा लगाव होना चाहिए.


हमारी शिक्षा-दीक्षा भी जंगल के उन तोतों से बहुत अलग नहीं है. हमें भी जीवन का पाठ कुछ इसी तरह रटाया गया है. यह बीज हमारे मन पर इस तरह बोए गए हैं कि हमारा मन निरंतर जटिल, कुटिल और संदेश से परिपूर्ण रहता है. मन में बैठे जालों को साफ करना, उतना ही जरूरी है जितना ड्राइंंग रूम में एक-एक चीज़ को चमकाते रहना. दुख के बीज इन जालों में अटके रहते हैं, वहीं से हमारी धमनियों में धीरे धीरे दुख प्रवाहित करते रहते हैं. इसीलिए, आपने देखा होगा कि कुछ लोगों का स्वभाव हमेशा प्रसन्न चित्त रहता है. वह छोटी-छोटी बातों पर भी खिलखिलाते रहते हैं.

जैसे फूल खिलते हैं. फूल आपके स्वभाव के अनुकूल नहीं खिलते, वह खिलते हैं, क्योंकि यही उनका स्वभाव है. इसी तरह कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर छोटी-बड़ी बात पर दुखी होने का अवसर तलाशते रहते हैं. आपके आसपास जिस तरह के लोग होंगे, आपके मन के वैसे ही होने की संभावना बनी रहेगी. इसलिए दुख के बीज पहचानने का अभ्यास करते रहना होगा. इस काम में मेरी ओर से जो भी सहयोग होगा, उसके लिए मैं हमेशा की तरह हाजिर हूं.



दयाशंकर मिश्र

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:

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