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#जीवनसंवाद : यह वक्त कैसे कटेगा!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 10:31 PM IST
#जीवनसंवाद : यह वक्त कैसे कटेगा!
#जीवनसंवाद : यह वक्त कैसे कटेगा!

#JeevanSamvad: हमारे गांव अभी भी अधिक जिजीविषा से भरे हुए हैं. उनके अंदर विश्वास और संघर्ष करने की क्षमता शहरी समाज की तुलना में कहीं अधिक गहरी है. शहर, इसलिए कमजोर हो रहे हैं क्योंकि वह सिमट गए हैं, केवल निजी सुख-दुख में.

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लॉकडाउन ने हमें ऐसी परिस्थितियों के बीच झोंक दिया है, जैसे समंदर में कोई नौका अचानक तूफान के बीच घिर गई हो. हालांकि अचानक कुछ नहीं होता. जब समंदर में नाव उतरती है तो उसे इस बात का अंदाजा होता है कि तूफान कभी भी आ सकते हैं. लेकिन बहुत थोड़े नाविक यह मानकर चलते हैं कि तूफान कभी भी आ सकते हैं. अधिकांश यही सोचते हैं कि उनके साथ ऐसा नहीं होगा. कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें कुछ भी होने और न होने के बीच केवल स्वयं पर भरोसा होता है. तो कुछ का ख्याल होता है कि जो भी होगा देखा जाएगा, नौका किनारे पर नहीं खड़ी रह सकती.

थोड़ा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे समंदर की नाव और हमारी जिंदगी में बहुत अंतर नहीं. हमारा जीवन पृथ्वी पर यात्रा के दौरान समंदर में नाव सरीखा ही है. उससे अलग कुछ नहीं. तूफान कभी भी बता कर नहीं आते, हां वह संकेत जरूर देते हैं. हम उन्हें कितना समझते हैं यह हम पर निर्भर है. इस समय हम में से बहुत से लोग रामायण और महाभारत देख रहे हैं. हर जगह उनकी चर्चा हो रही है. राष्ट्रीय टेलीविजन पर इनके प्रसारण के पीछे संभवतः यही भाव रहा होगा कि इससे लोगों का मन बदलता रहे. थोड़ी शक्ति मिलती रहे. लेकिन व्यवहार में हम देखते हैं कि हमारे पुरखों की कहानियां हमारे जीवन पर कथा से आगे का असर बहुत देर तक नहीं रखतीं.

इसे सरलता से ऐसे समझिए कि वह आदर्श के रूप में तो हमारे साथ रहती हैं लेकिन हम उनसे सही अर्थ में प्रेरणा ग्रहण करना भूलते जाते हैं. महाभारत की सबसे प्रेरणादायी और खूबसूरत पंक्तियों में से एक है जो महर्षि वेदव्यास ने कृष्ण से कहलवाई.



कृष्ण कहते हैं, सुखे दुखे समेकृत्वा, लाभा लाभौ जया जयौ. इसका अर्थ है सुख दुख, लाभ हानि, जय अथवा पराजय को समान भाव से लेना चाहिए. इससे ही जुड़ी हुई एक और बहुत ही खूबसूरत बात है. जब अर्जुन का मन घबराया हुआ है. विचलित और दुविधा से भरा हुआ है. अर्जुन कृष्ण से कह रहे हैं, आप ही सर्वशक्तिमान हैं तो यह संघर्ष टाल क्यों नहीं देते. कृष्ण कहते हैं, मैं ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि मैं स्वयं भी प्रकृति के नियमों से बंधा हुआ हूं.




अपने एक लेखक मित्र के बहुत जोर देने पर लगभग एक वर्ष पहले मैंने महाभारत को पढ़ना शुरू किया. देखने और पढ़ने में बहुत अंतर है. इसने मेरी जीवन दृष्टि और मुश्किल का सामना करने की क्षमता को बहुत सारा खाद पानी देना शुरू कर दिया. यह हौसले की अद्भुत कहानी है. पहले से मुझे नहीं पता हमारे उस समाज में जहां प्रवचनों और माता-पिता को घर में धार्मिक अनुष्ठान के रूप में 'भागवत' सुनवाने जैसी परंपराएं है. जो सात दिन तक चलती है. वहां से हम सीखते क्या हैं! कुछ सीखते हैं कि नहीं. पहले कुछ सीखते थे कि नहीं. कह पाना मुश्किल है लेकिन इतना तो विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि पहले इन सब का हमारे जीवन पर असर तो रहता होगा. क्योंकि भारतीय लोग जीवन में मुश्किलों से जिस तरह लोहा लेने की क्षमता रही है उसकी जड़ में जरूर ऐसे ही लोक विश्वास और लोक प्रेरणा रही होगी. कृषि आधारित व्यवस्था में बिना सिंचाई के जिस तरह किसान हर साल खेती के लिए प्रतिबद्ध होता है उसे ध्यान से देखने पर ही इस प्रेरणा के बारे में हम जान पाएंगे. ‌


हमारे गांव अभी भी अधिक जिजीविषा से भरे हुए हैं. उनके अंदर विश्वास और संघर्ष करने की क्षमता शहरी समाज की तुलना में कहीं अधिक गहरी है. शहर, इसलिए कमजोर हो रहे हैं क्योंकि वह सिमट गए हैं, केवल निजी सुख-दुख में. इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कोरोना संकट कैसे कटेगा. इसे तो कट ही जाना है कुछ ही दिन में. इससे कहीं अधिक रचनात्मक सवाल यह होना चाहिए कि इससे हम सीखेंगे क्या? जो जितना सीख पाएगा उसका जीवन उतना ही सुख के समीप होगा. इसलिए थोड़ी प्रेरणा लीजिए अपने नायकों से, अपने किसानों से. अपने नाविकों से. अपने भीतर घोषणा कीजिए कि जो भी होगा देखा जाएगा.

इससे आज में बने रहने में सहायता मिलेगी. मन में विश्वास गहरा होगा. मेरा विनम्र अनुरोध है कि सब कुछ दोबारा हासिल किया जा सकता है लेकिन अगर मन का भरोसा टूट जाए तो उसे वापस लाने में बहुत अधिक ऊर्जा लगती है. इसलिए, अनेक प्रकार के कष्ट सहते हुए भी मन को कमजोर मत होने दीजिए.

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First published: April 28, 2020, 9:44 AM IST
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