लाइव टीवी

#जीवनसंवाद: कोरोना का डर और प्रकृति!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: March 23, 2020, 7:40 PM IST
#जीवनसंवाद: कोरोना का डर और प्रकृति!
जीवन संवाद

हर संकट के साथ हम सुरक्षा के उपाय तो बढ़ाते हैं, लेकिन दुनिया में कम होती नैतिकता, किसी भी तरह सब कुछ हासिल करने की जिद की ओर हमारा ध्यान बिल्कुल नहीं जाता. प्रकृति बहुत धीमी आवाज में संवाद करती है, उसे सुने बिना ऐसे संकट हल नहीं होंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2020, 7:40 PM IST
  • Share this:
अब तक हमारे सामने करोना को लेकर जितने अधिक तथ्य हैं उससे कहीं अधिक भ्रम और डर है. भ्रम और डर से भी अधिक जो चीज़ परेशान करने वाली है, वह है प्रकृति के संकेतों की निरंतर अवहेलना. सामान्य प्राकृतिक सिद्धांतों के विपरीत होती जीवन शैली. हम कहने को आधुनिक हो रहे हैं, लेकिन हमारे विश्वास का स्तर निरंतर उथला होता जा रहा है. करोना का संकट तो नया है, लेकिन इसके पहले भी हम स्वाइन फ्लू और दूसरे संक्रामक संकटों से जूझते रहे हैं. हर संकट के साथ हम सुरक्षा के उपाय तो बढ़ाते हैं, लेकिन दुनिया में कम होती नैतिकता, किसी भी तरह सब कुछ हासिल करने की जिद की ओर हमारा ध्यान बिल्कुल नहीं जाता. प्रकृति बहुत धीमी आवाज में संवाद करती है, उसे सुने बिना ऐसे संकट हल नहीं होंगे. ‌‌‌

करोना, इससे पहले खतरनाक वायरस से जुड़े जो दूसरे बड़े संकट सामने आए हैं, उनका चीन से गहरा संबंध है. लेकिन यह अकेले चीन का प्रश्न नहीं है. हम 'विकास' के संवाद में इतने अधिक डूबे हैं कि हमें इस 'वन- वे रोड 'जैसी जीवन योजना की खामियां आसानी से नहीं दिखती.


बहुत से भारतीय चीन की शासन शैली और तानाशाही रवैया की तारीफ करते दिखते हैं. ऐसे तमाम लोगों का मानना है कि समाज को सुधारने और आगे ले जाने के लिए हर तरह की कठोरता सही है. जबकि यह सामान्य प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध आचरण है. चीन में नागरिक, मानवीय और प्राकृतिक मूल्यों की गहरी अनदेखी के कारण पहले घर पर्यावरण के गंभीर संकट (आपको धूल, धुंध की चादर से ढंके रहने वाले चीन के शहरों विशेष रूप से बीजिंग की तस्वीरें याद होंगी) खड़े हुए. अब वहां से इस तरह के वायरस सामने आ रहे हैं, जिनके उठने के ठोस कारण अभी सामने आने बाकी हैं. वहां की शासन प्रणाली कुछ ऐसी है कि सभी बातें सही तरीके से जल्द सामने नहीं आती.



प्रकृति के नियमों को समझाने के लिए भारतीय जीवन शैली में बहुत ही सामान्य सा नियम है- अति सर्वत्र वर्जयेत. इसका अर्थ है, हर चीज की अति बुरी है. प्रकृति हमारी और आपकी तरह अपनी आपत्तियों को क्रोध और चिल्लाहट के साथ दर्ज नहीं कराती. वह धीमे-धीमे अपने गुस्से को प्रकट करती है. पहाड़, नदियां, तूफान और सेहत के अनसुलझे, कठिन होते सवाल कहीं ना कहीं हमें यह संकेत कर रहे हैं कि प्रकृति से हमारे संवाद में दूरियां बढ़ गई हैं.



पर्यावरण के प्रश्न अब हमारे लिए नितांत अप्रासंगिक होते जा रहे हैं. गांधी अक्सर कहते थे, प्रकृति हमारी सभी जरूरतों को पूरा कर सकती है लेकिन उसमें किसी एक आदमी के भी लालच को पूरा करने का सामर्थ्य नहीं.


हम पर्यावरण, जल जंगल और जीव से जुड़े प्रश्नों पर एकदम मौन हो गए. हर चीज को हमने अपनी शहरी सुविधा और सुख से जोड़ लिया है. शहरी समाज का प्रकृति के साथ व्यवहार पहले रूखा हुआ, अब दुश्मनी जैसा होता जा रहा है. जरूरी है कि हम बच्चों के 'एनवायरमेंट- प्रोजेक्ट' से आगे बढ़कर पर्यावरण के लिए गंभीर हों. अभी हमारी चिंता केवल उनको अच्छी-अच्छी बातें सिखा कर उनके प्रोजेक्ट पूरे करने में है. इसके आगे के सारे प्रश्न वहीं के वहीं पड़े हैं. यकीन ना हो तो देखिए भारत में हर साल धूल और गुबार से लिपटे रहने वाले शहरों की संख्या कितनी बढ़ती जा रही है. इस पर हमारे समाज, सरकार का रवैया कितना मौसमी होता जा रहा है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि हमने इसे सबसे बड़ा सवाल नहीं बनाया है. जब तक हम धार्मिक उन्माद और हिंसा से बाहर निकलकर प्रकृति के मूल प्रश्नों की ओर नहीं लौटेंगे ऐसे वायरस बार-बार हमारी ओर आते रहेंगे. कहीं अधिक मजबूत होकर. हमें इनके अस्थाई प्रबंधों के मुकाबले स्थाई और प्राकृतिक समाधान की ओर बढ़ना होगा.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

ये भी पढ़ें-
#जीवनसंवाद: भावी दुख का डर!

#जीवनसंवाद : कोरा मन !

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए जीवन संवाद से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: March 20, 2020, 12:16 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading