#जीवनसंवाद : मन को लड़ने से बचाना!

#जीवनसंवाद : मन को लड़ने से बचाना!

#जीवनसंवाद : मन को लड़ने से बचाना!

#JeevanSamvad: अपने मन और विचार को व्यर्थ के मानसिक संघर्ष से बचाना है. ऊर्जा सीमित है, अगर उसे इस तरह यहां से वहां नष्ट किया जाता रहेगा तो इससे जीवन का सबसे अधिक नुकसान होगा.

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हमारी जितनी ऊर्जा किसी से शारीरिक, प्रत्यक्ष वाद-विवाद में खर्च नहीं होती उससे कहीं अधिक मानसिक विवाद में खर्च होती है. इस संबंध में आपको एक छोटी सी कहानी सुनाता हूं. संभव है, इससे मैं सरलता से आपके मन तक वह पहुंचा सकूं जो मैं चाहता हूं. ‌जंगल में एक दिन गधे को बहुत गुस्सा आया. उसकी नाराज़गी चरम पर थी. उसने सीधे शेर को युद्ध के लिए निमंत्रित कर दिया. उसे मित्रों ने बहुत समझाया. पर गधा अंततः गधा ही है. उसने कहा शेर को मुझसे युद्ध करना ही होगा. लोमड़ी और लकड़बग्घे ने आशा भरी निगाह से शेर की ओर देखा. लेकिन शेर चुपचाप वहां से निकल गया. लोमड़ी पीछे भागी. उसने कहा, राजन! गधे ने चुनौती दी है, उसकी चुनौती को हल्के में नहीं लेना चाहिए.

आपको युद्ध करना ही चाहिए. शेर ने लोमड़ी की आंखों में ध्यान से देखते हुए कहा, गधे से लड़कर मुझे क्या मिलेगा! अगर मैंने उसे मार ही दिया जो कि तय है, तो भी जंगल यही कहेगा यह कौन सी बड़ी बात है. लेकिन अगर गलती से भी उसके दो- चार प्रहार मुझ पर पड़ गए तो लोग कहेंगे गधे में बहुत साहस था. और अगर किसी तरह गधा मुझसे जीत ही गया (जिसकी संभावना दूर-दूर तक नहीं है) तो उसके बाद मेरी जीवित रहने का कोई अर्थ नहीं होगा. क्योंकि गधा ही जंगल का राजा बन जाएगा. गधे से हारकर मैं जंगल में नहीं रह सकता. इसलिए गधे से युद्ध का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता. उसे समय आने पर किसी भी दिन सबक सिखाया जा सकता है. राजा ने कहा, लोमड़ी अपने लालच पर थोड़ा नियंत्रण रख. पता है, तुझे गधे का मांस पसंद है लेकिन इस तरह नहीं! इतनी जल्दी नहीं.

यह गधे और शेर की कहानी नहीं है. यह हर दूसरी बात पर किसी से लड़ने को तैयार मन से बचाव की तैयारी है. मन लोमड़ी की तरह आपको धकेलता रहता है, हर बात का हिसाब लेने के लिए. इसने यह कह दिया. उसने वह कह दिया. मैं तो बड़ा अधिकारी हूं, लोग मेरी इज्जत ही नहीं करते. सबक सिखा कर रहूंगा. आखिर तुम्हें पता चल जाएगा मैं कितना शक्तिशाली हूं! इस तरह के विचार मन लगातार हमारी ओर फेंकता रहता है. वह हमें तैयार करता रहता है कि हम उसके जाल में फंसते जाएं. वही बचते हैं जिनके पास विवेक (शेर) होता है.


कहानी में शेर के पास सब कुछ है. उसके बाद भी हुआ स्वयं को व्यर्थ की दिलासा देने वाले अहंकार के युद्ध से बचा रहा है. हमें भी अपने मन पर वैसी सवारी करनी है, जैसी कथा में शेर अपने मन पर कर रहा है. हम प्रत्यक्ष रूप से किसी से भले न लड़ें लेकिन मानसिक रूप से लगातार लड़ते रहते हैं. परेशान होते रहते हैं. पति -पत्नी के संकट. पिता पुत्र/पुत्री, सास-बहू/दामाद के संघर्ष, ऑफिस में राजनीतिक दांव पेंच वास्तविक रूप से जितने मुश्किल नहीं होते उससे कहीं अधिक बढ़ कर मानसिक डर बनाए रखने का काम करते हैं.
इसलिए अपने मन और विचार को व्यर्थ के मानसिक संघर्ष से बचाना है. ऊर्जा सीमित है, अगर उसे इस तरह यहां से वहां नष्ट किया जाता रहेगा तो इससे जीवन का सबसे अधिक नुकसान होगा. जब आपको मानसिक ऊर्जा की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, तब तक आप थक हार कर निराश हो जाते हैं.

लॉकडाउन में नौकरी अभी गई नहीं है, मदद देने वाले हाथ ने इनकार नहीं किया है. उसके बाद भी लोग अपना जीवन समाप्त कर रहे हैं. डर के मारे हृदय को चिंता की भट्टी में झोंके दे रहे हैं. जो संकट आएगा, उसे सहा जाएगा. उसके आने के पहले समर्पण नहीं करना है. संघर्ष हमारा प्रिय मित्र है, उसका हाथ इतनी आसानी से मत छोड़िए. उसमें आपको हर संकट से बचाने की क्षमता है!

दयाशंकर मिश्र



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