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#जीवन संवाद : इरफान और भीतर की कोमलता!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 30, 2020, 9:33 PM IST
#जीवन संवाद : इरफान और भीतर की कोमलता!
जीवन संवाद

इस समय हम सफलता की खोज में इतने अधिक क्रूर और कठोर होते जा रहे हैं कि हमारे भीतर की कोमलता सूखती जा रही है. इरफ़ान हमें यह बता गए हैं कि अलग और विशिष्ट होने के लिए यह जरूरी नहींं कि आप अपने मूल्यों से कट जाएं.

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मौत से मुकाबले का यह अनूठा दृश्य चल रहा है. संयोग देखिए कि इसी समय भारतीय सिनेमा के दो प्रमुख अभिनेता नई यात्रा पर निकल गए. इरफ़ान खान और ऋषि कपूर के धरती के रंगमंच को अलविदा कहने का समय हमें यह समझाने के लिए पर्याप्त है कि कितना कुछ है जो हमसे अनियंत्रित है. किसने सोचा होगा कि इरफ़ान का जनाजा और ऋषि कपूर की अंतिम यात्रा इतनी खामोश होगी. हमारी यादों के एल्बम में ऐसी उदास यात्राएं नहीं हैं. अभिनेता की तो आरजू ही दर्शक हैं. कोरोना संकट ने हमारे सोचने समझने से लेकर हर उस चीज को बदल दिया है, जिसके बिना जिंदगी तो दूर मौत की भी कल्पना नहीं होती थी.

इरफ़ान ने जयपुर की गैर सिनेमाई पृष्ठभूमि से निकलकर अपने जादुई अभिनय से करोड़ों लोगों को हमसफ़र बनाया. इस समय वह संभवतः इकलौते अभिनेता थे, जिनकी फिल्म देखने के लिए उनके चाहने वाले केवल ट्रेलर में उनका चेहरा देखकर सिनेमा हॉल की ओर चले जाते थे. मैं खुद भी उनका ऐसा ही प्रशंसक हूं. एक बार उनसे ऐसे ही अनुराग के कारण ऐसी फिल्म दिखाने चार लोगों को ले गया जो मुझ समेत किसी को पसंद नहीं आई. लेकिन किसी ने कुछ कहा नहीं क्योंकि हम लोग फिल्म नहीं बल्कि इरफ़ान को देखने गए थे. मैं स्वीकार करता हूं कि ऐसा गहरा अनुराग मेरे भीतर दूसरे किसी अभिनेता के लिए नहीं रहा. कुछ हद तक ओमपुरी थे, लेकिन उनकी प्रमुख फिल्मों के समय हम बहुत छोटे थे और बाद में वह अजीब-अजीब फिल्में करने लगे थे.

किसी के हमारे बीच से चले जाने पर यह सब बातें करना औपचारिक, अजीब लगता है, क्योंकि वह अपनी कला से अभी है तो हमारे बीच ही. मुझे हमेशा से लगता रहा है कि इस दुनिया में कुछ भी बना पाना सरल नहीं. इसलिए जो कुछ बना पाया, जो कुछ बन पाया. उसकी यात्रा में हमारी दिलचस्पी अधिक गहरी होनी चाहिए. इरफ़ान ने छोटे-छोटे धारावाहिकों, गुमनाम किरदारों से आगे बढ़ते हुए पूरी दुनिया में अपने लिए जगह बनाई. मेरे लिए वह संजीव कुमार के बाद दूसरे ऐसे अभिनेता हैं जो बहुत सहज हैं.




इरफ़ान इसलिए भी खास हैं, क्योंकि बीते पंद्रह-बीस बरस में कोई दूसरा ऐसा अभिनेता नहीं जिसके किरदार के चयन में ऐसी विविधता, मासूमियत और गहराई हो. मकबूल, पान सिंह तोमर,‌ हासिल के हर दृश्य में वह नया सिनेमा रचते जाते हैं. लंच बॉक्स, हिंदी मीडियम में वह इतने साधारण दिखते है कि उसके लिए बहुत असाधारण होना जरूरी है.



जिसकी शक्ल-सूरत हमारे-आपके जैसी सामान्य अड़ोस-पड़ोस के लोगों जैसी हो. जिसकी बाहें फड़कने से शत्रुओं की फौजें भले न उड़ने लगें, लेकिन उसकी आंखें इतनी बोलती हैं कि आप अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं.

