#जीवनसंवाद: आज में जीना!

जीवन संवाद
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#JeevanSamvad: मध्यमवर्गीय समाज जिसके पास अभी चीजों का 'स्टॉक' बाकी है, वह मन से कुछ कमजोर दिख रहा है. हर छोटी-छोटी बात में निराशा के नजदीक जा रहा है. इसके मन को बहुत अधिक संभालने की जरूरत है.

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गौतम बुद्ध के पास जीवन की संभवतः सबसे वैज्ञानिक दृष्टि है. वह जीवन के वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और प्रबल समर्थक हैं. बुद्ध कल और और परसों से अधिक आज पर ध्यान देने की बात करते हैं. आज से भी अधिक वह 'अभी' में रहने के लिए कहते हैं. कैसे कोई अभी में रहे. क्योंकि हम तो हमेशा ही अतीत और भविष्य में भटकते रहते हैं. हमारी पूरी ऊर्जा और चेतना इन दोनोंं के आसपास भटकती रहती है.

बुद्ध इसलिए भी याद आ रहे हैं इन दिनों क्योंकि कोरोनावायरस से लड़ने के लिए उनके पास विधिवत व्यवस्था है. कोरोना संकट में समाज मोटे तौर पर दो वर्गों में बंट गया है. पहला वह जिनके पास न्यूनतम साधन है और वह जीवन संघर्ष में बहुत अधिक संघर्षशील हैं. दूसरा शहरी समाज, मध्यमवर्गीय लोग जिसे हम मिडिल क्लास के नाम से पहचानते हैं.

जिनके पास हजारों मील के सफर के लिए चंद हजार रुपए भी नहीं हैं, वह सब कुछ दांव पर लगा कर, संकट से आंखें चार कर रहे हैं. गुड़गांव से साइकिल पर अपने पिता को लेकर बिहार पहुंचने वाली ज्योति व्यवस्था से तो परेशान है लेकिन वह उसकी ओर बहुत आशा भरी नजर से देखती नहीं. वह अपने इरादे, मानसिक शक्ति से शरीर में बिना किसी भारी भरकम पोषण के इतनी ऊर्जा भर लेती है कि हजार से ऊपर किलोमीटर और भीषण गर्मी को पार करते हुए अपनी साइकिल बिहार तक पहुंचा देती है. ज्योति अकेली नहीं हैं. ऐसी अनेक रोशनियां हैं, जो समाज, सरकार से निराश होकर दुखी होकर हथियार नहीं डालतीं बल्कि पूरी क्षमता से लड़ती हैं.



यह हमारे समाज की विचित्रता है कि वह केवल विजेताओं को याद रखता है, उनके संघर्ष को नहीं जो हार गए. ज्योति एक विजेता है लेकिन वह हमारे सामने ऐसे प्रश्न लेकर आई है जिनका किसी के पास कोई जवाब नहीं. यहां जिस पहले वर्ग की बात की गई, ज्योति उसकी प्रतिनिधि हैं. यह सब अपने अपने गांव की ओर लौट रहे हैं. उनके गांव के पास उनके लिए कहीं गहरा प्रेम और आशा है. सामूहिकता है और संबंधों की प्यास जीवित है. मनुष्य निराशा से उतना नहीं हारता है जितना प्रेम की कमी से.

यह वर्ग मानसिक रूप से मध्यमवर्गीय समाज से कहीं अधिक मजबूत नजर आ रहा है. कहीं ठोस रूप में मुश्किलों से लोहा ले रहा है. एक प्रकार से देखा जाए तो यह लोग बुद्ध की उस शिक्षा के बहुत नजदीक हैं, जिसमें वह सारी शक्ति को आज में जीने में लगाना चाहते हैं. इनके पास कल की कोई ठोस तस्वीर नहीं है, लेकिन वह निराशा से अधिक जीवन की आस्था के नजदीक हैं. दूसरी ओर मध्यमवर्गीय समाज जिसके पास अभी चीजों का 'स्टॉक' बाकी है, वह मन से कुछ कमजोर दिख रहा है. हर छोटी-छोटी बात में निराशा के नजदीक जा रहा है. इसके मन को बहुत अधिक संभालने की जरूरत है.


जब बुद्ध कहते हैं केवल वर्तमान में जियो तो इसका अर्थ एकदम सरल और स्पष्ट है. वह कह रहे हैं कि तुम सारी शक्ति, सारी उर्जा इसी पल में लगा दो. ध्यान दीजिए उस गर्मी में जब आप घर से नहीं निकल पा रहे तो कौन सी शक्ति है जो ज्योति में इतनी ऊर्जा भर रही है! यही जीवन के प्रति आस्था है. यह आस्था तभी कह रही होती है जब आप सब कुछ भूल कर केवल वर्तमान की सुंदरता और संघर्ष पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं.

वेतन में कटौती, तरक्की का रुक जाना, कल क्या होगा. यह प्रश्न सही, चिंतित करने वाले हैं लेकिन इनकी छाया जीवन पर मत पड़ने दीजिए! कोरोना संकट के बाद तभी हम बचेंगे, जब आज अपने मन को ठीक से संभाल पाएंगे. कोरोना हमेशा नहीं रहेगा लेकिन टूटी जीवन आस्था से ज़िंदगी कमजोर हो जाएगी. वर्तमान को अपना मित्र बनाइए. आज में जीना शुरू कीजिए, बाकी सब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा! आप दूसरों के प्रति जितने सहृदय रहेंगे, प्रकृति भी आपके प्रति वैसी ही रहेगी. ख्याल रखना हमारा सबसे पहला काम होना चाहिए!

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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