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#जीवन संवाद : आप मुझे नहीं जानते!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: November 13, 2019, 9:16 AM IST
#जीवन संवाद : आप मुझे नहीं जानते!
#जीवन संवाद

दूसरों केे मोहल्ले का छोड़िए, अपनी-अपनी कॉलोनी में ही हमें ऐसे लोग मिलते रहते हैं जो इस बात से परेशान दिखते हैं कि उन्हेंं पहचाना नहीं जा रहा. उन्हें कौन समझाए कि उनके महान कार्यों की अब तक किसी को जानकारी नहीं मिल सकी है.

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  • Last Updated: November 13, 2019, 9:16 AM IST
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अपने कुछ होने का भाव हमारे अंदर इतना गहरा है कि जरा-सी ठेस लगते ही मन में उथल-पुथल मच जाती है. उसे इतना भी नहीं पता कि मैं कौन हूं. घरों की चौकीदारी करने वाले सुरक्षाकर्मी, एयरपोर्ट पर रात दिन सुरक्षा जांच में जुटे हमारे ही लोगों को मन की इस 'उथल-पुथल' से होने वाली बेचैनी का सामना करना पड़ता है. अगर कोई किसी को नहीं जानता तो इसमें किसका दोष है! उसका जो नहीं जानता, उसका जिसे नहीं जाना जा रहा?

असल में हम जितने 'छोटे' होते हैं, हमारा अहंकार उतना ही बड़ा होता है. जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, अहंकार छोटा होता जाता है. इस बड़े-छोटे का उम्र से कोई रिश्ता नहीं है. यह आपके अंतर्मन की यात्रा और उसके फलने-फूलने के तौर-तरीकों पर निर्भर करता है.
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल भारत मेंं अपनी तरह का अनूठा मेला है. इसमें दुनिया भर से मशहूर लोग जुटते हैं. नोबेल पुरस्कार विजेताओं से लेकर राजनेता तक जो जितना बड़ा होता है, यहां वह उतनी ही विनम्रता से पेश आता है. इसके उलट, छोटे-छोटे लोग चाल में ठसक लिए टहलते रहते हैं. वहांं के अनुभव बताते हैं कि अगर आपको एहसास नहीं है कि आप 'बड़े' नहीं हो रहे हैं, तो आप निरंतर छोटे होते जाएंगे. अपनेेेे बड़े होने की पहली झलक ही यह है कि अभी कितना कुछ बाकी है, सीखने और हासिल करने करने के लिए.


दूसरों केे मोहल्ले का छोड़िए, अपनी-अपनी कॉलोनी में ही हमें ऐसे लोग मिलते रहते हैं जो इस बात से परेशान दिखते हैं कि उन्हेंं पहचाना नहीं जा रहा. उन्हें कौन समझाए कि उनके महान कार्यों की अब तक किसी को जानकारी नहीं मिल सकी है.

अपने को दूसरों सेे श्रेष्ठ समझना, उतना ही अनुुुुचित है, जैसे दूसरे से स्वयं को कमतर समझना. जीवन में संतुलन का भाव कैसा हो इसका सबसेे बड़ा उदाहरण‌ स्वयं पर नियंत्रण से समझा जा सकता है. हमारा मन अपने आप में शोध का विषय, ऊर्जा का भंडार है. जितना अधिक स्वयं को जानेंगे,  दूसरों को जानना उतना ही सरल होता जाएगा.
अपनेे ही मन से हम कई बार बहुत अधिक अनजान रहते हैं. इतने अधिक कि उसके भीतर क्या 'पक' रहा है, इस बात की हमें खबर नहीं होती. इसलिए, सारी व्यस्तता के बाद भी सप्ताह में एक दिन, अगर यह भी संभव न हो तो महीने में एक दिन ऐसा जरूर निकाला जाए, जब अपने ही मन का पूरा हिसाब-किताब किया जाए. अपने मन को जानना, और समझना दुनिया के दूसरे किसी भी काम के मुकाबले सबसे जरूरी काम है. इसलिए जितना संभव हो इससे मिलते जुलते रहें.

पता: दयाशंकर मिश्र (जीवन संवाद)
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First published: November 11, 2019, 12:25 PM IST
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