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#जीवनसंवाद : कहना और सहना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 6:06 PM IST
#जीवनसंवाद : कहना और सहना!
#जीवनसंवाद : कहना और सहना!

#JeevanSamvad: दरअसल हमने साथ देने को रजामंदी से बहुत ज्यादा जोड़ लिया है. अगर मैं आपके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि मैं आपके साथ नहीं हूं. असली रिश्ता वही है जिसमें असहमत होकर भी प्रेम कम न हो. ‌

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मन में कितना कुछ उमड़ता-‌घुमड़ता रहता है. हम अलग-अलग रिश्तों में रहते हुए जितना कहते नहीं है, उतना सहते हैं. उससे कहीं अधिक दिल में दबाए रखते हैं. इससे मन और आत्मा दोनों भारी होने लगते हैं. असल में बहुत जरूरी है कि हम जिन चीजों से परेशान हों, उन्हें व्यक्त जरूर करें. कह दें. जिस रिश्ते में इस डर से कभी कुछ नहीं कहा जाता कि रिश्ता टूट जाएगा. वह रिश्ता जीवन के लिए कभी सुखद नहीं हो सकता. उसकी नींव पर किसी रिश्ते की इमारत बहुत दिन नहीं टिक सकती!

इसलिए, कहना जरूरी है! लेकिन कहने का अर्थ यह नहीं कि हम सहने से बहुत दूर चले जाएं. आधुनिकता के जो गलत अर्थ हमने समझ लिए हैं, उनमें से एक है एक-दूसरे को सहने से दूर होते चले जाना. पति-पत्नी ही नहीं, भाई- बहन, सहकर्मी, सास-बहू. ऐसा कोई भी रिश्ता नहीं है, जिसमें एक दूसरे को 'सहे' बिना आगे बढ़ा जा सके. यहां यह ध्यान रखना है कि सहना का अर्थ किसी व्यक्ति के दुर्व्यवहार से नहीं है. उसके प्रति घृणा और अनादर से नहीं है. किसी व्यक्ति को सहने से अर्थ है, उसकी अपने अनुकूल न लगने वाली जीवनशैली/निर्णय के बाद भी उसका साथ देना. दरअसल हमने साथ देने को रजामंदी से बहुत ज्यादा जोड़ लिया है. अगर मैं आपके विचारों से सहमत नहीं हूं, तो इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि मैं आपके साथ नहीं हूं. असली रिश्ता वही है जिसमें असहमत होकर भी प्रेम कम न हो. ‌

मेरे बहुत ही प्रिय मित्र हैं. उनका आपने चाचा जी के साथ अनेक विषयों पर गहरा मतभेद रहा. इतना गहरा कि दोनों एक दूसरे को देखते ही अपने-अपने तर्कों से एक-दूसरे को हराने के प्रयास का कोई मौका नहीं छोड़ते. लेकिन इसके बाद भी दोनों ने कभी दूसरे का अनादर नहीं किया. दोनों के मन में एक-दूसरे के प्रति गहरी असहमति थी लेकिन इसके मायने यह नहीं कि उनका प्रेम कम हो गया.




मैं बहुत विश्वास के साथ यह कहता हूं कि मैंने ऐसे रिश्ते बहुत कम देखे. कुछ दिनों पहले मेरे एक विश्व यात्री मित्र ने नॉर्वे के एक ऐसे दंपत्ति से परिचय कराया था, जिनमें रिश्तों को लेकर गहरा प्रेम था. वह एक अनूठा समूह था, जिसमें एक साथ ऐसे लोग जिन्होंने दूसरे का साथ छोड़ दिया था फिर भी वह एक-दूसरे के प्रति आदर से भरे हुए थे. लेकिन दोनों एक-दूसरे को बहुत अच्छे से समझते हैं. इससे भी बढ़कर वह एक-दूसरे को सहना जानते हैं. सहने का अर्थ है, असहमति को स्वीकार करना प्रेम के साथ! लेकिन दोनों कभी भी अपने मन की बात कहने से पीछे नहीं हटे. अपने-अपने मन की बात कहते रहे.





इसके उलट ज्यादातर संबंध हम कैसे देखते हैं! एक दूसरे की हां में हां मिलाते रहना कि किसी तरह से साथ चलता रहे. ऐसे साथ चलते नहीं बल्कि घिसटने लगते हैं. साथ रहना केवल ज़रूरत बन जाता है, औपचारिकता बन जाता है. मन में कुंठा, अनादर, गुस्से, बदले की भावना बढ़ती ही जाती है. बीमार मन, बीमार शरीर को रचता है.

मन की शुद्धता का बहुत जरूरी कदम है, स्वयं को दूसरे के आचरण से मुक्त करना. जिसने ऐसा खुद करके देखा है. वही इसके स्वाद को समझ सकता है. इस अनुभव को बताना कठिन है, लेकिन महसूस करना और जीना उतना मुश्किल नहीं जितना हम समझते हैं.
तो आइए, कहने का अभ्यास कीजिए. लेकिन उसके साथ ही एक दूसरे को सहने का भी. सहने के बिना कहने का अर्थ बहुत देर तक नहीं रहेगा. शुभकामना सहित....

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)

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First published: May 12, 2020, 7:22 AM IST
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