#जीवन संवाद : अपना रंग सहेजना!

#जीवन संवाद : अपना रंग सहेजना!
जीवन संवाद

#JeevanSamvad: हमारी सबसे बड़ी दुविधा यही है. हम दूसरे जैसी कामयाबी चाहते हैं. व्यवहार, अदा, यहां तक कि रंग भी उसके जैसा ही चाहते हैं. अपने गुणों और सुखों को अनदेखा करते हुए दूसरों जैसा होने की लालसा भीतर ही भीतर हमें बेचैन करती रहती है.

  • Share this:
घने जंगल के बीच छोटे से बगीचे में आसमान की ओर बढ़ते देवदार के पास छोटे-छोटे अनेक पेड़ थे. झाड़ियां थी, गुलाब, चमेली, सरीखे खुशबूदार पौधे भी थे. गुलाब के पौधे ने एक शाम देवदार से पूछा मैं आपके जैसे ऊंचा क्यों नहीं. मेरा भी मन करता है, आसमान से बात करने का. दूर तक देखने-सुनने का. मेरी जिंदगी तो बस नीचे-नीचे ही सिमट गई.

उस ऊंचे वृक्ष ने बहुत गरिमा, प्रेम और स्नेह से गुलाब से कहा, अरे! यह क्या बात है. मैं देखता हूं संसार तुम्हारी खुशबू के प्रेम में डूबा हुआ है. तुम प्रेम की अभिव्यक्ति का सरल, सरस और सहज उदाहरण हो. हर कोई तुम्हें पाना चाहता है. तुम बहुत से लोगों की अभिलाषा हो और उनकी अभिलाषाओं की पूर्ति का माध्यम भी. प्रेम को कितने गहरे तुमने बैठा लिया है. तुम्हारी खुशबू लोगों का मन पवित्र करने के साथ उनके कष्ट को कम करने के लिए भी उपयोगी है.

मैं तो ऊपर उठते हुए अकेला होना चाहता हूं. चाहकर भी तुम लोगों के साथ वैसे नहीं रह पाता जैसा मेरा मन करता है. देवदार ने गुलाब को प्रेम से समझाया!




गुलाब को कितना समझ में आया यह कहना थोड़ा मुश्किल है. लेकिन हमें इस बात को तो समझना होगा कि हम तुलना के संसार में बहुत उलझे हुए हैं. उलझते ही जा रहे हैं. कोई अपने जैसा नहीं होना चाहता जबकि सबसे बड़ी खूबसूरती यही है. हम सब दूसरे के जैसे होने की चाहत में अपना रंग खोते जा रहे हैं!
हमारी सबसे बड़ी दुविधा यही है. हम दूसरे जैसी कामयाबी चाहते हैं. व्यवहार, अदा, यहां तक कि रंग भी उसके जैसा ही चाहते हैं. अपने गुणों और सुखों को अनदेखा करते हुए दूसरों जैसा होने की लालसा भीतर ही भीतर हमें बेचैन करती रहती है.


'जीवन संवाद' को कोरोना वायरस के संक्रमण के बाद से इस तरह के ई-मेल और संदेश बहुत अधिक मिल रहे हैं जिसमें अपने ही नजदीकी लोगों के प्रति बहुत गहरी तुलना समाई हुई है. एक दूसरे से आगे निकलने की चाहत हमें सुख को आसानी से सहने का आनंद नहीं देते. सुख सहना भी एक कला है! ठीक उसी तरह जैसे हमें दुख को बर्दाश्त करना आना चाहिए. पूरी दुनिया को इस बात की अनुमति नहीं होनी चाहिए कि आपको जब और जैसे चाहे दुखी करती रहे. अपने मन और विचारों पर हमारा सजग पहरा होना जरूरी है.

तुलना के बीज अक्सर अपनों द्वारा ही डाले जाते हैं. वही लोग हमारे मन में तुलना के बीज बोने में सफल होते हैं जो हमारे पास होते हैं. बहुत नजदीक होते हैं. पिछले दिनों हमें चंडीगढ़ से नीना सिंह ने लिखा कि वह अपने परिवार के साथ सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर रही थीं. सब कुछ शानदार चल रहा था. उनके पति के फर्नीचर के शोरूम हैं. बच्चे शानदार स्कूलों में शिक्षित हो रहे हैं. किसी भी प्रकार की कमी नहीं है. वह स्वयं भी अमेरिका में शिक्षित है. अपने घरेलू व्यवसाय में समय-समय पर सहयोग देती रहती है. बच्चों के लालन पोषण के साथ वह सामाजिक कार्यों में गहरी रुचि रखती है.

सब कुछ ठीक ही था कि एक दिन उनके दूर के मामा उनके यहां आए. उन्होंने अपनी बेटी से तुलना करते हुए नीना को समझाया कि उसकी पूरी शिक्षा व्यर्थ हो गई. क्योंकि उसने उसे किसी ऐसे काम में नहीं लगाया जिससे धन की प्राप्ति हो. वह नीना को समझाने में सफल रहे कि बच्चों की परवरिश इतना जरूरी काम नहीं यह तो कोई भी कर लेता है. इसके लिए अमेरिका से शिक्षा की क्या जरूरत थी! ‌‌ नीना के जीवन में यह पल कुछ ऐसे आया जैसे कोई शांत झील में कंकड़ फेंक दे. मन में उथल-पुथल मच गई. तुरंत ख्याल आने लगे कि जीवन व्यर्थ ही बीत गया. इसे देखो-उसे देखो! लोग कहां से कहां पहुंच गए और हम वहीं रह गए.

इसे कहते हैं मन के रंग की चोरी. कोई हमारा रंग ही चुरा ले गया. दे गया बदले में असंतोष और उथल-पुथल. मैंने नीना को सुझाव दिया कि अच्छा हुआ मामा जी यह कर गए. अगर मन इतना कमजोर है कि वह दूसरे के समझाने से अपने को बेचैन कर लेता है. तो अच्छा है उसे एक बार हो जाने दें. जिससे उसकी ठीक से मरम्मत हो पाए.


हां यह जरूर है कि मन का डॉक्टर सुलझा हुआ होना चाहिए. उसकी जीवन में आस्था होनी चाहिए. जीवन इसलिए नहीं हुआ है कि उसे बाजार के नियमों के हिसाब से जिया जाए. इसलिए भी नहीं कि जैसा सब करते हैं वैसा हम भी करें. इसलिए भी नहीं कि मैंने एक महान शिक्षा हासिल की है. स्कूल/ कॉलेज की डिग्रियों से अगर सही समय पर मुक्ति न मिल पाए तो यह जीवन भर का बंधन बन जाती हैं. हम उनसे ही चिपके रहते हैं और सारा कुछ उनके भीतर ही तलाशते रहते हैं.

इसलिए बहुत जरूरी है कि हम अपने मन को मजबूत बनाएं. अपने रंग को पक्का बनाएं, गहरा बनाएं, अपने होने को सबसे महत्वपूर्ण जाने. जीवन की आस्था और प्रेम इससे ही गहरे होते हैं.

शुभकामनाओं सहित...

दयाशंकर मिश्र
संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.
(https://twitter.com/dayashankarmi )(https://www.facebook.com/dayashankar.mishra.54)
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading