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#जीवनसंवाद : मन को संभालना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 10:39 PM IST
#जीवनसंवाद : मन को संभालना!
#जीवन संवाद : मन को संभालना!

#JeevanSamvad: अगर आप अपनी अर्थव्यवस्था को परिवार की परंपरागत 'बजट' वाली सोच पर ले जाने में कामयाब रहते हैं तो यह संकट आपको बहुत अधिक परेशान नहीं करेगा. लेकिन इसके लिए आपका मानसिक रूप से मजबूत होना बहुत जरूरी है. जरूरी है मन को संभालने के उपाय.

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इस समय सबसे मुश्किल काम क्या है, कल की चिंता में भटकते हुए मन को संभालना. कोरोना का संकट हमारे जीवन पर ऐसे हेलीकॉप्टर की तरह मंडरा रहा है जिसका ईंधन खत्म हो चुका है, वह शहर में है. कभी भी कहीं भी गिर सकता है. हम अपने अदृश्य शत्रु से लड़ रहे हैं. जिसके बारे में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं कि वह कहां मिलेगा.

ऐसे समय में जितना अपने शरीर का ख्याल रखना जरूरी है उससे कहीं अधिक जरूरी है, अपने मन को सही तरह से संभालना. 'जीवन संवाद' को इस समय बहुत से ई-मेल, संदेश इस तरह के मिल रहे हैं, जिसमें दुविधा, निराशा और मुश्किल वक्त में हौसले की कमी दिख रही है. जब संकट गहराता है तो यह स्वाभाविक है. जिसकी नौकरी पर संकट हो, बचत डूब रही हो, जरूरी खर्चों के लिए पैसे कम पड़ रहे हो. उसका घबराना सहज है. लेकिन इस घबराहट के बीच इस बात को सबसे अधिक याद रखा जाए कि हमें इससे निकल कर आना है. हमें साथ रहना है, इन परिस्थितियों से लड़ना है और जीतना है.

इस संकट ने प्रकृति में मेरी आस्था को गहरा किया है. उस जीवन मूल्य,विश्वास को मजबूत किया, जिनको पिछले दो दशक में हमने गिरते पड़ते देखा. भारतीय जीवन शैली के सबसे मजबूत स्तंभ संयुक्त परिवार को महत्वाकांक्षा और लालच के खरपतवार के चलते छोड़ दिया गया. हां, उसमें कुछ कमियां थी. लेकिन कमियां सब में होती हैं. हर किसी में होती है, लेकिन आप सब नहीं छोड़ पाते क्योंकि ऐसा करते हुए आप डरते हैं.




संयुक्त परिवार इसलिए नहीं टूटे, क्योंकि वह हम मकान से फ्लैट में जा बसे. बल्कि इसलिए टूटे, क्योंकि हमने निजी तरक्की और एहसास को सबसे बड़ा मान लिया था. एक ही शहर और आस-पड़ोस में रहते हुए परिवारों का अजनबी हो जाना उनका टूटना था. अलग-अलग रहना टूटना नहीं है. टूटना उसे कहते हैं, जब घर आए भाई और मां को बच्चे मेहमान समझने लगते हैं. मन ऐसे ही कमजोर हुआ. मां-बाप की जिम्मेदारी को एक-दूसरे पर टालने लगे. जिंदगी यहीं से मुड़ जाती है. हम अपने संघर्ष में अकेले पड़ते जाते हैं. पहले संकट में सब साथ होते थे अब सबका अपना-अपना संकट है. इसलिए संकट बड़ा है.



पश्चिम में बहुत कुछ अच्छा है. मुझे भी पसंद है. लेकिन पूरब में सब खराब नहीं है.‌ सब कुछ‌ बदलने से कुछ नहीं बदलता. वहां परिवार नहीं हैं, सामाजिक साथ का गहरा सरोकार नहीं. हमारे यहां यह सब था लेकिन हमने इसे टूटने दिया क्योंकि यह बाज़ार के हित में था.

आपको 2008 की मंदी याद है. पूरी दुनिया की उसमें हालत खराब थी. लेकिन भारत कहीं अधिक सुरक्षित रहा. क्योंकि उस वक्त आज सरीखा पारिवारिक बिखराव नहीं था. उसके पास छोटी-छोटी पारंपरिक बचत थी. उसके खर्चे बचत के बाद शुरू होते थे. इच्छा पर बचत का नियंत्रण था. आज ऐसा नहीं है. हमारे घर बजट से बहुत आगे जा चुके हैं. बजट शब्द को हम अपमान जैसा समझने लगे. इसलिए, कोरोना और मंदी का यह मेल खतरनाक है. इससे बचने के लिए ठोस जीवनशैली और मानसिक रूप से मजबूती जरूरी है.


अभी से अपने खर्चों को नियंत्रित करना आरंभ कर दीजिए. बहुत जरूरी खर्चे, पहले नंबर पर. उसके बाद कम जरूरी खर्च. आराम और सुविधा दायक खर्चे फिलहाल बंद कर दीजिए. क्योंकि अगर आपको इनकी आदत रही तो यह आपको परेशान करते रहेंगे. भारत और दुनिया का हाल देखते हुए अगले छह से बारह महीने मुश्किल हैं.

हां, मनुष्य अपनी जिजीविषा से सब कुछ वापस हासिल करता है. लेकिन इसमें वक्त तो लगता है. अगर आप अपनी अर्थव्यवस्था को परिवार की परंपरागत 'बजट' वाली सोच पर ले जाने में कामयाब रहते हैं तो यह संकट आपको बहुत अधिक परेशान नहीं करेगा. लेकिन इसके लिए आपका मानसिक रूप से मजबूत होना बहुत जरूरी है. जरूरी है मन को संभालने के उपाय. उदासी के भंवर धीरे-धीरे मन को घेरते हैं लेकिन अगर समय रहते उनकी ओर नजर ना पड़े तो वह बड़े संकट में बदलने लगते हैं. इसलिए, मन को अकेला मत छोड़िए.


मन का हाल उस जिन्न जैसा है, जिसे हमेशा कुछ न कुछ काम चाहिए. उसे व्यस्त रखिए. रचनात्मक रखिए. अध्ययनशील और चिंतनशील रखिए. वर्तमान पर जितना अधिक ध्यान देंगे आपका तनाव उतना कम होगा. 'लॉकडाउन' को महीने में मत गिनिए. दिन से गिनिए. आज का दिन और गया. इस तरह का संकट मन को कम परेशान करेगा. मन को आशंका के पास मत जाने दीजिए. आज की आशा से जुड़े रखिए. इससे उदासी कम होती है.

अधूरे कामों को करते रहिए. परिवार के साथ गहरा संवाद रखिए. यहां परिवार का अर्थ केवल पत्नी और बच्चे नहीं हैं. वह हैं, जिनके कारण आप दुनिया में हैं, जिनके साथ आप दुनिया में अलग-अलग वक्त में रहे. हम इन सब के साथ ही इस संकट को हरा सकते हैं. सबके साथ रहिए, सुरक्षित रहिए .

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 24, 2020, 6:54 AM IST
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