#जीवनसंवाद: संकट के हिस्सेदार!

जीवन संवाद

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#JeevanSamvad: संकोच और असुविधा के सारे बादल हमारे बनाए हुए होते हैं. अगर मन में सच्चा प्रेम है, तो बादलों को उड़ते हुए देर नहीं लगती, इसलिए अपनी बात को खुलकर कहने का सलीका हमें सीखना ही चाहिए.

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एक ऐसे समय में जब हम आर्थिक और मानसिक रूप से संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं, यह बहुत जरूरी है कि सभी विषयों को लेकर परिवार में संवाद बना रहे. आर्थिक संकट तब बहुत अधिक तनाव का कारण बन जाता है, जब उस पर बात मन में ही घुमड़ती रहे. हम जब संकट से अकेले जूझने का फैसला कर लेते हैं, तो जरूरी नहीं कि हमेशा यह फैसला सही साबित हो, बल्कि अक्सर यह देखा गया है कि ऐसे में स्वयं को मानसिक और भावनात्मक रूप से हम कमजोर करते जाते हैं. जिंदगी में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसे साझा न किया जा सके. बस हमारे मन के भ्रम ऐसे होते हैं, जो तरह-तरह की दीवारें खड़ी कर देते हैं. समाज का ताना-बाना कुछ ऐसा है कि पुरुष आर्थिक संकट को साझा करने की मानसिक बाधा में हैं. इससे आर्थिक के साथ मानसिक संकट गहराता जा रहा है. ऐसा कोई संकट नहीं, जिस पर बात न की जा सके. बस अपने दिल-दिमाग के दरवाजे खुले रखने होंगे.


लॉकडाउन की शुरुआत से लेकर अब तक 'जीवन संवाद' को इस बारे में ईमेल और संदेश मिलते रहे हैं. हमने एक प्रयोग के तौर पर आर्थिक रूप से परेशानी से जूझ रहे कुछ व्यक्तियों (पुरुषों) से आग्रह किया कि वह इस संकट को अपने घर पर जीवनसाथी से साझा करने में संकोच करने से बचें. उन्हें इस बात के लिए तैयार किया कि आर्थिक रूप से परेशानी को परिवार से साझा करने से संकट को संभालने में मदद मिलेगी.

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इंदौर में आईटी कंपनी में इंजीनियर राजेश दुबे कुछ संकोच के साथ इसके लिए तैयार हुए. उन्होंने वेतन कटौती से आय को छुपाने के लिए क्रेडिट कार्ड ले लिए, जिससे खर्चे में कटौती न करनी पड़े. रहन-सहन में कोई अंतर न पड़े. उन्हें उम्मीद थी कि कटा हुआ वेतन वापस मिल जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कंपनी ने वेतन कटौती वापस नहीं ली. इसका परिणाम यह हुआ कि उनके क्रेडिट कार्ड का बिल बढ़ता ही गया. उस पर ₹2,00,000 से अधिक का ब्याज हो गया. उनका तनाव इतना अधिक बढ़़ गया कि अच्छा भला स्वस्थ व्यक्ति ब्रेन हैमरेज के निकट पहुंच गया.

इस कॉलम को पढ़ने वाले सभी व्यक्तियों से मैं अनुरोध करना चाहता हूं कि संवाद को विषयों से बांधकर न देखें. सुजीत सरकार की 'विकी डोनर' संवाद के विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण फिल्म है. यह हमें बताती है कि किसी भी विषय पर किस तरह से बात की जा सकती है. संकोच और असुविधा के सारे बादल हमारे बनाए हुए होते हैं. अगर मन में सच्चा प्रेम है, तो बादलों को उड़ते हुए देर नहीं लगती, इसलिए अपनी बात को खुलकर कहने का सलीका हमें सीखना ही चाहिए.

हम जब तक अपने परिवार और अपनों को अपने संकट का हिस्सेदार नहीं बनाएंगे, मुश्किल और संकट से निकलने की हमारी क्षमता घटती ही जाएगी. इसलिए इस संवाद को अनिवार्य करना होगा, जिससे जीवन बचाया जा सके.



आप अपने मन की बात फेसबुक और ट्विटर पर भी साझा कर सकते हैं. ई-मेल पर साझा किए गए प्रश्नों पर संवाद किया जाता है.

ईमेल: dayashankarmishra2015@gmail.com

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