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#जीवनसंवाद : फैसले से पहले!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: January 3, 2020, 3:25 PM IST
#जीवनसंवाद : फैसले से पहले!
#जीवनसंवाद

Jeevan Samvad: सुविधा बढ़ने से बहुत कुछ नहीं बदलता. असली बदलाव भीतर से शुरू होता है. हम अपने भीतर से ही निरंतर दूर हो रहे हैं. हमारी ऊर्जा सोशल मीडिया, तकनीक और तुनक मिजाजी में उलझती जा रही है.

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  • Last Updated: January 3, 2020, 3:25 PM IST
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थोड़ा मुश्किल है, आराम से सोचना. बिना किसी भागमभाग के सुकून से सोचना. एकांत में बैठकर सोचना. असल में अब कोई ऐसी स्थिति बची ही नहीं. पिछली बार कब आपने अपना फोन बंद किया था? कब उससे दूर जाकर बैठे थे? कब आप अकेले थे? अपने उस मन के पास थे, जिसे अंतर्मन कहते हैं? वहां तक पहुंचे बिना जो फैसले लिए जाते हैं, उनको आपका फैसला नहीं कहा जा सकता है. इसलिए बहुत जरूरी है कि जब हम कोई बड़ा फैसला करने की ओर बढ़ रहे हों तो खुद को जानने-समझने में ईमानदारी रखी जाए.

हम दूसरों के बारे में बात करते समय बहुत अधिक आलोचनात्मक रवैया रखते हैं. उनकी हर चीज को परखते हैं, जैसे ही बात खुद की आती है, हम रक्षात्मक होने लगते हैं. तर्क गढ़ने लगते हैं. दूसरों के मुकाबले खुद को बहुत अधिक नजाकत के साथ अपने ही सामने पेश करते हैं.
हम एक ऐसे यथास्थितिवादी व्यक्ति के रूप में खुद को स्थापित करते जाते हैं जिसमें नई कोंपले फूटने की गुंजाइश कम से कम रहती है.

हमारे एक मित्र ने कहा कि वह अपने काम से खुश नहीं है. वह जैसा काम करना चाहते हैं, पूरी कोशिश के बाद भी नहीं कर पा रहे हैं. उन्हें क्या करना चाहिए. मैंने उनसे केवल इतना कहा है कि इस शिकायत के अलावा पांच साल से वह कुछ नया तो नहीं कर रहे हैं. वह अपनी शिकायत के साथ इतने उलझे हुए हैं कि किसी नई दिशा की ओर कदम नहीं बढ़ा पा रहे हैं. वह अकेले ऐसे नहीं है. हममें से ज्यादातर लोग नौकरी, बिजनेस, रिलेशनशिप, शादी जैसे निजी मामले में भी अनिर्णय का शिकार होते जा रहे हैं. हम चीजों को टालते जाते हैं. जब तक उनकी आखिरी समय सीमा खत्म ना हो जाए. खुद को कमजोर समझते रहना, चीजों के बारे में फैसला नहीं करना. इसका आर्थिक परिस्थितियों से बहुत कम संबंध होता है. उनका अधिकतर संबंध हमारे सोचने समझने के तरीके और निर्णय करने की प्रक्रिया से होता है.



किसी जमाने में हम बैलगाड़ी से चलते थे. उसके बाद लूना, मोपेड से चलने लगे. उसके बाद हमारी गति तो कई गुना बढ़ गई, लेकिन मानसिक रूप से हमारी सोच समझ का तरीका, दायरा अभी भी कुछ-कुछ बैलगाड़ी के जमाने का ही है.


सुविधा बढ़ने से बहुत कुछ नहीं बदलता. असली बदलाव भीतर से शुरू होता है. हम अपने भीतर से ही निरंतर दूर हो रहे हैं. हमारी ऊर्जा सोशल मीडिया, तकनीक और तुनक मिजाजी में उलझती जा रही है. मोबाइल पर बीतने वाले अनियंत्रित समय ने हमारे व्यवहार को इतना अधिक बदल दिया है जो हमारी कल्पना से परे हो गया है. हम कुछ सोच समझ ही नहीं रहे. बस उस दिशा में दौड़ते जा रहे हैं जिस तरफ सब लोग भाग रहे हैं. इसी काम को करने का अब तरीका यही हो गया है कि दूसरे भी कर रहे हैं!
ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हम स्वयं से दूर हो गए हैं. जब हम खुद से दूर हो जाएंगे और मानसिक रूप से उन चीजों में उलझे रहेंगे जिनका असल में कोई महत्व नहीं है, तो हम अपने आप से निकट नहीं हो सकते. जो स्वयं के निकट नहीं है वह अपने बारे में कभी वह फैसला नहीं ले सकता जो उसे लेना चाहिए. वह तो सारे फैसले ऐसे ही करेगा जो दूसरे कर रहे हैं. एक छोटी सी फिल्म है, 'एक रुका हुआ फैसला'. 1986 में यह फिल्म आई थी. दरअसल, बासु चटर्जी ने कोर्ट रूम ड्रामा बनाया था. पंकज कपूर, दीपक केजरीवाल, अनु कपूर समेत तमाम प्रतिभाशाली कलाकार इसमें थे.थोड़ा समय निकालकर इस फिल्म को देखिए. फैसले लेने के बारे में इतनी स्पष्टता और सरलता से समझाने वाली दूसरी कोई फिल्म/किताब नहीं मिली. यह बहुत सरल तरीके से बताती है कि हम कई बार कैसी-कैसी चीजों में उलझे रहते हैं. जाने किन खयालों से अपनी राय बनाते रहते हैं. इसलिए, फैसलों को टालिए मत. क्योंकि उम्र सीमित है. इससे भी अधिक सीमित है कुछ कर गुजरने की सही उम्र. अपने फैसलों के लिए अपने मन को तैयार कीजिए, दुनिया तो कब से आपके इंतजार में बैठी है. अपने पर भरोसा तभी होगा जब आप अब स्वयं के निकट होंगे. इस बात को परखिए कि आप स्वयं के कितने निकट हैं.

 

पता : दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: December 26, 2019, 2:57 PM IST
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