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#जीवनसंवाद : बिना कहे देना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 22, 2020, 12:10 PM IST
#जीवनसंवाद : बिना कहे देना!
#जीवनसंवाद : बिना कहे देना!

#JeevanSamvad: अगर आप सब भी अपने जीवन में थोड़ा पीछे मुड़कर देखेंगे तो जरूर ही ऐसे मौके आए होंगे जब कोई मदद चाहता रहा हो लेकिन कह नहीं पाया होगा. हम सबको ऐसे लोगों को न समझ पाने की गलती नहीं करनी चाहिए.

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कोरोना के कारण आर्थिक संकट दुनियाभर में गहरा रहे हैं. भारत में भी इसकी छाया दिखने लगी है. आप जहां कहीं भी रहते हैं इसके प्रभावों से बच पाना संभव नहीं दिख रहा. कोरोना वायरस से हमें केवल अपने शरीर को नहीं बचाना है, बल्कि मन, एक दूसरे के अस्तित्व बोध को बचाना भी उतना ही जरूरी है.

अपने आसपास के ऐसे लोगों के लिए थोड़ा स्नेह, करुणा और कोमलता बचाकर रखिए, जिनका वेतन आना बंद हो गया है. जिनकी दुकान पर जल्दी रौनक लौटी नहीं दिख रही. जिनके पास अपने खर्चों के लिए पर्याप्त रकम नहीं है. हम अपनों के बारे में यही सोचते रहते हैं कि जब उनको जरूरत होगी वह मांग लेंगे. लेकिन यह सोचते हुए हम भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति का एक स्वाभिमान होता है. उसके भीतर की गरिमा का अगर ठीक तरह से पोषण नहीं किया गया है तो वह आसानी से दुनिया के सामने खुलता नहीं है. जरूरतमंद दोस्त, अपने लिए मदद तो चाहते हैं, लेकिन उनके मन में भी कहीं न कहीं यह बात रहती है कि काश! यह बात आप बिना कहे समझ जाएं! बिना कहे समझने का मूल्य, कहने से बहुत अधिक है.

कई कंपनियों ने छंटनी की शुरुआत कर दी है, उनकी संख्या बहुत अधिक है. इसका अर्थ यह है कि देश में फैले मित्रों और परिजनों समेत हमसे जुड़े लोग बड़ी संख्या में इसकी चपेट में आएंगे. यह कुछ ऐसा है कि बारिश के मौसम में देश में कहीं भी बाढ़ आ सकती है. उन इलाकों में भी जहां बारिश कम होती है. कई बार बड़ी नदियों में भी बाढ़ नहीं आती तो कई बार छोटी-छोटी नदियों के किनारे बसे गांव बह जाते हैं.




गुरुवार रात बेहद प्रिय मित्र का फोन आया. उन्होंने एक-दूसरे की मदद करने के बारे में मुझे लिखने का सुझाव दिया. उन्होंने यह भी कहा, मुझे पता है 'जीवन संवाद' में निरंतर इस पर लिखा जा रहा है उसके बाद फिर भी इसके दोहराव की जरूरत इसलिए है जिससे हमारे बीच यह विचार ठोस रूप लेता रहे कि हम तभी बच सकते हैं जब हमारे दोस्त बचें. भाई बचें और रिश्तेदार भी.



लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही वह उनका छोटा-सा अनुभव था. उन्होंने बताया कि उनके एक बहुत ही प्रिय सहयोगी, लगभग छोटे भाई जैसे साथी की नौकरी छूटने पर जब कभी उन्होंने उससे पूछा कि तुम्हें मदद की जरूरत तो नहीं तो उसने हर बार यही कहा नहीं. लेकिन अंत में होता यह है उसे अपना घर बेच कर शहर से वापस जाना पड़ा. मेरे मित्र का यह फोन एक प्रकार से प्रायश्चित का फूल है. उन्होंने कहा कितना अच्छा होता मैं बिना कहे उसके खाते में कुछ पैसे डाल देता.

कई बार हमारे बहुत नजदीक दिखाई देने वाले लोग भी संकोच और लज्जा के कारण मदद सीधे नहीं मांगते. वह चाहते हैं कि आप समझ जाएंगे लेकिन हम कई बार ऐसा कर नहीं पाते‌. जिंदगी में सरल होना ही सबसे मुश्किल है. अगर आप सब भी अपने जीवन में थोड़ा पीछे मुड़कर देखेंगे तो जरूर ही ऐसे मौके आए होंगे जब कोई मदद चाहता रहा हो लेकिन कह नहीं पाया होगा. हम सबको अब वह गलती नहीं करनी चाहिए जिसकी ओर मित्र ने सहृदयता से संकेत किया है.


जिंदगी में ऐसे मोड़ आते हैं जिनकी ना तो कल्पना की गई होती है, न ही ऐसे संकट किसी दूरबीन से दिखाई पड़ते हैं. बस संकट आ जाता है. इस संकट का आपके कामकाज, आपकी योग्यता से कोई विशेष लेना देना नहीं होता. तो हम क्या कर सकते हैं? हम वह कर सकते हैं जिसे हम केवल दोहराते हैं, 'वसुधैव कुटुंबकम'. जब सब हमारे परिवार का हिस्सा हैं तो जो हमारे पास है उसे सब में मिल बांट कर खाया जाए. ध्यान रहे यह काम कंपनियां नहीं करतीं. ऐसे काम केवल मनुष्य ही कर सकते हैं. क्योंकि मनुष्य से मनुष्य का संबंध कहीं गहरा है. दोस्त केवल जश्न मनाने के लिए नहीं होते. मित्र इसलिए नहीं हैं कि वह साथ खड़े दिखें, असल में इसलिए होते हैं कि जब कभी साथ की जरूरत पड़े तो बिना कहे खड़े हो जाएं.


कोरोना हमें ऐसी जगह ले आया है जहां एक दूसरे का साथ निभाए बिना हम नहीं बच सकते. हमें जितना शरीर का ख्याल रखना है उतना ही मन का भी. यह बीमारी भूल से भी मन में बैठ गई तो फिर हमारा बचना बहुत मुश्किल है. एक दूसरे का ख्याल रखने और संकट में उसके साथ मजबूती से खड़े रहने से ही हम कोरोना से सही अर्थों में बाहर निकल पाएंगे.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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First published: May 22, 2020, 11:02 AM IST
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