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#जीवनसंवाद : परवरिश के संकट!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 10:35 PM IST
#जीवनसंवाद : परवरिश के संकट!
#जीवनसंवाद : परवरिश के संकट!

#JeevanSamvad: कोरोना संकट ने एक बार फिर समाज को यह समझाने की कोशिश की है कि प्रकृति की ओर से कोई भेद नहीं है. इसके लिए पर्यावरण और मनुष्य दोनोंं समान हैं. सारे भेद मनुष्य ने निर्मित किए. परिवार में बढ़ रहे तनाव की वजह मन में बसी श्रेष्ठता और सामंती मूल्यों की जड़ है.

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प्रकृति ने हमें जिस तरह लॉकडाउन के बहाने एकांतवास पर विवश किया है, उसका संकेत यह है कि वह हमें परिवर्तन के लिए तैयार कर रही है. प्रकृतिवादी दृष्टिकोण को थोड़ा और आगे बढ़ाएं तो यह भी समझा जा सकता है कि प्रकृति मानो कह रही है, तुमने हर चेतावनी को अनदेखा किया अब मुझे ही सब ठीक करना होगा! फूल, पत्ते, पेड़ पौधों से लेकर आसमान तक सब कुछ निर्मल और स्वच्छ है. नदियों का पानी सचमुच पवित्र होने की तरफ बढ़ रहा है. दिल्ली सरीखे शहर की हवा ऐसी हो गई है कि लगता है काश! हमारे पास कुछ अतिरिक्त फेफड़े होते.

यह एकांतवास का पर्यावरण से जुड़ा पहलू है. अब अपनी जिंदगी पर लौटते हैं. इन दिनों सप्ताह भर एक-दूसरे से मिलने के लिए तरसने वाले जीवनसाथी चौबीस घंटे के साथ से उकताने लगे हैं. बड़े बच्चों को लग रहा है, उनके माता-पिता के पास अचानक से बहुत ज्यादा समय हो गया है. इससे उनकी 'निजता' प्रभावित हो रही है. परिवार में अलग-अलग मुद्दों पर जहां पहले बात नहीं हो पाती थी, वहां अब स्थितियां यह हो रही हैं कि हर छोटी-बड़ी बात पर बहस और मनमुटाव स्पष्ट लिखने लगा है. इसीलिए तो कहा गया है कि अति हर चीज़ की वर्जित है. जीवन संवाद को इस बारे में बहुत अधिक ई-मेल और संदेश मिल रहे हैं . दंपति अपने कामकाज के साथ घरेलू ज़िम्मेदारी निभाते हुए अचानक तनाव की ओर बढ़ते दिख रहे हैं.

हम सबके पास अपने लिए थोड़ा समय होना ही चाहिए. भले ही उसकी जिम्मेदारियां किसी भी तरह की क्यों न हों. हम कभी नहीं सोचते कि घर पर रहने वालों का अपना समय भी होता है! यही कारण है कि केवल ऑफिस की चुनौती हमारे दिमाग में होती है. जबकि बच्चों के साथ हर समय रहना आसान नहीं है. उनकेे प्रश्न, सुविधा का ख्याल रखना भी चुनौतीपूर्ण है.



हमें मां का इतना अधिक अभ्यास है कि हम उसके अनुरूप ही अपने सभी रिश्तों को देखना चाहते हैं. पत्नी की भूमिका, उनकी चाहत, इच्छा की मां से अक्सर तुलना करने की पुरुष की आदत रिश्ते में अनचाहे तनाव का कारण बनती है. मुझे यह बात मनोविकार सी लगती है कि पुरुष हमेशा यही चाहते हैं कि पत्नी उनकी मां को, अपनी मां से बढ़कर सम्मान दे. आदर से आगे बढ़कर उनका ख्याल रखे, जबकि वह स्वयं पत्नी के पिता के साथ इस तरह का व्यवहार आगे बढ़कर नहीं करते. जिंदगी वन-वे ट्रैफिक नहीं है. जो अपने व्यवहार में समानता रखते हैं, उनके परिवार में इस तरह के संकट कम खड़े होते हैं.




हम अपने लड़कों को कुछ इस तरह पालते हैं कि उनके हिंसक, क्रोधी, मनमौजी होने की आशंका सदैव बनी रहती है. ऐसे में प्रेम, स्नेह और अनुराग रिश्ते में कहां से आएगा. जो गुण बेटी/बहन के पति में खोजे जाते हैं अगर वही बेटे में रूप दिए जाएं तो बहुत से संकट स्वयं हल हो जाएंगे. इस समय परिवारों में घरेलू कामकाज को लेकर बहुत अधिक तनाव के पीछे सबसे बड़ा कारण परवरिश के संस्कार में तकनीकी कमी है. अगर लड़कों को घर के सामान्य कामकाज, बर्तन साफ करने और झाड़ू-पोंछे का प्रशिक्षण, आदत नहीं है तो पुरुष का मन इसके लिए कैसे तैयार होगा. उन्हें तो इसका अभ्यास नहीं है. बचपन से जिस बात की तैयारी न हो, जब अचानक से वह जरूरी हो जाए तो तनाव होगा ही. किसी तरह काम को टालने से लंबे समय तक तनाव से बचना मुश्किल हो जाता है.


कोरोना संकट ने एक बार फिर समाज को यह समझाने की कोशिश की है कि प्रकृति की ओर से कोई भेद नहीं है. इसके लिए पर्यावरण और मनुष्य दोनों समान हैं. सारे भेद मनुष्य ने निर्मित किए. परिवार में पुरुष और महिला संबंधों में करोना संकट में बढ़ रहे तनाव की वजह मन में बसी श्रेष्ठता और वह सामंती मूल्यों की जड़ है जिसमें पुरुष के भीतर ठूंसा गया वह संस्कार है जिसमें उसे केवल लिंग (जेंडर) के आधार पर श्रेष्ठ मान लिया गया है.

इसलिए, जरूरी है कि अभिभावक जिन मुश्किलों का सामना आज कर रहे हैं, उनके लिए बच्चों को थोड़ा-थोड़ा तैयार करते चलें. स्वयं को बदलना ही महत्वपूर्ण नहीं है, इससे अधिक जरूरी है बदलाव को सद्भावना से स्वीकार करना. रिश्तों में आत्मीयता इससे ही बढ़ती है.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 27, 2020, 6:48 AM IST
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