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#जीवन संवाद : स्वयं में रहना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 23, 2020, 8:12 AM IST
#जीवन संवाद : स्वयं में रहना!
#जीवन संवाद : स्वयं में रहना!

#JeevanSamvad: एकांत और अकेलापन दोनों एकदम‌ अलग हैं. एकांत स्वयं से मिलने का अवसर देता है. वह मन के स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय भी उपलब्ध कराता है. दूसरी ओर अकेलापन भीतर की बेचैनी से उभरता है. वह इसलिए होता है क्योंकि हमें एकांत का उपयोग करना नहीं आता.

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  • Last Updated: April 23, 2020, 8:12 AM IST
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कोरोना के कारण जीवन में उतरे एकांतवास से बहुत से लोगों को परेशान होते हुए देख रहा हूं. यह उकताहट, ऊब ऐसे लोगों के मन को बहुत अधिक बेचैन कर रही है, जिनकी सारी दुनिया बाहरी है. अपना पूरा जीवन घर को देने वाली मां को कभी बोर होते हुए देखा है. समय पर घर पहुंचने और ऑफिस के अलावा घर के सारे दायित्व भी निभाने वाली स्त्री को यह क्वॉरेंटाइन (कठोर एकांतवास) कभी उतना परेशान नहीं करता दिखता, जितना कि उनको जो हमेशा बाहर ही रहने में विश्वास करते रहे. घर उनके लिए सराय से अधिक कुछ नहीं.

पत्रकार, कवि मित्र पंकज रामेंदु ने लॉक डाउन के बीच बहुत सुंदर प्रश्न उठाया है. वह कहते हैं, इससे बहुत घबराने की जरूरत नहीं. मां पूरी ज़िंदगी क्वॉरेंटाइन रही क्योंकि पिताजी को बाहर जाने का शौक नहीं था! उनके बहुत सुंदर प्रश्नों को बीबीसी की एक श्रंखला में भी प्रकाशित किया गया है. पंकज जिस बात की ओर इशारा कर रहे हैं उस ओर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता. क्योंकि असल में पुरुष केंद्रित समाज में मां घर पर ही अच्छी लगती है. भले ही वह कामकाजी क्यों न हो.

स्वच्छंदता और स्वतंत्रता में बारीक अंतर होता है. स्वतंत्रता के नाम पर समाज में पुरुष ने शक्तियों पर अधिकार जमा लिया. स्त्री के सहज प्रेम, कोमलता और देखभाल की अद्भुत क्षमता का दुरुपयोग यही से आरंभ हुआ. क्वॉरेंटाइन, एकांतवास से ऐसे ही लोग अधिक परेशान हैं, जिन्हें घर में रहने का अभ्यास नहीं. एकांतवास की बेचैनी उनमें कहीं अधिक है, जिनके पास भोजन का प्रबंध, नौकरी और काम है. जिनके पास नहीं है, वह भी इतने बेचैन नहीं हैं. ऐसा इसलिए, क्योंकि उन्हें अपने साथ रहने की आदत नहीं! इसलिए समझना जरूरी है कि यह मानसिक संकट अधिक है.




स्वयं में रहने का अर्थ क्या है? एक छोटी-सी कहानी है गौतम बुद्ध की. बुद्ध से उनके कुछ भिक्षुओं ने एक नए शिष्य की शिकायत करते हुए कहा कि वह सदैव अकेले ही रहता है. अकेले ही गांव जाना. अकेले ही भिक्षा को जाना. अकेले ही ध्यान करना. बुद्ध ने उस युवा भिक्षु को बुलाया और कहा, इस अकेलेपन का कारण क्या है. उसने कहा, मैं अकेले ही रहता हूं, मेरे साथ कोई नहीं रहता. मैं अकेलेपन का अभ्यास करता हूं. इसीलिए मैं सब जगह अकेले ही जाता हूं. यही मेरा जीवन है, बस.



महात्मा बुद्ध ने कहा यह ठीक है, लेकिन अकेले रहने का इससे भी सुंदर मार्ग है. बुद्ध ने कहा, अपने भीतर जाइए. स्वयं को गहरे अवलोकन (observation) से देखिए. अतीत का अस्तित्व नहीं. वह बीत गया. लौटकर नहीं आएगा. और भविष्य को तो अभी आना बाकी है. इसलिए वर्तमान में रहना सबसे श्रेष्ठ है. इच्छा से मुक्त होकर ही तुम सही मायने में उस अकेलेपन को हासिल कर सकते हो जो तुम्हारे हृदय के नजदीक है. बुद्ध की यह बात सुनकर भिक्षु को सही मायने में अकेलेपन का मार्ग मिला.

हमारी स्थिति आज उस भिक्षु से अलग नहीं है. हम सब उस अकेलेपन की ओर जा रहे हैं, जिस पर वह भिक्षु चल रहा था. अकेलापन अकेले होने से नहीं बढ़ता. एकांत और अकेलापन दोनों एकदम अलग अलग बातें हैं. एकांत स्वयं से मिलने का अवसर देता है. वह मन के इलाज और उसके स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय भी उपलब्ध कराता है. दूसरी ओर अकेलापन भीतर की बेचैनी से उभरता है. वह इसलिए होता है क्योंकि हमें एकांत का उपयोग करना नहीं आता.


इसलिए, उस अकेलेपन को चुनिए जिसकी ओर बुद्ध भेज रहे हैं. अपने भीतर टहलिए. देखिए और समझने की कोशिश कीजिए कि आप किन व्यर्थ की चिंताओं में उलझे हुए हैं. जीवन का सारा संतोष केवल वर्तमान को संभालने में है. क्योंकि कुछ हद तक इसी पर आपका नियंत्रण है. अतीत और भविष्य तो आप की पहुंच से हमेशा बाहर हैं. अतीत के मैल से केवल मन भारी होता है. उससे अनुभव लीजिए लेकिन अपने मन का वजन मत बढ़ाइए. और भविष्य तो आप की पकड़ में है ही नहीं. उसके लिए केवल आशा रखिए, आशंका नहीं.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 23, 2020, 6:49 AM IST
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