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#जीवन संवाद : कोरोना के बाद की तैयारी!

News18Hindi
Updated: May 24, 2020, 10:27 PM IST
#जीवन संवाद : कोरोना के बाद की तैयारी!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: आपकी बहुत सी यादें संभव हैं अब केवल कोरोना काल से पहले में बदलकर रह जाएं. मुझे बहुत प्रसन्नता होगी अगर ऐसा न हो लेकिन फ़िलहाल इसकी संभावना बहुत कम है. हमारे सामाजिक व्यवहार, नौकरियां, कारोबार में बहुत सारा बदलाव होने जा रहा है.

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जो कुछ हम किताबों में पढ़ते हैं, काश! उसका थोड़ा सा हिस्सा अपनी जिंदगी में शामिल कर पाते. बचपन से हमें पढ़ाया, समझाया, बुझाया गया है कि हमारा जीवन सीमित है. जिंदगी पोस्टपेड नहीं बल्कि प्रीपेड मोबाइल सिम की तरह है. उसके बाद भी हम सब ठीक-ठीक वैसे ही निर्णय लेते हैं, जैसे हमें सिखाया गया है. हजारों वर्षों से. हमारे चिंतन और निर्णय लेने की प्रक्रिया अभी भी नहीं बदली है.
कृपया इसे बहुत छोटे-छोटे निर्णय से जोड़ कर न देखें. छोटे निर्णय से मेरा आशय है, नौकरी, शिक्षा और विवाह. मैंने जानबूझकर इनको छोटा कहा क्योंकि जीवन सचमुच इनसे बहुत बड़ा है. संभव है, आपने अपनी नौकरी का फैसला खुद किया हो. संभव है, क्या पढ़ना है, यह भी आपने तय किया हो. यह भी संभव है कि किससे विवाह करना है, यह भी आपने तय किया हो.

ऐसे निर्णय स्वयं लेने वालों की संख्या हालांकि कम है लेकिन जो भी हैं, अगर वह ऐसा कर पाए तो पूरी जिंदगी यही मानते रहते हैं, उन्होंने बड़ा काम कर लिया. अब कुछ करने को शेष नहीं.


यह तीनों काम असल में समंदर के भीतर छुपे बर्फ के उस पहाड़ की तरह हैं, जिसकी एक बहुत छोटी सी झलक दूर से पहाड़ की ओर आ रहे जहाज को मिलती है. जहाज के कप्तान, सहायक, मार्गदर्शक यह मानते हैं कि बहुत छोटा सा बर्फ का टुकड़ा है. जहाज, इस टक्कर को सह लेगा. बगल से गुजर जाएगा, लेकिन ऐसा होता नहीं. बर्फ का पहाड़ कहीं विशाल होता है, समंदर के भीतर. जहाज आइसबर्ग से टक्कर को नहीं सह पाते. टाइटैनिक की विश्व प्रसिद्ध कहानी हमें यही समझाती है.



हमारी जिंदगी भी समंदर में सफर कर रहे यात्री की तरह है, जो अक्सर बाहर से नजर आने वाले आइसबर्ग को केवल 'छोटा टीला' समझ बैठते हैं. उसी आधार पर जीवन के फैसले करते रहते हैं. फ़ैसले करते समय हम समझते हैं कि हम सही दिशा में चल रहे हैं, क्योंकि हम उसी रास्ते चल रहे हैं जो अनेक वर्षों के अनुभव के आधार पर बताया गया है. पिताजी ने ऐसा कहा था इसलिए मैंने यह किया! यह नौकरी मैंने इसलिए चुनी क्योंकि सब लोग यही सुन रहे थे. इस पुरुष/स्त्री से विवाह मैंने इसलिए किया क्योंकि सब यही चाहते थे. अपनी आर्थिक स्थिति से बहुत आगे जाकर क़र्ज का बोझ, इसलिए चुना क्योंकि सब यही कर रहे थे!



उदारीकरण के बाद न केवल आर्थिक तौर पर बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी हमारी सोच समझ में बहुत अंतर आया है. समाज से सही ग़लत का भेद मिट गया. पहले अगर कुछ गलत किया गया है, (किसी के द्वारा भी) तो आंखों में शर्म रहती थी. बॉलीवुड की फिल्में इसका सबसे अच्छा उदाहरण है. फ़िल्मों का नायक कल्पना से कभी नहीं आता. वह हमेशा ठोस धरातल से ही जन्म लेता है.

ज़रा देखिए उस नायक का फ़लसफ़ा, चरित्र और सही गलत का भेद कैसे मिटता गया. पहले इंटरवेल तक आते-आते नायक को अपनी गलतियों का एहसास होने लगता था. दर्शक उसकी गलतियों को अव्यवस्था के कारण किए गए अपराध से जोड़ते हुए उसके पक्ष विपक्ष में सोच विचार किया करते थे. धीरे-धीरे नायक के भीतर से अपराध का बोध खत्म होता गया. वह अधिक हिंसा, क्रूरता और जैसे को तैसा के सिद्धांत से भरा पूरा बनने लगा. यह सच है कि सिनेमा मनोरंजन की विषय वस्तु है. उसमें उपदेश और शिक्षा की बहुत थोड़ी गुंजाइश है. लेकिन इसी गुंजाइश के भीतर दशकों तक हमारे नायक अंत में घर लौटते व्यक्ति के लिए आशा के फ़ूल लेकर लौटते रहे हैं.


