#जीवनसंवाद : किसी के जीवन में होना!

#जीवनसंवाद : किसी के जीवन में होना!

#जीवनसंवाद : किसी के जीवन में होना!

#JeevanSamvad: किसी की जिंदगी में ठीक वैसे ही प्रवेश करना चाहिए, जैसे वृक्ष की छाया! चुपचाप, शांति और स्नेह से. इससे उस जीवन से पहले से जुड़े लोगों के बीच अहंकार और टकराव नहीं बढ़ता.

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हम जब किसी की जिंदगी में शामिल हो रहे होते हैं तो वह समय बहुत कोमल होता है. स्नेह, प्यार और अनुराग से भरा हुआ. काश! हम इसे थोड़ा बड़ा कर पाते. इससे हमारी जिंदगी अधिक कोमल होती! क्योंकि जैसे ही हम 'असली' जीवन में दाखिल हो जाते हैं प्रेम की जगह संघर्ष शुरू हो जाता है. जीवन को इस संघर्ष से बचाने की जरूरत है.



किसी रिश्ते में प्रवेश करते समय हमारा मन कितना आनंदित, प्रफुल्लित और स्नेह में डूबा हुआ होता है. हम रहते तो जमीन पर ही हैं लेकिन हमारे पांव वहां टिकते नहीं. वह तो मन के साथ आसमान में होते हैं. हवा में होते हैं. इसलिए शुरुआती दिनों में रिश्ते बहुत कोमलता से भरे होते हैं लेकिन जैसे-जैसे उनमें यथार्थ का हिस्सा बढ़ता जाता है, प्रेम की जगह संघर्ष लेने लगता है.



किसी केे जीवन में होनेे का अर्थ कोई छोटी बात नहीं. हम बहुत कुछ दांव पर लगाकर किसी के जीवन में प्रवेश करते हैं. विशेषकर भारत में. क्योंकि यहां किसी रिश्ते में बंधने से मुश्किल काम है, हृदय के टूटने पर उससे बाहर आ पाना. आपने पिछले दिनों जीवन संवाद में 'डिप्रेशन से बाहर निकलती लड़की के पत्र' और 'कहना और सुनना' में पढ़ा है कि किसी रिश्ते के डूब जाने से हम ठीक से उबर नहीं पाते. नाराजगी और प्रेम का हमारे यहां कोई हिसाब-किताब नहीं है. नाराजगी को हम प्रेम से दूरी और प्रेम में हर बात का समर्थन जरूरी समझते हैं. आपने इस तरीके के वाक्य सुने और देखे होंगे कि अगर तुमने मेरे मना करने के बाद भी यह काम किया तो मैं तुमसे कभी बात नहीं करूंगा.





यहां ध्यान देने की बात यह है कि इसमें सही गलत की बात नहीं है, इसमें केवल यही भाव छुपा होता कि मैं कह रहा हूं, इसलिए ऐसा ही किया जाए. हम जब किसी रिश्ते में प्रवेश कर रहे होते हैं तो कठोरता को भी कोमलता में बदल देते हैं. लेकिन जब किसी रिश्ते में शामिल हो जाते हैं तो हर चीज को, हर कोमलता को कठोरता में बदलने लगते हैं. हम हर चीज़ पर हावी हो जाना चाहते हैं. सारे निर्णय खुद करना चाहते हैं. हर चीज ख़ुद तय करना चाहते हैं.

हम अपने जीवन में दूसरे के लिए जगह कम करते जाते हैं, धीरे धीरे. पति-पत्नी के रिश्ते में, संघर्ष का सबसेे बड़ा कारण यही है. एक-दूसरे के लिए जगह की कमी. हमने रिश्तों को सत्ता की तरह समझ लिया है. जिस तरह राजनीति में राजनेता अपनी ही पार्टी के लोगों से परेशान रहता है. उसे हमेशा डर रहताा है कि कोई उसकी जगह ना ले ले. ठीक उसी तरह हमारे रिश्तों में संघर्ष शुरू होता है.





सास बहू से डरती है. उसे लगता है बहू सब कुछ अपने कब्जेे में लेना चाहती हैै. दूसरी ओर बहू एक इंच जमीन भी नहीं छोड़ना चाहती. ऐसे में संघर्ष नहींं तो क्या होगा. देश में बहुत कम ऐसे परिवार हैं, जहां रिश्तों की अनूठी समझ मिलती है. जहांं हर किसी को दूसरे के लिए जगह देने में कोई संकट नहीं दिखता. असल में किसी से प्रेम करने का अर्थ यह नहीं होता कि अब बाकी लोगों की ओर से मुंह मोड़ रहे हैं. अंतर केवल इतना होता है कि जब कोई नया आपकी जिंदगी में प्रवेश कर रहा होता है तो उसे थोड़े अधिक स्नेेह की जरूरत हो है. लेकिन जो किसी की जिंदगी मेंं प्रवेश कर रहा होता है, उसे कैसे प्रवेश करना चाहिए.



ठीक वैसे ही, जैसे वृक्ष की छाया आती है! हमें दूसरों के जीवन में वैसे ही जाना चाहिए. इससे उस जीवन से पहले से जुड़े लोगों के बीच अहंकार और टकराव नहीं बढ़ता. हावी होने की आदत, अहंकार जीवन में हमसे बहुत कुछ छीन लेता है. इसलिए, रिश्तों पर कब्जा करने का विचार मन में नहींं आना चाहिए. इससे हमारे भीतर एक किस्म की हिंसा घर करने लगती है. हम भीतर से रूखेे और कमजोर होने लगते हैं. क्योंकि हम किसी से आगे निकलने की चाहत में स्वयं को गुस्से और अहंकार से भरते जाते हैं. इसलिए बहुत जरूरी है कि अगर आप किसी नए रिश्ते में प्रवेश कर रहे हों, कोई दूसरा वहां आ रहा हो, जहां आप पहले से हैं तो हमेशा ध्यान रखिए अहंकार जितना पीछे आप उतने ही अधिक आगे रहेंगे. सुख से रहेंगे. शुभकामना सहित....



दयाशंकर मिश्र

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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