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#जीवन संवाद : उजाला कहां से आएगा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 15, 2020, 1:40 PM IST
#जीवन संवाद : उजाला कहां से आएगा!
#जीवन संवाद : उजाला कहां से आएगा!

#JeevanSamvad: कोरोना का सबसे बड़ा सबक यही है कि हमारे पास हमें संभालने के लिए बड़ों का साथ नहीं है. जिन लोगों के पास परिवार और बड़ों का साथ है (साथ में रहते हुए/ दूर रहते हुए नियमित संपर्क से) उनकी मनोदशा, चिंता बहुत अधिक संतोषजनक है.

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  • Last Updated: April 15, 2020, 1:40 PM IST
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हममें से कुछ लोग बढ़ते हुए एकांतवास के बीच धीरे-धीरे अनचाहे तनावों की ओर खुद को धकेल रहे हैं. जब कभी मुश्किल वक्त आता है, हमें बाहरी चीजों से अधिक अंदरूनी चीजों की जरूरत होती है. आंतरिक इच्छा शक्ति और उस उजाले की जो हमारे ही भीतर है. लेकिन हमारी प्रकृति लोक कथा के उस मृग से बहुत मिलती-जुलती है, जो कस्तूरी की खोज में जंगल में यूं ही भटकता रहता है. जबकि वह स्वयं उसके पास होती है.

सबसे अधिक आशा अगर कहीं है, भरोसा कहीं भरा हुआ है तो वह हमारे भीतर है. मन बहुत तेज गति से चलता है. हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं तीव्र गति से वह कहानी बुन लेता है. इन 'बुनी' हुई कहानियों से हम स्वयं ही डरने लगते हैं. संकट जब आएगा तब आएगा, लेकिन उसके पहले ही हमारा कमजोर मन हमें भीतर से भी तोड़ने और बिखेरने लग जाता है. सुबह-सुबह गांव के सबसे बुजुर्ग, अपने भीतर अनुभव और जीवन की संवेदना सहेजे शिक्षक का फोन आया. हाल-चाल के बाद उन्होंने कहा, 'बाकी सब हम अर्जित कर सकते हैं, बस इतना ध्यान रखना कि तुम्हारा मन स्वस्थ रहे. अपनी आत्मा पर इन संकटों की छाया नहीं पड़ने देना है. संकट बड़ा है लेकिन हमारे विश्वास से अधिक नहीं.'

यही हमारे पारंपरिक समाज, परिवार की सबसे बड़ी शक्ति है. बुजुर्ग और लाइब्रेरी दोनों एक जैसे महत्व के हैं. हमारे देश में बीते कुछ वर्ष में तनाव, डिप्रेशन और निराशा बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यही रहा है कि हम अपने बुजुर्गों और अपनी लाइब्रेरी दोनों से ही दूर हो गए. यह दोनों ही हमारे अंदर आशा का उजाला भरने की क्षमता रखते हैं. बड़े-बुजुर्गों के बिना न तो हम सुख को सहेजना समझते हैं न ही दुख को सहना. इन दोनों में संतुलन का नाम है, जीवन है. बिना तनाव का जीवन. मानसिक रूप से स्वस्थ जीवन.



अपने-अपने जीवन को टटोलिए. आप पाएंगे कि परिवार के बुजुर्ग संकट के समय आपमें कमी निकालने की जगह सांत्वना पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं. बड़ा और बूढ़ा पेड़ परिंदों, राही से सवाल बाद में करता है, उन्हें छाया, फल पहले देता है. पिछले बीस बरस में हम बुजुर्गों और अनमोल किताबों को सहेजने वाली लाइब्रेरी दोनों से दूर हो गए हैं.




आपको ऐसा नहीं लगता कि जितना हम इन दोनों से दूर हुए हैं, उतने ही भीतर से हम खोखले होते जा रहे हैं. गुस्सा और तनाव हमारे भीतर तेजी से घर करता जा रहा है. हम थोड़े से सुख में बहुत अधिक हल्ला मचाने लगते हैं और जरा सा दुख आते ही राई का पहाड़ बना लेते हैं. कोरोना का सबसे बड़ा सबक यही है कि हमारे पास हमें संभालने के लिए बड़ों का साथ सही मात्रा में नहीं है. जिन लोगों के पास परिवार और बड़ों का साथ है (साथ में रहते हुए/ दूर रहते हुए नियमित संपर्क से) उनकी मनोदशा, चिंता का स्तर कहीं अधिक सही मात्रा में है उनके मुकाबले जो सबके साथ रहते हुए अकेले हो गए, अपनी हसरतों की धुन में सब को हाशिए पर छोड़ते हुए आगे बढ़ गए.

अपने अंदर उजाला देने वालों की खोज कीजिए. भीतर की साफ-सफाई और उससे संवाद के लिए थोड़ा सा समय निकालिए. काम हमारी जिंदगी का बहुत जरूरी हिस्सा है, लेकिन यह जीवन का पर्यायवाची नहीं है. जीवन की डोर अंतर्मन से जुड़ी है. अंतर्मन का सीधा संबंध हमारे अंतर्मुखी होने से हैं. हम जीवन के शोर में इतना अधिक डूब गए हैं कि बहुत अधिक बहिर्मुखी, वाचाल और दुनिया को अपनी शान में झुकते हुए देखना चाहते हैं.

इन सब से हम अपने को झूठे सुखों की ओर धकेलते रहते हैं. अपने भीतर अंधेरा एकत्र करते रहते हैं. जीवन बाहर से प्रकाशवान नहीं होता. वह दिखता जरूर प्रकाशित है लेकिन यह प्रकाश भीतर से आता है. 'जैसा भीतर वैसा बाहर. हमारी चेतना का यही क्रम है. हम इसे अपनी जीवनशैली और महत्वाकांक्षाओं की दौड़ में पलट चुके हैं. हम भीतर से खाली होते जा रहे हैं और बाहर दमकते हुए दिखना चाहते हैं. इससे कुछ हासिल नहीं होगा.


कोरोना संकट संभव है, जुलाई तक खत्म होने लगे. लेकिन इस बीच अगर आप अपने मन को नहीं संभाल सके तो उसका असर लंबे समय तक आपकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता रहेगा. इसलिए मानसिक रूप से मजबूत होना, मन को आशा के केंद्र के रूप में निरंतर सशक्त करते रहना यही सबसे बड़ा काम है. अपने को उन चीजों से मत जोड़िए जो आपके नियंत्रण में नहीं है, अपनी शक्ति वहां लगाइए ,जो आप कर सकते हैं. आशा की फैक्ट्री का रास्ता यहीं से जाता है!

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 15, 2020, 1:40 PM IST
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