ऋषि कपूर हमारे बीच नहीं हैं. लेकिन उनकी फिल्म प्रेमरोग जो पूरी तरह कमर्शियल फिल्म थी, लेकिन सामाजिक बुराई पर आधारित पटकथा के किरदारों को अगर आज जीवित कर दिया जाए. तो बहुत संभव है कि पूरी कहानी ही उल्टी बैठ जाए. नायक हिंसा से भर जाएगा प्रेम की जगह. समाज अपने भीतर की बेचैनी को कुछ नहीं अर्थों में ही व्यक्त करने लगेगा.

कुल मिलाकर सारांश यह है कि पहले हिंसा और अपराध से भरे सिनेमा में भी आशा बहुत अधिक थी. अब आशा के फूल खिलने की जगह कुम्हलाने लगे हैं.


मूल विषय पर लौटते हैं. हमारी दुनिया बहुत तेजी से प्री और पोस्ट कोरोना काल में विभाजित होने जा रही है. आपकी बहुत सी यादें संभव हैं अब केवल कोरोना काल से पहले में बदलकर रह जाएं. मुझे बहुत प्रसन्नता होगी अगर ऐसा न हो लेकिन फ़िलहाल इसकी संभावना बहुत कम है. हमारे सामाजिक व्यवहार, नौकरियां, कारोबार में बहुत सारा बदलाव होने जा रहा है. कोरोना का संकट इतनी जल्दी नहीं जाने वाला. ज़रा सोचिए चुनाव कैसे होंगे? रैलियां कैसी होंगी, प्रचार कैसे होगा. स्कूल और हमारी वर्तमान शिक्षा बहुत तेजी से बदल जाएगी, संभव है बेकार हो जाए और नए सिरे से तैयारी करनी पड़ेगी. जिन चीजों पर कल तक हम इतरा रहे थे, वह बेमानी लगने लगें. सिनेमा हॉल बदल जाएंगे, फिल्में संभव है सिनेमा हॉल/मल्टीप्लेक्स में उस तरह न दिखाई जा सके जैसी अब तक दिखाई जा रही थीं.

यात्रा के नियम कायदे तेज़ी से बदल जाएंगे. ओला उबर के कारण जिन लोगों के रोजगार कम हो गए थे ऐसे निजी वाहन चालकों के दिन लौट सकते हैं. हम पर यात्री कहीं अधिक भरोसा करेंगे बजाए कंपनी वालों के.

ऐसे समय में जब बहुत अधिक अनिश्चितता है. मेरे दो सुझाव हैं. आपके जीवन में अगर कोई गड़बड़ी है तो सबका जिम्मेदार स्वयं को मत मानिए. सब कुछ आपके कारण गड़बड़ नहीं हो रहा है. हर चीज़ आपके ख़राब काम करने से नहीं जुड़ी है. बल्कि आप दुनिया से जुड़े हैं. दुनिया में जो कुछ होता है, वह एक दूसरे से अब बहुत अधिक गहराई से जुड़ने वाला है. इसलिए अपने को दोषी मानना बंद कीजिए. दूसरा लॉक डाउन के बाद जो काम चल रहे हैं अगर उनके बंद होने का खतरा है तो उतना ही अवसर है दूसरी नई चीज़ों के शुरू होने का. इसके लिए जरूरी है, आप स्वयं को थोड़ा बेहतर समझने की कोशिश करें.

उन क्षमता और योग्यताओं की तरफ ध्यान दें, जिनमें बदली हुई परिस्थितियों में आपके लिए संभावना है. ऊपर जिन निर्णयों पर हमने संवाद किया, अगर आप उनको ध्यान से देखेंगे, तो बहुत संभव है आप समझ पाएंगे आप के निर्णय के आधार क्या थे. उनके जीवन में ऐसा क्या हुआ. इसलिए अब जो यह चुनौती आ रही है, उसके लिए निर्णय कैसे किए जाएं! मेरा मानना है निर्णय अपनी आत्मा के प्रकाश से होने चाहिए. दुनिया के ग्लैमर से नहीं. ग्लैमर की चकाचौंध से हम कुछ दूर तो चल सकते हैं लेकिन जीवन में चलते रहने के लिए जिस प्रकाश की जरूरत होती है, वह आत्मा की गहराई से ही मिल सकता है. यह एकांतवास उस गहराई तक पहुंचने में आपकी बहुत मदद कर सकता है. बस इतना याद रखिए आपको एकांत में रहना है, अकेले नहीं. दोनों में बहुत फर्क है. अपने एकांत को खोजिए वह बहुत से प्रश्नों के उत्तर देने में मदद करेगा. आपकी जिंदगी में बहुत बड़े निर्णय लेने का समय आ रहा है, संभव है आप पहले चूक गए हों, लेकिन इस बार नहीं. शुभकामना सहित.

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.​

दयाशंकर मिश्र
ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com अपने सवाल और सुझाव इनबॉक्‍स में साझा करें:
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First published: May 1, 2020, 4:08 PM IST
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