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#जीवनसंवाद : मुझे पहचाना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: May 22, 2020, 6:29 PM IST
#जीवनसंवाद : मुझे पहचाना!
#जीवनसंवाद : मुझे पहचाना!

#JeevanSamvad: मूल पहचान भीतर है. लेकिन हमें भीतर जाते हुए डर लगता है. हमें हर चीज से डर लगता है जो हमसे सवाल करती है. इसीलिए हम अपनी चेतना, अपनी आत्मा और अंतर्मन को निरंतर गहराइयों में अकेला छोड़ दे जाते हैं.

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छोटी सी कहानी से बात शुरू करता हूं. संभव है, इससे आप सरलता से विषय से जुड़ सकेंगे. एक बार राजा राज्य के भीतर भ्रमण पर निकला. सब लोगों से मिलते-जुलते वह एक फकीर की कुटिया के बाहर पहुंचकर रुका. उसके मंत्रियों ने कहा आप यहीं ठहरिए. हम भीतर जाकर उनको बुलाते हैं. फकीर ने बाहर आने से इनकार कर दिया. उसने कहा राजा को मुझसे मिलना है तो उसे स्वयं आना होगा. मंत्रियों को बुरा लगा. अक्सर ही उन्हें सही बात बुरी लगती है. राजा जितना स्वयं सनकी नहीं होता, उससे कहीं अधिक उसके मंत्री उसे दिशा भ्रम कराते रहते हैं. लेकिन राजा विनम्र और संवेदनशीलता था.

उसने भीतर जाकर फकीर के दर्शन किए और उनसे राज्य की कुशलता के बारे में सलाह मांगी. इसके साथ ही राजा ने कहा आपको एक बार अवश्य ही राजधानी पधारना चाहिए. आपके दर्शन से वहां सुख शांति और बढ़ेगी. फकीर ने कहा मैं आ तो जाऊंगा लेकिन तुम्हारे लोग मुझे पहचान नहीं पाएंगे. राजा ने कहा ऐसा नहीं है, आपकी सेवा में कोई कमी नहीं रहेगी. ‌

कुछ समय बीता. एक दिन फकीर की इच्छा हुई. वह राज महल के सामने पहुंच गए. पहरेदारों से कहा, राजा से कहना वही फकीर आए हैं, जिनको स्वयं राजा ने बुलाया था. लेकिन सैनिकों ने कहा तुम्हारे जैसे यहां लोग हजारों आते हैं. सब यही कहते हैं, राजा ने बुलाया है. अगर तुम्हें भिक्षा चाहिए तो अवश्य ही ले लो लेकिन राजा से मिलना संभव नहीं. फकीर लौट गए. कुछ दिन बाद वही फकीर नए वस्त्र पहनकर, अपने किसी शिष्य की घोड़ा गाड़ी में बैठ कर आए. पहरेदार से वही पुरानी बात कही कि राजा से मिलना है. राजा से कहना वही फकीर आए हैं, जिनको स्वयं राजा ने बुलाया था. महल के द्वार खुल गए. राजा आदर सत्कार के साथ फकीर को भीतर ले गए. भव्य और मूल्यवान थालियों में भोजन परोसा गया. फकीर ने भोजन उठाया और उसे वस्त्रों को खिलाने लगे. जो आभूषण पहने थे उनको भोजन से लपेटने लगे.



राजा ने कहा, यह अवश्य ही कोई नई विधि है. मैंने आज तक किसी को ऐसे भोजन करते हुए नहीं देखा. यह किस प्रकार भोजन कर रहे हैं. फकीर ने कहा मैं उन वस्त्रों को खिलाए बिना कैसे भोजन कर सकता हूं जिनके कारण मैं यहां आया हूं. मैं यहां इसीलिए तो आ पाया क्योंकि यह वस्त्र यहां मुझे लाए हैं. इसलिए जिसके कारण भीतर आया उसे भोजन नहीं कराना तो अनुचित होगा.




राजा समझदार था, उसने हाथ जोड़ लिए. फकीर ने कहा मैं तो पहले भी आया था लेकिन जिन वस्तुओं के साथ में आया था, उसमें मुझे भीतर नहीं आने दिया गया. इसका अर्थ स्पष्ट है कि मुझे वस्त्रों के कारण ही प्रवेश दिया गया है. राजा ने अनेक प्रकार से फकीर से क्षमा मांगी और उन्हें यकीन दिलाया कि आगे से कभी ऐसा नहीं होगा!

