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#जीवनसंवाद : सुख के बाग!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 10:21 PM IST
#जीवनसंवाद : सुख के बाग!
#जीवनसंवाद : सुख के बाग!

#JeevanSamvad: जिसके पास नहीं है, वह असहज नहीं होता. अधिक कष्ट में वही होता है जिसने सुख के ऐसे बाग लगा लिए हैं, जो केवल भौतिक चीजों की मौजूदगी से ही शीतल हवा देते हैं. हम सब यह भूल गए हैं कि संघर्ष हमारेेेे जीवन का हिस्सा है.

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बहुत पुरानी बात नहीं है. जब हमारे जीवन का नियम आज की तुलना में कुछ उल्टा था. हम लोगों के साथ पर अधिक ध्यान देते थे. चीज़ों पर कम! एक-दूसरे की मदद और सहयोग जीवन का सबसे बड़ा गुणधर्म था. समाज में ऐसे व्यक्तियों की निंदा की जाती थी जो भले ही आर्थिक रूप से सक्षम हो लेकिन अगर वह दूसरों की मदद नहीं करते, अपने ही परिजनों को भुला देते तो इसे रास्ते से भटकना माना जाता था. लोग उसे समझाने जाते थे जो परिवार से दूर हो जाता था. समय की करवट देखिए अब उसे समझाने की कोशिश की जाती है जो परिवार में सबके साथ रह रहा हो. संयुक्त परिवार और एक-दूसरे का साथ देने को 'पुराने' ज़माने की बात कहा जाने लगा.

धीरे-धीरे हमने उदारीकरण (ग्लोबलाइजेशन) के प्रभाव को समझना शुरू किया. हमने ठीक से समझा कि हम कितने पिछड़े समाज हैं. हमने सुख को सुविधा में देखना शुरू कर दिया. जीवन के मूल गुणधर्म, जिसे हम सामान्य भाषा में समझने के लिए क्वालिटी ऑफ लाइफ/ नैतिक मूल्य भी कह सकते हैं उनसे दूरी करनी शुरू कर दी. हमारी बात का जो मूल्य था वह धीरे-धीरे कम हो गया. मैं जो कहता हूं वही करता हूं, यह वाक्य समाज से इतना गायब हो गया कि जब फिल्मों में इसे दोहराया गया तो लोग तालियां पीटने लगे. जनता को लगा कितने कमाल की बात कह रहा है. वह भूल गई थी कि नायक केवल उसकी बातों को दोहरा रहा है. हमारी याददाश्त कमजोर होने लगी. हमने सुख के परंपरागत जंगलों को काटना शुरू कर दिया और सुख के नए बाग लगाने की तरफ बढ़ने लगे.

थोड़ा ध्यान दीजिए तो आप पाएंगे कि गांव में पार्क (उद्यान) नहीं होते. क्योंकि पूरा गांव ही प्रकृति के साथ खड़ा होता है. जबकि शहर प्रकृति को नष्ट करके बनाए जाते हैं, इसलिए वहां प्रकृति के आभास को बनाए रखने के लिए बाग (पार्क) लगाने जरूरी होते हैं. प्रकृति से समन्वय करने की हमारी कोई आदत नहीं रही है. भोपाल, चंडीगढ़ जैसे कुछ ही शहर हैं, जहां समन्वय थोड़ा-थोड़ा दिखता है. लेकिन अब वह भी मनुष्य के कब्जे की आदत के कारण गड़बड़ा गया है.




'लॉकडाउन' के कारण आर्थिक संकट एक बार फिर हमारे दरवाज़े पर आ गया है. वैसे तो इस तरह के संकट नए नहीं हैं. 2008 में भी दुनिया भर मेंं मंदी आई थी. लेकिन बारह साल पहले की मंदी में और इस संकट में केवल दो अंतर हैं. पहला, उस समय हमारेे पास जिसकी जैसी आय थी, उसके अनुसार कुछ न कुछ बचत जरूर थी. हम पहले बचत और फिर खर्च से बहुत दूर नहीं निकले थे. कर्ज़ हमारे ऊपर कम था. कर्ज़ को खराब माना जाता था. अपने बैंक खातोंं मे थोड़े बहुत पैसे होने को अच्छा समझा जाता था.





क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन जैसी चीजों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था. इसलिए थोड़े बहुत पैसे पास मेंं पड़े होते थे. उस पैसे और कर्ज़ न होने के कारण ही हम बेकार के खर्चों से बच पाए. दूसरा, उस मंदी के समय तक हमारे ऊपर नई चीजें खरीदने और पुराने से मुक्ति को लेकर इतनी आक्रामकता नहीं थी. हमारे ऊपर चीज़ों के आधार पर सुखी होने का भूत सवार नहीं था. संतोष हमारा जीवन मूल्य था. लेकिन धीरेे-धीरे हम चीज़ों के पीछे पागल होने लगे.

हमें समझाया गया कि असली सुख शॉपिंग में ही है. असली सुख बाहर के खाने में है. नैनीताल तक कभी ना गए हो लेकिन सिंगापुर तक गए बिना जीवन अधूरा है! यात्रा के लिए जब लोग कर्ज लेने लग जाएं तो समझ लें कि हम कहां जा रहे हैं.


हमारे देश में दो कंपनियां इस खेल को सबसे पहले समझीं. उन्होंने देर रात को अपनी 'सेल' शुरू कर दी. लोग दिन तो छोड़िए रात को जाग- जाग कर खरीदारी करने लगे. कितने कमाल की बात है, लोग कुछ खरीदने के लिए रात्रि जागरण कर रहे हैं. दुकानदार आराम से सो रहा है और खरीदने वाला जाग रहा है. लोग नए सामान की चाहत में बेचैन होने लगे. उसके पास है तो मैं क्यों नहीं लूं, इस भावना ने धीरे-धीरे हमें नकलची बंदर बना दिया. हम अपनी परंपरा और जीवन, लोक मूल्यों से दूर जाने लगे. मितव्ययिता और कंजूसी के बीच हम उलझ गए. मितव्ययिता के मायने हैं सोच समझकर खर्च करना. भावनात्मक आधार पर खरीदारी करने की जगह जरूरत के आधार पर खर्च करना. जबकि कंजूसी वह आदत है जो जरूरत के वक्त भी रकम खर्च न करें. हम ऐसेे लोगों को नीची निगाह से देखने लगे, जिन्होंने मितव्ययिता को चुना था.

इन दो कारणों से ही हम हर बार आर्थिक संकटों का सामना करते समय असहज हो जाते हैं. जिसकेेे पास नहीं है, वह असहज नहीं होता. अधिक कष्ट में वही होता है जिसने सुख के ऐसे बाग लगा लिए हैं, जो केवल भौतिक चीजों की मौजूदगी से ही शीतल हवा देते हैं. हम सब यह भूल गए हैं कि संघर्ष हमारेेेे जीवन का हिस्सा है. वह कोई अलग चीज़ नहीं है. जो बच्चों को हम सिखाते रहते हैं, उस पर थोड़ेे से भी अमल से हमारी दुनिया आज के मुकाबलेे कहीं सुखी हो सकती है!​

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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First published: May 4, 2020, 6:59 AM IST
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