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#जीवन संवाद : अप्रेषित पत्र भेजिए!

जीवन संवाद

जीवन संवाद

जीवन सामान्य नियमों से चलता है. वह उतना ही सरस होता है, जितना सामान्य होता है. जीवन में सबसे बड़ा संकट तभी आता है, जब वह असामान्य होने की तरफ बढ़ जाता है. यह एकांतवास ऐसा ही है.

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यह हम सबके जीवन का सबसे संघर्षपूर्ण समय है. हम अदृश्य शत्रु से लड़ रहे हैं. यह अद्भुत दृश्य है, एकांतवास की शर्तें बढ़ती जा रही है. हमारे आसपास बहुत कम लोग कैसे हैं, जिन्होंने ऐसा सूनापन जिया है. साहित्य और इतिहास के आंगन में ही इस तरह की कहानियां हैं. कुल मिलाकर इस तरह का अनुभव किसी के पास नहीं है. कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन जीवन अपवादों से नहीं संचालित होता. जीवन तो सामान्य नियमों से चलता है. वह उतना ही सरस होता है, जितना सामान्य होता है. जीवन में सबसे बड़ा संकट तभी आता है, जब वह असामान्य होने की तरफ बढ़ जाता है.

यह एकांतवास, असामान्य है. हमें इसकी आदत नहीं. बीते कुछ बरसों में शोर हमारे जीवन का स्थाई भाव बन गया है. इसलिए भी यह शांति, एकांतवास अधिक तंग कर रहा है. डर से अधिक हम शांति से परेशान हैं. इससे पहले कि यह एकांतवास मानसिक समस्या पैदा करने लगे, हमें सजग होना चाहिए.

हमें थोड़ा वक्त इस बात के लिए देना ही होगा कि हम अचानक से आ गए थैला भर समय का उपयोग कैसे करें. अस्पताल और पुलिस. इन दोनों से जुड़े लोगों को छोड़कर इस समय अधिकांश लोगों के पास पहले की तुलना में समय बढ़ा ही है. तो इस समय का क्या किया जा रहा है.


'जीवन संवाद' को अपने पाठकों से मिल रहे संदेश, ई-मेल में इस एकांतवास को लेकर सवाल बढ़ते जा रहे हैं. अभी यह कहना मुश्किल है कि यह कितने दिन चलने वाला है. लेकिन इतना तय मानिए कि आपकी जिंदगी में पुराना वाला समय, दिनचर्या आने में कम से कम जुलाई तक का समय लग सकता है.
इसलिए,अपनी बेचैनी से कहिए कि वह थोड़ा ठहर जाए. जब एक बार हमें यह समझ में आ जाता है कि संकट लंबा है. देर तक चलने वाला है तो इससे हमारी मानसिक स्थिति थोड़ी बेहतर होती है. हम अपने आप को लंबे संघर्ष के लिए तैयार करते हैं. खुद को उसके अनुकूल ढालने की कोशिश करते हैं. इसलिए कोरोना से इस जंग को लंबी अवधि का मान लें. इससे आप हर दिन की गणना से बच जाएंगे. बहुत से लोग इस बारे में लिख रहे हैं कि उनके कामकाज ठप हो रहे हैं. संचित धन थोड़ा-थोड़ा करके कुछ दिनों, महीने में खत्म हो जाएगा. फिर क्या कीजिएगा.

इस बारे में मेरा निवेदन केवल इतना है कि संकट हम सब पर आया है. इसलिए इसे साझा करके ही जीता जा सकता है. अपने ऊपर बहुत अधिक दबाव मत लीजिए. जो होना है, वह सारे संसार का होना है. अगर आप ईश्वर को मानने वाले हैं तो सब कुछ उस पर छोड़ दीजिए. आप केवल अपनी सेहत की चिंता कीजिए.
अगर इसका उल्टा है आप ईश्वर में आस्था नहीं रखते. नास्तिक हैं. स्वयं को ही सब कुछ मानते हैं. तो भी कोई बात नहीं आपको विश्वास होना चाहिए कि आप सब कुछ संभाल लेंगे. दोनों ही स्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण केवल इतना है कि खुद को संक्रमण से बचाया जाए. इसलिए क्या होगा के तनाव से सबसे पहले बाहर आइए. अगर आपके पास कुछ नहीं बचा है, तो दूसरों की स्थिति बहुत अलग नहीं होगी.

