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#जीवन संवाद : अकेले का अकेलापन! ‌

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: April 17, 2020, 10:10 PM IST
#जीवन संवाद : अकेले का अकेलापन! ‌
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: अकेलापन जितना होता नहीं उतना हम उसे अपनी निष्क्रियता से बढ़ा करते जाते हैं. सार्थक और रचनात्मक काम करने के लिए बड़े-बड़े जतन नहीं करने होते. इसे बहुत सरलता से छोटे-छोटे कामों से किया जा सकता है.

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  • Last Updated: April 17, 2020, 10:10 PM IST
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इस समय शहर में ऐसे युवा ज्यादा परेशान हैं, जो अकेले रहकर काम करते हैं. वह पहले भी अकेले रहते थे लेकिन लॉकडाउन के दौरान उनके अकेलेपन का बोध गहरा होता जा रहा है. ऐसा होता है, जब हम भीड़ में रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं. हमारी आदत पड़ जाती है तो अकेले होकर भी हमें लोगों के साथ का बोध होता है. लोगों के साथ होने का भाव बना रहता है.

'लॉकडाउन' ने कई चुनौतियां एक साथ उछाली हैं. आर्थिक चुनौती का सामना करने की हमारी थोड़ी- बहुत समझ है, लेकिन जीवन का अकेलापन नई चीज़ है! इसलिए, युवा मन बेचैन हैं. डिप्रेशन की ओर बढ़ रहे हैं! हमें मिलकर इनको संभालना है.


मेरे साथ काम कर चुकी, युवा सहयोगी ने मुझे निराशा में डूबा हुआ व्हाट्सएप किया. उसने कहा उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है. उसने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया है. मैंने उसे कुछ समझाने की कोशिश की, तो उसने मुझसे प्रश्न करते हुए कहा- अगर आपके साथ ऐसा व्यवहार हुआ होता तो जितना मैं आपको जानती हूं, आप भी नौकरी छोड़ देते. मैंने कहा, ठीक कह रहे हो! लेकिन करोना तो पहली बार आया है. यह पहले कभी हमारे बीच नहीं था. जब ऐसा संकट ही नहीं था तो इस संकट में दूसरे समय की तुलना नहीं चलेगी. जब तक बहुत मुश्किल ना हो, यह भावुक होकर नौकरी छोड़ने का वक्त नहीं. अंततः हम इस पर राज़ी हो गए कि जब तक कोरोना संकट नहीं खत्म हो जाता, वह नौकरी नहीं छोड़ेगी.



मैंने उसे ऊर्जा, जीवन से भरी कुछ फिल्में और आशा का संवाद करने वाली किताबें सुझाईं. मज़ेदार बात यह रही है कि उसके पास कुछ किताबें पहले से ही थीं. मन बेचैन हो तो हम अपनी ही सुगंध से दूर हो जाते हैं. कुछ किताबें ई बुक के रूप में मिल जाएंगी और कुछ दोस्तों के सहयोग से मिल गईं. कल मुझे उसका संदेश मिला, कोरोना तक कोई भी निर्णय स्थगित. 'वर्क फ्रॉम होम' एक नई कार्य संस्कृति (वर्क कल्चर) है. इसमें ढलने में समय लगना स्वाभाविक है. आपके साथ काम करने, करवाने वाले दोनों को इसकी आदत नहीं है. दूसरी बात यह है कि हमारा दिमाग कभी तक आमने-सामने सुनने, उसके हिसाब से निर्देश लेने का अभ्यस्त है.



'दिमाग़ की आदत वैसी ही है. आमने-सामने कही गई सख्त बात भी कई बार उतनी खराब नहीं लगती, जितनी ई-मेल पर लिखी हुई और मैसेंजर पर कही हुई. इसलिए हम हर दूसरी बात पर अपने काम करने वालों से नाराज़ हो रहे हैं. जबकि ऐसी ही बातें पहले ऑफिस में सबके साथ होती थीं. जीवन में समाज, सामाजिकता और सबके साथ रहने का इससे बढ़िया उदाहरण कोई दूसरा नहीं हो सकता. कोरोना ने यह समझाया कि एक दूसरे के साथ खड़े रहने से कैसे संकट का सामना आसानी से किया जा सकता है.


कोरोना के दौरान ऐसे लोग भी परेशान दिख रहे हैं जिनको पहले किसी से मिलना-जुलना बहुत पसंद नहीं था. इसकी वजह यह है कि पहले वह स्वयं अकेलापन चुनते थे, अब अकेलापन, एकांतवास ही अंतिम विकल्प है. अकेलापन जितना होता नहीं उतना हम उसे अपनी निष्क्रियता से बढ़ा करते जाते हैं. सार्थक और रचनात्मक काम करने के लिए बड़े-बड़े जतन नहीं करने होते. इसे बहुत सरलता से छोटे-छोटे कामों से किया जा सकता है. बालकनी में बहुत से कबूतर आते हैं, हर दिन नियम से उनके लिए पानी और खाना रखा जा सकता है. गमलों की देखभाल और पौधों से बात की जा सकती है. कविताएं सुनी जा सकती हैं, फोन पर सुनाई जा सकती हैं. कविता में हमारे दिमाग को सक्रिय और रचनात्मक बनाए रखने की बहुत बड़ी ताकत होती है. डिजिटल पर हमें सुविधा उपलब्ध है कि हम किसी भी कवि की रचनाएं आसानी से पढ़ और सुन सकते हैं. नेटफ्लिक्स और ऐसे दूसरे विकल्प की मैं सलाह नहीं देता क्योंकि वह हिंसा से भरे हुए हैं. अपराध से भरे हुए. घृणा उनमें ठूंस कर भरी गई है. हां अपनी रुचि की फिल्में और रचनात्मक धारावाहिक देखे जा सकते हैं.

कविता और किताबें इस अकेलेपन के सबसे बड़े सहयात्री हैं. बहुत ही आसानी से सुलभ हैं. ऐसे लोग जो निराशा की ओर बढ़ रहे हैं उन्हें यह समझने की जरूरत है कि यह संकट सबके लिए एक जैसी समस्या लेकर आया है. कोरोना किसी से कोई भेदभाव नहीं करता. इसलिए अपने भीतर कमतरी/हीनता बोध (इंफीरियारिटी) को किसी भी तरह जगह देने से बचें. ऐसे लोगों से ही बात करिए जो आपको, आपके मन को थोड़े उजाले की ओर ले जा सकें. इस समय हम सब जिस तरह के भावनात्मक और शारीरिक अकेलेपन से लड़ रहे हैं, वह असल में इस संकट के खत्म होने के बाद हमारे संबंधों में प्रेम का आधार भी बन सकता है. आशा है आप अपना ख्याल अधिक संवेदनशीलता के साथ रखेंगे. इस बारे में आपके सभी प्रश्नों के लिए मैं उपस्थित हूं. संपर्क- ई-मेल dayashankarmishra2015@gmail.com. आप फेसबुक और ट्विटर पर भी अपने सवाल साझा कर सकते हैं.

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: April 17, 2020, 10:07 PM IST
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