#जीवन संवाद : ख़ुद को माफ़ करना!

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#JeevanSamvad: बचपन में जो गुण आपको सफल बनाते थे, जरूरी नहीं जिंदगी की कड़ी धूप मेंं वही काम आएं. मौसम के हिसाब से जरूरतें बदल जाती हैं.

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दूसरों को माफ करना अच्छी बात है. हमें हमेशा से यही सिखाया गया है. बहुत से लोग यह करने की कोशिश भी करते हैं. लेकिन दूसरों को माफ़ करते रहते हुए अक्सर हम भूल जाते हैं कि हमें ख़ुद को भी माफ करना है. ख़ुद को माफ़ नहीं करने के कारण मन निराशा की ओर बढ़ता जाता है, जिसमें हर चीज़ के लिए हम स्वयं को जिम्मेदार मानने लगते हैं.

इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरों को क्षमा करना आसान है. दूसरों को क्षमा करना मुश्किल काम है. लेकिन उससे भी मुश्किल होता है, जीवन के ऐसे निर्णयों के लिए खुद को क्षमा करना, जिसकी वजह से आपके और आपके चाहने वालों के जीवन में कुछ हलचल हुई हो. हम कई बार अपनी सीमाएं भूलते जाते हैं, हमें लगता है हम एक सुपर हीरो हैं जो सब कुछ संभाल सकता है.

बच्चों के साथ ऐसा होता है, उन्हें अपने माता-पिता में सुपर हीरो नजर आते हैं. उनके कोमल मन के लिए यह अच्छा भी है. उन्हें हमेशा भरोसा रहता है कि आप सब कुछ संभाल लेंगे. लेकिन जो उम्र के नए-नए पड़ाव पार करते जा रहे हैं, उनके लिए ठीक नहीं है. किसी दूसरे की अपेक्षा हमें ख़ुद से बहुत अधिक आशाएं होती हैं. इन आशाओं के कारण हमारी अपेक्षाएं आसमान छूती रहती हैं. यह अपेक्षा दूसरे किसी से नहीं स्वयं से ही होती है. आप स्कूल के दिनों से अच्छे नंबर लाते रहे हैं. कॉलेज के दिनों में भी आपका प्रदर्शन शानदार रहा है. लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल भी नहीं कि जिंदगी की दौड़ में भी आप ऐसा ही कर पाएं. एकदम यही प्रदर्शन दोहरा पाएं.



निराशा, अत्यधिक आशा से ही उपजती है. इसका अर्थ यह नहीं कि आशा ना रखी जाए. बल्कि इसका केवल इतना मतलब है कि जब कोई आशा रखी जाए तो यह देखा जाए कि उसके लिए कौन-कौन से गुण की जरूरत है. इन गुणों को पुराने दिनों से मत जोड़ते रहिए. जीवन संवाद को मिल रहे ई-मेल और संदेशों में अक्सर यह जिक्र होता है कि हमारे भीतर तो बचपन से ही बहुत सारे गुण थे, लेकिन आगे चलकर जिंदगी की गति ठीक नहीं रही. इसके बाद लोग भविष्यफल बताने वालों और ऐसे लोगों के चंगुल में फंसते जाते हैं जो कभी अपना भविष्य नहीं संवार सके.

बचपन में जो गुण आपको सफल बनाते थे, जरूरी नहीं जिंदगी की कड़ी धूप मेंं वही काम आएं. मौसम के हिसाब से जरूरतें बदल जाती हैं. गर्मियों मेंं आपको छाता चाहिए. बारिश में रेनकोट और ठंड मेंं गरम कपड़े. शरीर तो एक ही है फिर अलग-अलग मौसम में अलग-अलग जरूरत किसलिए! यही फार्मूला जिंदगी पर लागू होता है.


जो लोग इसे समझ पाते हैं वह छोटी मोटी उलझन और असफलता के लिए ख़ुद को कसूरवार नहीं समझते. संभव है, आपके निर्णय गलत हुए हों. संभव है, आपने गलत नौकरी चुनी हो. कुछ भी गलत चुना जा सकता है. लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आप गलत हैं. स्वयंं को माफ करने का यही अर्थ है. बहुत से लोग खुद को माफ़ नहीं करने के कारण गंभीर बीमारियों की ओर बढ़ते जाते हैं. हाइपरटेंशन, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसी बीमारियां हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को प्रभावित करती हैं. इनके केंद्र में स्वयं के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता, चिंता और सबके हिस्से की पीड़ा सहते रहना शामिल है.

दुनिया का ख्याल रखना बहुत अच्छी बात है. लेकिन उससे भी अच्छी बात है, स्वयं के मन को प्रसन्नचित्त और स्वस्थ रखना.

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