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#जीवनसंवाद : नौकरी दूसरी मिलेगी, जिंदगी नहीं!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 10:07 PM IST
#जीवनसंवाद : नौकरी दूसरी मिलेगी, जिंदगी नहीं!
#जीवनसंवाद : नौकरी दूसरी मिलेगी, जिंदगी नहीं!

#JeevanSamvad: महाभारत, रामायण, गीता, क़ुरान, बाइबल से लेकर धार्मिक उपदेशों की लंबी परंपरा है हमारे यहां. काश, हम अपने धर्मों से कुछ सीख पाते. उनसे जीवन के लिए कुछ सृजनात्मक रस ले पाते.

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उत्तरप्रदेश के ललितपुर से 'जीवन संवाद' के सुधि पाठक ने दुखद जानकारी देते हुए बताया कि उनके परिवार के एक युवा ने नौकरी चले जाने के डर, बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर ली. जिन्होंने अपने बेटे को खोया, वह माता-पिता इस समय कितने गहरे दुख में होंगे, इसका केवल अंदाज़ा लगाया जा सकता है. दूसरे का दुख समझा सकता लेकिन सहा नहीं जा सकता. सहना केवल उसे होता है, जिस व्यक्ति की आत्मा के सबसे निकट होते हैं.

मध्य प्रदेश के भिंड से भी हमारे रवि भदोरिया ने इसी तरह की दुखद खबर दी. उनके मित्र का पारिवारिक (पति-पत्नी के बीच) विवाद इतना बढ़ गया कि मित्र ने आत्महत्या कर ली. दोनों ही घटनाएं हमारे कमजोर मन का स्पष्ट संकेत हैं. यह बताती है कि हमारे मन बहुत कमजोर हो चले हैं. ज़रा-सा तनाव बढ़ा नहीं, मन तार-तार.

कैसे-कैसे डर हमने पाल लिए हैं. अगर बीमार हुए हैं तो ठीक हो जाएंगे. नौकरी चली गई, तो यकीन मानिए कुछ महीने के भीतर दूसरी मिल जाएगी. एकदम वैसी न मिले तो उससे मिलती-जुलती दूसरी मिल जाएगी. जो काम आप ईमानदारी से कर रहे थे, वह दुनिया में एक दिन में गायब नहीं होता. हुनर हवा में उड़ने वाली चीज़ नहीं.



कितने आध्यात्मिक देश हैं, हम! यह छल है. भ्रम है जो टूटना चाहिए. महाभारत, रामायण, गीता, क़ुरान, बाइबल से लेकर धार्मिक उपदेशों की लंबी परंपरा है हमारे यहां. काश, हम अपने धर्मों से कुछ सीख पाते. उनसे जीवन के लिए कुछ सृजनात्मक रस ले पाते. हर धर्म और उसकी शिक्षा गहरी प्रेरणा से जुड़ी हुई है.



हम कुछ भी नहीं सीखते अपने भगवान से! अल्लाह से! ईशु और उन सब से जिनसे हमें सीखना चाहिए. काश! हम सीख पाते, तो आत्महत्या हमारा रास्ता नहीं होता. यकीन मानिए अगर कोई कहता है कि उसने धर्म को जाना है, तो वह आत्महत्या को नहीं चुनेगा. आत्महत्या को वही चुनेगा जो सच्चे अर्थों में धार्मिक नहीं है. जिसे अपने ईश्वर पर भरोसा नहीं है. अगर ईश्वर को मानता है तो वह ऐसा नहीं कर सकता. अगर ईश्वर को नहीं मानता तो उसका अपने पर भरोसा इतना बड़ा होना चाहिए कि उसके आगे मुश्किलें हार जाएं.