ऋषि कपूर की कहानी थोड़ी अलग है. अभिनय का परिवार विरासत में मिला. लेकिन विरासत में मिलना सब कुछ नहीं. इसीलिए हम रणधीर कपूर और राजीव कपूर को आसानी से भूल जाते हैं. ऋषि कपूर को रंगकर्म और सिनेमा से जुड़े विश्लेषक मोहन जोशी ने 'इश्क़ की ताज़ी हवा' कहा है. इरफान से इतर ऋषि का सिनेमा कुछ दूसरी तरह का लेकिन उसकी भी हमारी जरूरत का रहा है. वह हमारे जीवन में तनाव को दूर करने वाला रोमांस, प्यार, मोहब्बत, इश्क़ भरते रहे. बॉबी से चांदनी जैसी फिल्मों में भरपूर मनोरंजन करते रहे. बाद में चरित्र भूमिकाओं में भी शानदार रहे. अनुभव सिन्हा निर्देशित ऋषि कपूर की 'मुल्क़' भारतीय सिनेमा में सांप्रदायिकता के विरुद्ध बहुत ही सशक्त हस्ताक्षर है. इसे देखे बिना हम उनके अभिनय की परिक्रमा को नहीं समझ सकते. मुल्क़ देखने के बाद समझ में आता है कि निर्देशक अभिनेता की जीवन में कितना महत्वपूर्ण होता है. इरफ़ान को ऋषि कपूर के मुकाबले कहीं अधिक विविधता पूर्ण और गंभीर सिनेमा रचने वाले लोगों का साथ मिला. इसे इस तरह भी कहा जाना चाहिए कि उन्होंने ऐसे लोगों का साथ पकड़ा जिनमें विषय की गंभीरता पर अधिक जोर था ग्लैमर की जगह. लेकिन दोनों ही अभिनेताओं का समाज से गहरा जुड़ाव था. फेसबुक पर अनेक महिला मित्रों ने लिखा है कि जब कभी ऋषि कपूर की फिल्म आती, वह तुरंत अपनी मम्मी/ अम्मी को आवाज देती है और वह सब काम छोड़कर तुरंत आ जातीं. ऋषि कपूर की लोकप्रियता को आज ठीक से नहीं समझा जा सकता. लेकिन इस ज़माने में उनके चाहने वाले आज की तुलना में भी काफी रहे हैं.

हम जीवन संवाद के कॉलम में अभिनय और सिनेमा की बात क्यों कर रहे हैं. इसलिए नहीं क्योंकि दोनों अभिनेता हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा थे बल्कि इसलिए क्योंकि दोनों का जीवन हमें बताता है कि स्वयं को स्वीकार करते हुए, अपनी आवाज सुनते हुए दूसरों की नहीं अपने दिल की आवाज सुनते हुए लिए गए फैसले ही शायद हमें उस जगह खड़ा कर पाते हैं, जिस जगह यह दोनों हैं.

इरफ़ान के लिए जितनी नम आंखें मैंने उनके नहीं रहने की खबर के बाद देखीं, उतनी निकट अतीत में किसी के लिए नहीं देखीं. इरफ़ान को सक्षम, विविधतापूर्ण, जादुई आंखों वाली अदाकारी के साथ ही उनके भले, सुंदर व्यवहार के लिए भी याद किया जाना चाहिए. जीवन की गरिमा और शालीनता उनकेेे भीतर सहज थी. जो इस समय दुर्लभ है.

जीवन संवाद के इस कॉलम में उनके जिक्र का सबसे बड़ा यही आधार है. इस समय हम सफलता की खोज में इतने अधिक क्रूर और कठोर होते जा रहे हैं कि हमारे भीतर की कोमलता सूखती जा रही है. इरफ़ान हमें यह बता गए हैं कि अलग और विशिष्ट होने के लिए यह जरूरी नहींं कि आप अपने मूल्यों से कट जाएं. जीवन में सादगी और सरलता हमारी सांसों जितनी ही जरूरी हैं. जीते हम सब अपने लिए हैं, केवल मनुष्यता हैै जो हमें आपस में जोड़ती है.

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दयाशंकर मिश्र
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First published: April 30, 2020, 9:31 PM IST
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