पता नहीं यह किस राज्य की कहानी है. यह भी नहीं पता कि किस राजा की कहानी है. लेकिन इतना तो अवश्य ही कहा जा सकता है कि यह हम सब की कहानी है. हम वस्त्रों से ही तो पहचाने जाते हैं. अपने पदों से पहचाने जाते हैं. उन चीज़ों से पहचाने जाते हैं, जिनका अगले ही पल भरोसा नहीं है. लेकिन हमने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि हम अंततः क्या हैं? हमारी मूल पहचान क्या है? मूल पहचान भीतर है. लेकिन हमें भीतर जाते हुए डर लगता है. हमें हर चीज से डर लगता है जो हमसे सवाल करती है. इसीलिए हम अपनी चेतना, अपनी आत्मा और अंतर्मन को निरंतर गहराइयों में अकेला छोड़ दे जाते हैं. हम अकेले दौड़ते रहते हैं उन चीजों के पीछे जो हम ही ने बनाई है लेकिन उन्हें अपने ही विरुद्ध खड़ा कर लिया है.
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किसी आदमी से मिल कर देखिए. वह किन चीजों में डूबा है. घंटों बैठे रहिए उसके पास. वह क्या बातें करेगा आपसे? उसने कितना अर्जित कर लिया? उसने कितने ही लोगों का अभिमान चूर चूर कर दिया? उसने कितनी ही बड़ी संपदा हासिल कर ली जो उसके बाप-दादा भी हासिल न कर सके थे! लेकिन उसके पास इसका उत्तर नहीं है कि उसकी पहचान क्या है? वह स्वयं क्या है? उस लबादे के पीछे, उस मुखौटे के पीछे उसका असली रंग क्या है? ‌ ‌

क्या मनुष्य के होने का अर्थ केवल उसकी व्यवसायिक पहचान है? उसकी नौकरी और प्रतिष्ठा के अतिरिक्त वह कुछ नहीं है! हां, यह एकदम सच मालूम होता है. हम केवल और केवल कुछ बनने के लिए ही 24 घंटे खटते रहते हैं. स्वयं को ऐसी भट्टी में जलाए रखते हैं, जिससे हमारा और हमारे अंतर्मन का कभी मिलना न हो सके. क्योंकि अगर कहीं अंतर्मन मिल गया, तो सवाल करेगा, कौन से काम में जुटे हो तुम! क्या कर रहे हो तुम? किसे तुमने अपना काम समझ लिया है.


ऐसे प्रश्नों से अंतरात्मा हमें बेचैन कर देती है. इसलिए हम उस पर पर्दे डालते रहते हैं. महत्वाकांक्षा के पर्दे. लालसा, धन और पदों के पर्दे. कुछ हो जाने को हमने इतना अधिक महत्वपूर्ण मान लिया है कि बिना उसके हम मनुष्य को मनुष्य मानने से इनकार कर देते हैं.


हम जो कुछ स्वयं करते हैं उसके अतिरिक्त उन सभी चीजों को खराब मानते हैं जो दूसरे कर रहे हैं. दूसरों की चीजों में दोष ढूंढते हुए हम इस खुशफहमी में रहते हैं कि हम कर ही क्या सकते हैं? हम जो कुछ कर रहे हैं, वह सही है! दुनिया इस भ्रम से ही ग़लत बनती है. हम अपने दायित्व से इसीलिए पीछे हटते हैं, क्योंकि हमें उन चीज़ों का गहरा लालच है, जिसके पीछे दुनिया पागल है. और हम इस पागलपन में कभी नहीं हारना चाहते! इसलिए केवल पद प्रतिष्ठा और दौलत के नशे के पीछे दौड़ते रहते हैं, जो निश्चित रूप से हम से कम मूल्यवान है. जो निश्चित रूप से किसी भी रिश्ते में किए गए निवेश के मुकाबले कमतर है. हम जीवन की ओर नहीं देख रहे हैं. उसकी गुणवत्ता की ओर नहीं देख रहे हैं. हमने जीवन मूल्य को छोड़ दिया है और अब केवल मूल्य की ओर दौड़ रहे हैं. हमें जीवन की दृष्टि और उसकी समझ पर बहुत ठंडे दिमाग से सोचने और फैसले लेने की जरूरत है. उसके बिना जिंदगी के तनाव पर बात तो की जा सकती है, लेकिन वह अंतर्मन से जाएगा नहीं. सबसे पहले हमेंं खुद को पहचानना होगा.

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
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First published: May 15, 2020, 7:09 AM IST
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