अगर ईश्वर के सहारे चलते हो तो उस पर गहरा भरोसा रखो. वैसा भरोसा जैसा जंगलों और पथरीली राहों पर भटकते हुए पांडवों को कृष्ण पर था. ललितपुर के इस युवक की तो नौकरी जाने वाली थी, युधिष्ठिर की तो पूरी प्रतिष्ठा ही चली गई थी. गांव, समाज, नगर में उनका परिहास हो रहा था. कैसा धर्मराज, कैसे विवेकवान, बलशाली जो पत्नी की रक्षा न कर सके! महाभारत में नहीं लिखा, उनके मन में आत्महत्या के विचार आए. हां, प्रायश्चित के आंसू उन्हें धो रहे थे. मैल था जरूर, लेकिन मन में जमा नहीं. दूसरी ओर दुर्योधन का मनोबल कमजोर था. उसने पिता धृतराष्ट्र को धमकाया था कि अगर उसे सत्ता नहीं सौंपी गई तो वह जीवन त्याग देगा.


राजकुमार राम के बारे में सोचिए! जिन्हें सिंहासन पर बैठने से मुश्किल से दस घंटे पहले यह पता चला कि उन्हें न केवल राजगद्दी से बर्खास्त किया जा रहा है बल्कि जंगल जाने के लिए कह दिया गया है. यह कठोर निर्णय था. कुछ हद तक क्रूर भी. लेकिन राम के जीवन में अगर आप जंगल को हटा दीजिए, तो सौंदर्य कहां है. संभवतः इसी कारण सबसे अधिक संघर्ष वाले इस समय को तुलसीदास ने सुंदरकांड नाम दिया है. क्योंकि मनुष्य का व्यक्तित्व और जीवन संघर्ष से ही निखरता है. कृष्ण जीवन बचाने के लिए गुफा में छिपने से संकोच नहीं करते. उनके विरोधी उनका उपहास उड़ाते हैं, उन्हें रणछोड़ कहते हैं.

रात -दिन प्रवचन और धार्मिक उपदेशों में जुड़ा हुआ समाज कहां गलती कर रहा है जो अपने ही बच्चों को सही जीवन दर्शन नहीं दे पा रहा है. धर्म का सही अर्थ क्या है? धार्मिकता क्या है? सच तो यह है कि हम धार्मिक बचे ही नहीं. हम एक समाज के रूप में लकीर के फकीर हो गए हैं. पंचतंत्र की कहानी आपको याद है. तोतों को शिकारी के जाल में फंसने से बचने के लिए एक साधु उनको सबक याद कराता है - शिकारी आता है, जाल फैलाता है, हमें जाल में नहीं फंसना चाहिए!


जब तोते सारा दिन इसे रटने लगते हैं, तो साधु को लगता है अब वे सुरक्षित हैं. वह नई दिशा की ओर बढ़ जाता है. एक दिन देखता है शिकारी जाल में कुछ तोतों को उठाएं चला जा रहा है और तोते रट रहे हैं- शिकारी आता है, जाल फैलाता है हमें जाल में नहीं फंसना चाहिए! आप सभी से मेरा विनय पूर्वक निवेदन है कि अपने अपने जीवन को बचाइए.

अपने परिजनों के जीवन को बचाइए. मुश्किल में उनका साथ दीजिए. समय रहते साथ दे देना शव यात्रा में कंधा देने से बहुत सरल काम है, मित्रो. मत सोचिए कि आत्महत्या का संकट आपसे बहुत दूर है. यह बहुत ही संक्रामक बीमारी है, कोरोना वायरस से अभी भी उतना खतरा नहीं है जितना आत्महत्या के संक्रामक होने से है. मेरी बात ध्यान रखिएगा, कोरोना वायरस में उतने लोग नहीं मरेंगे जितने हर साल आत्महत्या से मर रहे हैं. जीवन को गहरी प्रेरणा की जरूरत है. मन और आत्मा से सुख, प्रतिष्ठा और झूठी शान के पर्दे उतार दीजिए. यह बच्चों का जीवन नहीं बचा पा रहे हैं. बच्चों को जीवन की शिक्षा, हौसला, प्रेम और अनुराग दीजिए. बच्चा जिंदा रहा तो वह बाकी सब स्वयं कर लेगा. शुभकामना सहित.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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First published: May 6, 2020, 6:39 AM IST
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