#जीवनसंवाद: प्रसन्नता के मुखौटे!

जीवन संवाद

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#JeevanSamvad: हमने बाहरी चीज़ों पर सुख की निर्भरता इतनी अधिक बढ़ा दी है कि अगर वह नहीं है तो भी हमें उसे दिखाना है. ‌जो नहीं है, उसको दिखाने का काम ही मुखौटा करता है.

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खुद को सुखी और प्रसन्न रखना अच्छी बात है, लेकिन भीतर से ऐसा नहीं होते हुए केवल वैसा प्रदर्शित करना कुछ ऐसा है जैसे एक मकान बाहर से चमकदार है, लेकिन भीतर से कमजोर और खोखला होता जा रहा है. बाहर तो मकान में जमकर रंग-रोगन किया गया है, लेकिन भीतर उसे लगातार जर्जर होने दिया जा रहा है.


दीपावली, निकट है. इसलिए, मकान का उदाहरण अधिक प्रासंगिक है. हमने बाहरी चीज़ों पर सुख की निर्भरता इतनी अधिक बढ़ा दी है कि अगर वह नहीं हैं, तो भी हमें उन्हें दिखाना है. ‌जो नहीं है उसको दिखाने का काम ही मुखौटा करता है.

असुविधा, संकट और दुख अलग-अलग होने के साथ ही हमारे जीवन के निकट संबंधी हैं. इनसे ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए कि मानो यह अपरिचित हों. इनका सामना करने में शर्मिंदगी का भाव अपने मन को कमजोर बनाने सरीखा है.
एक बार शहर के एक बड़े उद्योगपति मनोचिकित्सक के पास पहुंचे. उन्होंने कहा, 'सबकुछ होने के बाद भी मैं सुखी महसूस नहीं कर पाता. हमेशा डर बना रहता है, कहीं सबकुछ खत्म ना हो जाए'. मनोचिकित्सक ने उनसे कहा, 'क्या आप कभी दुखी दिखते हैं. किसी से कह पाते हैं कि आप दुखी हैं'. उन्होंने कहा, ' नहीं, समाज में मेरी बहुत प्रतिष्ठा है. मुझे हर हाल में खुद को खुश और सबसे आगे दिखाना होता है'. बुजुर्ग मनोचिकित्सक ने जवाब देते हुए कहा, 'यह सब बाहरी आवरण है. मन में काई जमी रहेगी, तो बाहर से उस पर प्रसन्नता के फूल खिलाने का कोई अर्थ नहीं.'

इस बात को समझना जरूरी है कि भीतर से हम कैसा महसूस करते हैं. दुनिया की सारी प्रतिष्ठा और कामयाबी मनुष्य के जीवन से बढ़कर नहीं है. जैसे ही हम किसी भी चीज को जीवन से बढ़कर मान लेते हैं, हमारा जीवन दोयम दर्जे का होता चला जाता है.

इसलिए हमें सबसे पहले असफलता को स्वीकार करने की ओर बढ़ना होगा. रेलगाड़ी के गुजर जाने के बाद प्लेटफार्म उसकी याद में बैठे नहीं रहते. उनको तो हर क्षण नई रेलगाड़ी का स्वागत करने के लिए तैयार रहना होता है. हमें भी जीवन में इसी तरह की सतत तैयारी रखनी होती है. अपने स्वभाव को हम जितना सहज और सामान्य रहने देंगे, मन पर उतनी ही कम मैल जमेगी.



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जापान में इन दिनों एक सुंदर प्रयोग हो रहा है. विज्ञान और तकनीक से वहां के समाज की निकटता इतनी अधिक हो गई कि लोग अपनी भावनाएं प्रकट करना भूल गए. इसलिए वहां रोने का अभ्यास कराया जा रहा है. भावनाओं को प्रकट करने पर जोर दिया जा रहा है. अच्छी बात है कि हमारा समाज अभी उस स्थिति में नहीं पहुंचा है, लेकिन हम बस उसी ओर जा रहे हैं, इसलिए स्वभाव के मुखौटे के प्रति सावधान रहिए. सुखी हैं तो कहिए और अगर किसी कारण से मन उदास है. उस पर दुखी छाया पड़ रही है, तो भी कहने से पीछे मत हटिए.

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