हमारा मन हमेशा तुलना की ओर भागता है. तुलना से संचालित होता है. तो कोई बात नहीं, इस वक्त इसी तुलना को मन को संभालने में लगा दीजिए.


आप अगर सूखी रोटी खा रहे हैं तो पड़ोसी कोई इससे बहुत अधिक दूर नहीं है. हां इतना जरूर है कि यह वक्त संकट से अधिक रिश्तों की परीक्षा का है. कितने लोगों से आपने पूछा है, वह ठीक हैं. छोटी और थोड़ी ही मदद सही लेकिन उन्हें आपकी जरूरत तो नहीं. हर मदद रुपए/पैसे की नहीं होती. वह देखभाल और मानसिक सांत्वना की अधिक होती है. बड़ी संख्या में हम ऐसे लोगों को देख रहे हैं जिनसे बातचीत कर लेने से ही उनकी समस्या का हल हो जाता है.

असली परेशान तो वह प्रवासी मजदूर है, जो सीमाओं किनारे पड़ा है. अपने ही राज्य के भीतर प्रवेश को तरसते हुए. आपके घरेलू सहायक जो पूरी तरह आपकी कृपा पर निर्भर हो गए हैं. उनके पास कोई सहारा नहीं है. ऐसे लोगों के लिए करुणा और आपकी छोटी-छोटी मदद का बहुत महत्व है. लेकिन इसके साथ ही जीवन और प्रेरणा से भरे वाक्य भी जरूरी है. क्योंकि सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को बहुत गहराई से प्रेरित करती है.

मैं आपके अनुभव के बारे में नहीं कह सकता. अपने साथ तो मैंने महसूस किया है. कहानी पंद्रह बरस पुरानी है. नौकरी जा चुकी थी. कंपनी में ताला लग चुका था. दिल्ली में उस रात केवल मेरे पास तीस रुपए ही बचे थे. मैं जहां रह रहा था, अगले कुछ दिनों में मुझे वहां से जाना था. अब मुझे यह निर्णय लेना था कि इसे आज ही खर्च कर दिया जाए, कल के लिए कुछ बचा लिया जाए. उस वक्त कम से कम लोगों ने मेरी आर्थिक मदद तो नहीं की लेकिन मुझे मानसिक रूप से संबल दिया. उनके शब्द ऊर्जा से भरे हुए थे. विश्वास से भरे हुए थे. साथ लड़ने और खड़े रहने से भरे हुए थे. यह जो कुछ भी लिखा जा रहा है, उसमें उनकी भूमिका मेरे लिखने जितनी ही है.

दोस्तों, इसलिए मैं मानसिक ऊर्जा और सार्थक संवाद को किसी भी चीज़ से अधिक अधिक महत्व देता हूं. यह जो समय का तोहफा मिला है, आपको थोड़ा सा सही. उसका कुछ रचनात्मक उपयोग कीजिए.

ऐसे लोगों को चुनिए जिनसे लंबे समय से बात ना हुई हो. चिट्ठियां तो हम लिखते नहीं, लेकिन अब भी वह मन में पड़ी रहती हैं. बहुत से लोगों से कुछ कहने का ख्याल मन में अटका रहता है. हम टालते रहते हैं. इस समय को इस काम में संवारिए. ऐसे लोगों से माफी मांग लीजिए जिनके प्रति आपने गलतियां की हों. ऐसे लोगों से बतिया लीजिए, जिन्हें आप भूलने की कगार पर पहुंच गए हों. मन में अटके और टाले हुए सभी मानसिक अप्रेषित पत्र भेज दीजिए. यह जीवन कितना छोटा हो सकता है, कोरोना ने अच्छे से समझा दिया है. जो संकट से जितना अधिक सीखता है, उसका जीवन उतना ही सुखमय बनता जाता है.आइए ,करके देखते हैं.

संपर्क : Email dayashankarmishra2015@gmail.com. अपनी बात आप फेसबुक मैसेंजर ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं.

https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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