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#जीवन संवाद : छूटे हुए लोग!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 26, 2020, 12:46 AM IST
#जीवन संवाद : छूटे हुए लोग!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad उनकी ओर लौटिए जिन्‍हें आप तेज़ गति के जीवन में छोड़ आए हैं. छूट गए हैं. उस प्रेम और स्‍नेह की ओर लौटिए, जिससे किसी भी संकट को हराना संभव है.

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अनिवार्य एकांतवास में कुछ वक्‍त उनकी तलाश के लिए भी द‍िया जाना चाहिए, जिनका सााथ अचानक तेज़ हुई जिंदगी में छूट गया. कितने ही ऐसे लोग होते हैं, जिनको हम याद तो करते रहते हैं लेकिन उनकी याद को व्‍यस्‍तता की चादर से ढंकते रहते हैं. इसलिए अब जबकि जिंदगी की गति धीमी हुई है. प्रकृति को हम सुन रहे हैं. फूलों की सुगंध और परिंदों का कलरव मन तक पहुंच रहा है. कुछ अनि‍श्‍चितता के बीच भी आसमान की ओर देखते हुए अब दिल्‍ली के डीजल, धुंए में डूबे रहने वाले बादल तक नीले, साफ सुथरे हो चले हैं. कानपुर, दिल्‍ली में नदी को देखते हुए दिल डूबता नहीं.

ऐसे में मेरी गुजारिश है कि थोड़ा-सा समय जिंदगी को भी दिया जाए. रिश्‍तों का मांझा सुलझाने का वक्‍त है. उन संबंधों की ओर देखने का समय है, जो बिना किसी अनबन के बस भागादौड़ी में छूटते गए. पुराने दोस्‍त, पड़ोसी, सहकर्मी सब कहां गए. हमने उन्‍हें समय की धूल के हवाले होने दिया. कुछ लापरवाही में हुआ, कुछ कंपनियों के रचे उस मायाजाल में जहां हमें सिखाया गया कि काम के सिवा तुम्‍हारा कोई सगा नहीं.


बीते बीस बरस में हमारा समाज कहां से कहां चला गया. शेयर बाजार खूब आगे बढ़े, हमारी जरूरतों को पंख लगे, हमने सुविधा के नए पैमाने गढ़ लिए. पहले हम जिंदगी भर की कमाई से रहने के लिए यथाशक्ति घर बनाते थे, अब हमने नियम उल्‍टा कर दिया. हमने महंगे घर, गाड़ियों और कपड़ों का अंबार लगा दिया.



हम अब जिंदगी भर इसलिए कमाते करते रहेंगे ताकि ईएमआई देते रहें. हमने जीवन का लक्ष्‍य आनंद, सुख की जगह ईएमआई बना लिया है. एक दूसरे को किसी भी कीमत पर पीछे छोड़ने की जिद के बीच आपको यह बातें पुराने ज़माने की लग सकती हैं. लेकिन कोरोना का संकट क्‍या कहता है.



दुनिया इतनी तेज़ी से बदल जाएगी, यह हमने भले नहीं सोचा हो पर अब वह बदल रही है. कोरोना का संकट हमारी जीवनशैली की झलक देने के साथ ही हमारी विचार प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है. यह संकट हमें यह बताने के लिए भी पर्याप्‍त है कि हम किस दिशा में निकल पड़े थे. हमारे सोच विचार, निर्णय करने की प्रक्रिया सब कहां जा रही थी. हम अपनी हसरतों के पीछे दौड़ता समाज बनकर रह गए हैं. हसरत से अधि‍क नकलची बंदर. जो सब कर रहे हैं/जिस तरफ सब जा रहे हैं, उसी दिशा में जाने को निर्णय हमेशा सही नहीं होता.

कोरोना के कारण बड़ी संख्‍या में नौकरी जाने का संकट बढ़ा है. ऐसे में रिश्‍तेदारों, संयुक्‍त परिवार की याद ताज़ा हो रही है. सोच- समझकर खर्च करने की सलाह देने वाले याद आ रहे हैं, जिनको हमने ‘पुराने’ जमाने का कहकर पीछे धकेल दिया था.


हम इसलिए किसी काम, दिशा को नहीं चुन रहे कि हमें उससे कुछ सुख, संतोष और सुकून मिले, बल्कि हमें समझा दिया गया कि उसी ओर जाना है, जिस ओर सब जा रहे हैं. सब कुछ जरूरी है! जिंदगी में अपने सपनों के लिए बहुत कुछ करना होता है!


ऐसी व्‍यक्तित्‍व विकास (पर्सनैलिटी डेवलपमेंट) की कथाओं ने जितना नुकसान हमारे युवाओं का किया है, उतना दूसरी किसी चीज़ ने नहीं किया. अपने को बदल डालो, वैसा बनो, जैसा हम कह रहे हैं. इस विचार ने हमारे संभावनाशील दिमागों को क्‍लर्क बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई. हमें रिश्‍तों, समाज से कटने और अपने निजी जीवन पर ध्‍यान देने को उकसाया.

ऐसा इसलिए किया गया क्‍योंकि किसी को बहकाने, अपने हिसाब से चलाने के लिए यह जरूरी होता है कि उसे आप निरंतर अकेला करते जाएं. हम बहते गए, उधर जहां बाजा़र का दरिया बहता गया. अब ज‍ब व्‍यक्ति पर निजी संकट गहरा रहा है, उसे अपने समाज की ओर लौटना ही होगा.

इसलिए, मेरे इस विनम्र अनुरोध को स्‍वीकार कीजिए, उनकी ओर लौटिए जिन्‍हें आप तेज़ गति के जीवन में छोड़ आए हैं. छूट गए हैं. उस प्रेम और स्‍नेह की ओर लौटिए, जिससे किसी भी संकट को हराना संभव है.

संपर्क : Email dayashankarmishra2015@gmail.com. अपनी बात आप फेसबुक मैसेंजर ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं.

https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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First published: April 13, 2020, 9:12 PM IST
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