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#जीवनसंवाद : शीशे जैसे मन!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 9:55 PM IST
#जीवनसंवाद : शीशे जैसे मन!
#जीवनसंवाद : शीशे जैसे मन!

#JeevanSamvad: नीम आम से उसके जैसा होने को नहीं कहता. उससे कुछ दूरी पर रहता है लेकिन अपना स्वभाव नहीं छोड़ता. दूसरी तरफ हम एक-दूसरे को बदलने की जिद में जिंदगी तबाह कर देते हैं.

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'सब कुछ ठीक था. अचानक किसी बात पर दोनों उलझ पड़े. उसके बाद वह अपने कमरे में चले गए, कुछ देर बाद जब कोई आहट नहीं हुई तब जाकर देखा तो पाया कि उन्होंने अपना जीवन समाप्त कर लिया!' ‌ ‌

इस तरह की खबर इन दिनों सामान्य हो चली है. हमारे मन बात-बात पर टूटने लगे हैं. ज़रा-सा मन मुटाव हुआ नहीं कि मन ऐसे टूट जाता है कि संयम, प्रेम और साथ निभाने के वायदे चटक जाते हैं. मन कांच के बर्तन सरीखे नाज़ुक होते जा रहे हैं. मन का इतना मुलायम होना जीवन के लिए ठीक नहीं! कांच जैसे मन से दुनिया में हम कैसेे रह पाएंगेे. जीवन संघर्ष का पर्यायवाची है. सुख इसका केवल छोटा सा हिस्सा है. ऐसे में छोटी-छोटी बात पर दुखी होने वाले कैसे उस दुनिया का सामना कर पाएंगे, जहां हर किसी की ओर केवल दुख उछाला जा रहा है. हर कोई आपको यह बताने पर आमादा हो कि आप में कमियां ही कमियां हैं. बदलने की बहुत ज़रूरत है. बदले बिना काम नहीं चलेगा.

इन विचारों ने हमारा बहुत अधिक नुकसान किया है. कुछ दिन पहले एक फिल्म आई थी, 'बाला'. आयुष्मान खुराना की यह फिल्म आत्मा के लिए अमृत सरीखी है. विशेषकर आखिरी आधा घंटा. ‌ जिसमें, आयुष्मान को यह बोध होता है कि हम जैसे हैं, सारी सुंदरता उसमें ही है. हमारी सुंदरता दूसरे जैसे होने में कैसे हो सकती है. प्रकृति इसका सबसे सुंदर उदाहरण है. नीम, बबूल, खजूर हैं और आम, अमरूद भी. प्रकृति में विविधता है.



यह विविधता और भिन्नता ही सबसे बड़ी चीज़ है. प्रकृति सबसे बड़ी सृजनकर्ता है. उसकी बनाई चीज़ो को 'लॉक डाउन 'के दिनों में बहुत ही स्पष्टता से देखा जा सकता है. सहारनपुर से हिमालय की रेंज, रुड़की से उसकी झलक. शहर में किलोमीटर तक फैले दृश्यों को सहजता से देखनेे का यह सुख पहले कभी नहीं था. इसलिए उसकी सहज विविधता इतनी सुलभ नहीं थी. इस विविधता में ही मन के मजबूत होने के भेद छुपे हैं.




नीम आम से उसके जैसा होने को नहीं कहता. उससे कुछ दूरी पर रहता है लेकिन अपना स्वभाव नहीं छोड़ता. दूसरी तरफ हम एक-दूसरे को बदलने की जिद में जिंदगी तबाह कर देते हैं. काश! हम समझ पाते जीवन की सार्थकता गहरे धैर्य, ठोस स्नेह में है.


जिंदगी को हमने इतना नाजुक, कांच की तरह छन्न से टूटने वाला बना लिया है कि थोड़े से परिवर्तन को भी बर्दाश्त नहीं कर पाते. हमारे मन इतने कमजोर कैसे होते जा रहे हैं. इसकी दो बड़ी वजह है -

1. अकेलापन : पिछले एक दशक में हम सबके भीतर अकेलापन बढ़ता जा रहा है. सब निजी होता जा रहा है. नौकरी लगी, घर बड़ा हुआ. सब कुछ अकेले जीना है. किसी के साथ नहीं. ऐसे में जब मन टूटता है, तो ठीक कांच के बर्तन की तरह वह टुकड़े़े टुकड़े हो जाता है. उसे कोई संभालने वाला नहीं. क्योंकि हमारे भीतर का अकेलापन उसेे किसी के साथ जुड़ने नहीं देता.
2. संघर्ष नहीं करना: अपनी इच्छा की तुरंत पूर्ति के अनुभव वाला बचपन, मन को इस बात की अनुमति नहीं देता कि वह प्रतीक्षा करे. संघर्ष की धूप में धूप को सहने की जगह हम घबराने लगते हैं. हर इच्छा की पूर्ति संभव नहीं. लेकिन यह मन को कौन समझाए.

असल में मन को भी वैसे ही प्रशिक्षण की जरूरत है जैसे शरीर को. हमारा सबसे बड़ा दुश्मन मन है, लेकिन सबसे बड़ा मित्र भी वही है. दुश्मन इसलिए कहा गया क्योंकि भटकाने का काम उसका ही होता है. मित्र, इसलिए क्योंकि मन के बिना कुछ संभव नहीं. मन को मजबूत बनाना होगा. जीवन के प्रति वैज्ञानिक चेतना से भरा मन हमें अनगिनत संकटों से बचाने की क्षमता रखता है. ऐसेेे मन के लिए खुद को तैयार कीजिए.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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First published: May 7, 2020, 6:57 AM IST
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