जीवन संवाद: कोरोना और शादी!

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#JeevanSamvad:अभी भी भारत में आने वाली शादियों के लिए बड़ी संख्या में रेल टिकट बुकिंग से लेकर शादी हॉल, खानपान की व्यवस्था देखकर कहीं नहीं लग रहा कि कोरोना का अस्तित्व बचा भी है!

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अमेरिका से आज खबर आई है कि वहां एक शादी में 55 लोग शामिल हुए. इनमें से कोई एक कोरोना पॉजिटिव था. उनसे 177 लोगों में संक्रमण फैला, जिसके कारण उन 7 लोगों की मौत हो गई, जो उस विवाह का हिस्सा नहीं थे. यह अमेरिका की बात है, इसलिए इस पर हर कहीं चर्चा हो रही है, लेकिन हमारे अपने देश में अब हालात कहीं अधिक खराब होने की तरफ बढ़ रहे हैं. भारत में शादी-ब्याह को लेकर जितनी अधिक भावुकता है, दुनिया के दूसरे देशों में ऐसा कम देखने/पढ़ने को मिलता है. इस बारे में हमारे ऐसे पाठक अधिक बता सकते हैं, जिनको दुनिया की यात्रा का अनुभव है. दिल्ली से लेकर मध्य प्रदेश तक मेरे खुद के अनुभव विचित्रतापूर्ण, विविधतापूर्ण और सबसे बढ़कर हैरान, परेशान करने वाले रहे हैं. उम्र में छोटे और बड़े दोनों को ही कोरोना की गंभीरता समझा पाना बहुत मुश्किल है. सबको यही लग रहा है कि संकट उन पर नहीं है. उनको कैसे कोरोना हो सकता है! यह सनक, भावुकता जीवन पर भारी पड़ रही है. जिन पर हम आगे विस्तार से बातचीत करेंगे.


हम दिल्ली में शादी और निजी उत्सवों में 200 लोगों की अनुमति का परिणाम देख चुके हैं. दिल्ली में कोरोना के कारण हर दिन बड़ी संख्या में लोग अपनी जान गंवा रहे हैं. यह विशुद्ध रूप से समाज की लापरवाही से हो रही मौतें हैं. कैसा समाज है, जो हर मौत पर संवेदनशील होने की जगह रस्म अदायगी में जुटा हुआ है. दिल्ली से बाहर तो हालत और अधिक खराब होते जाएंगे, क्योंकि दिल्ली से हम जैसे-जैसे दूर निकलते जा हैं, कोरोना वायरस हमारी चिंता से वैसे वैसे बाहर होता जाता है.

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इन दिनों शादी-ब्याह के निमंत्रण हम सभी को मिल रहे हैं, लेकिन सबसे खतरनाक बात यह है कि कोई इस पर बात नहीं करना चाहता. मेरी जिन लोगों से भी बात हुई है इस तरह के निमंत्रण को लेकर, उन सभी में लोगों का जोर कार्यक्रम में आने को लेकर अधिक है, न कि सेहत को लेकर.

मास्क को लेकर भारतीय समाज का रवैया हमारी वैज्ञानिक समझ को स्पष्टता से रेखांकित करने वाला है. दिल्ली से जैसे जैसे दूर होते जाते हैं, चेहरे से मास्क की दूरी बढ़ती चली जाती है. मुझे स्वयं मास्क के प्रति आग्रह के कारण कई जगह अपमानित होना पड़ा, लेकिन उसके बाद भी मैंने अपनी ओर से आग्रह नहीं छोड़ा है. आप भी मत छोड़िएगा! माता-पिता, रिश्तेदार संभव है, कुछ समय के लिए नाराज रहें, लेकिन उनकी नाराजगी से कहीं अधिक जरूरी है, उनका स्वस्थ जीवन! हमें उनके जीवन की रक्षा करनी चाहिए.

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मास्क और कोरोना को लेकर सबसे खतरनाक है, युवा मन की लापरवाही, साथ ही उत्सव, शादी-ब्याह में हिस्सेदारी के प्रति बुजुर्गों के पुराने आग्रह का कम न होना! जीवन के प्रति इस लापरवाही से हम अपनों की मदद नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें संकट में डाल रहे हैं! सामाजिकता से हम दूर नहीं जा सकते, लेकिन इसके लिए अपने और दूसरों के जीवन को दांव पर लगाना जीवन के प्रति आस्था की कमी बताने वाला है!

अभी भी भारत में आने वाली शादियों के लिए बड़ी संख्या में रेल टिकट बुकिंग से लेकर शादी हॉल, खानपान की व्यवस्था देखकर कहीं नहीं लग रहा कि कोरोना का अस्तित्व बचा भी है! यह एक तरह का सामाजिक मनोविकार है, जिसमें हम देख करके भी संकट की ओर से आंखें मूंदे हुए हैं. ऐसा करने से संकट घटता नहीं है, बढ़ता ही चला जाता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि युवा इस मामले में विरोध सह करके भी अपने लोगों की फिक्र करेंगे और रस्म-रिवाज की जगह मनुष्य के जीवन को महत्व देंगे.

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