#जीवनसंवाद: सोच की नाव!

#जीवन संवाद: सोच की नाव!

#जीवन संवाद: सोच की नाव!

Jeevan Samvad: हम सब सोच विचार के मामले में एक जैसे होते जा रहे हैं. एकरसता से नीरसता उपजती है. फूल भले ही गुलाब के क्यों न हों, केवल गुलाब के होंगे तो आपका मन ऊबने ही लगेगा!

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सोचना, बहुत सरल प्रतीत होता है लेकिन असल में बहुत मुश्किल काम है. बहुत से पेंच हैं, इसमें. हमारे मन का अनजाने में प्रशिक्षण होता रहता है, सोच की नाव तैयार होती रहती है. यह कितनी मजबूत, सुरक्षित है, सब मन पर निर्भर है. जिंदगी के समंदर में सोच की नाव सबसे बड़ा सहारा है. सोचने का तरीका घोर नकलची, अवैज्ञानिक और वैज्ञानिक हो सकता है. यह सब कुछ इस पर निर्भर करता है सोचने के लिए किस तरह के बीज मन की जमीन पर फेंके गए थे.

सोचने के मामले में हम नकलची हैं. नकल बंदरों का बुनियादी गुण है, हम भी बंदर ही थे! बड़े से बड़े और हमारी दृष्टि में सफल लोग सोच के मामले में लकीर के फ़कीर होते हैं! मौलिकता एक दुर्लभ गुण है जो प्रकृति के पास तो बहुत है लेकिन बंदर के वंशजों के पास कम है.

इसीलिए, हम सब सोच विचार के मामले में एक जैसे होते जा रहे हैं. एकरसता से नीरसता उपजती है. फूल भले ही गुलाब के क्यों न हों, केवल गुलाब के होंगे तो आपका मन ऊबने ही लगेगा! 'जीवन संवाद' में हमारा जोर सबसे अधिक पगडंडियों पर होता है. रास्ते तो बंद हो सकते हैं. अक्सर हो जाया करते हैं! अक्सर प्रश्न आते हैं कि सारे रास्ते बंद हो गए, अब क्या किया जाए. कोरोना में तो यह और भी मुश्किल हो चला है! सुझाव एकदम स्पष्ट है, रास्ते बंद हो सकते हैं लेकिन हमें उनसे अधिक पगडंडियों पर भरोसा होना चाहिए.

लाखों-करोड़ों लोग अपने गांव केवल इसलिए लौट कर नहीं गए क्योंकि गांव में उनको अधिक सुरक्षा का भरोसा था. बल्कि इसलिए गए क्योंकि उनमें अभी पगडंडियोंं के प्रति भरोसा है. हम जितना ज्यादा हासिल करते जाते हैं, उतने ही अधिक कमजोर होते जाते हैं.


यह कमजोरी हमें भीतर से तोड़ती जाती है. क्योंकि हमारी शक्ति रिश्तों और मनुष्यों की जगह वस्तुओं (प्रोडक्ट्स ) में होती जाती है! हमारी सोच इतनी अधिक निजी होती जा रही हैै कि हम सब तरफ से अपनी आंखें चुराने लगे हैं. इसके बाद सोच कहां जाकर रुकेगी, इसे समझना बहुुत मुश्किल नहीं. हम अकेले, रूखे, नाराज और दुखी होते जा रहे हैं. हमारा नजरिया दुख ओढ़ने और बिछाने वाला हो गया है.


छोटी सी कहानी कहता हूं, संभव है सोच और नजरिए को अधिक सरलता से समझना संभव हो जाए!

एक गांव के बाहर बुजुर्ग बैठे हुए थे. ठीक उस जगह जहां से कोई गांव में प्रवेश करता है. तभी एक घुड़सवार आकर वहां रुका. उसने पूछा इस गांव के लोग कैसे हैं. बुजुर्ग ने कहा पहले यह कहो जहां से आ रहे हो वहां के लोग कैसे हैं. घुड़सवार ने कहा, यह कैसा प्रश्न है. बुजुर्ग ने कहा इसके बिना गांव में प्रवेश करना संभव नहीं. घुड़सवार ने कहा, उनकी बात मत पूछो. जहां से मैं आ रहा हूं वहां के लोग एकदम प्रेम के अधिकारी नहीं है.

ऐसे लोगों से किसी तरह पीछा छूटे इसीलिए ठिकाना तलाश में निकला हूं. बुजुर्ग ने कहा मैं तो बचपन से लेकर बूढ़ा हो गया इस गांव में. यहां के लोग तो और भी खराब हैं. इसके पहले कि कोई आ जाए तुम यहां से चले जाओ. घुड़सवार ने आगे की ओर प्रस्थान कर दिया!

थोड़ी देर में एक दूसरा घुड़सवार वहां आया. उसने भी वही प्रश्न किया. बुजुर्ग ने फिर वही प्रश्न दोहरा दिया. इस घुड़सवार ने भावुक होते हुए कहा, अब तक मैं उनके छूटने से दुखी हूं. कितने ही भले और भावुक लोग हैं. यह तो समय का फेर है कि मुझे उन्हें छोड़कर आना पड़ा. उनके जैसे भले लोग और कहीं मिलना मुश्किल है.

बुजुर्ग ने खड़े होकर उस घुड़सवार को आशीर्वाद दिया और कहा, गांव में तुम्हारा स्वागत है, यहां के लोग तुम्हारे गांव के लोगों जैसे ही भले हैं! उनके जैसा कोई दूसरा नहीं!  एक बच्चा इस घटना को देख रहा था. उसने बुजुर्ग से इसका अर्थ पूछा. उन्होंने बड़ी सरलता और आत्मीयता से कहा, जैसा भीतर वैसा बाहर! जो भला नहीं है भीतर से उसे बाहर कोई कैसे भला मिलेगा. हमारे सोचने का नजरिया सबसे महत्वपूर्ण है.


अगर आप मुझसे उन बुजुर्ग का नाम जानना चाहें, तो मैं कहूंगा उनका नाम 'जिंदगी' है! जिंदगी हमारे साथ उसी तरह पेश आती है, जैसी हम भी उससे आकांक्षा करते हैं. गहरी इच्छा रखते हैं. इसलिए अपने ही विचारों के प्रति सतर्क रहें. यह अनजाने में ही आपको तैयार कर रहे होते हैं.

संपर्क: ई-मेल: dayashankarmishra2015@gmail.com. आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

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