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#जीवनसंवाद: रिश्तों का सुलझना!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 8:06 AM IST
#जीवनसंवाद: रिश्तों का सुलझना!
एक छोटी सी कहानी रिश्तों को सुलझने की तरकीब पर.

दुख की जड़ को जानने में वक्त देने, उसके सुलझने में आस्था, जिंदगी के लिए 'नया' मोड़ हो सकती है.

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आइए, आज के संवाद की शुरुआत की जाए. कुछ दिन पहले मुझे एक संदेश मिला जिसमें कहा गया कि पति-पत्नी के बीच विवाद को सुलझाने के लिए पारिवारिक, सामाजिक सभी तरह के तरीके आजमाए गए, लेकिन कोई रास्ता नहीं निकल रहा था. इसी बीच एक दिन दंपति ने तय किया कि अब वह किसी के पास नहीं जाएंगे. उन्होंने तय किया कि वह एक हफ्ते तक एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे. केवल एक-दूसरे के बारे में अच्छा सोचेंगे! उन चीज़ों को याद करेंगे जिनकी कोमलता अब तक मन में बसी है. उन्हीं अनुभवों को दिल के करीब रखेंगे, जिनको रिश्ता टूटने के बाद भी वह अपने साथ रखना चाहेंगे.

Dear Zindagi
एक छोटी सी कहानी रिश्तों को सुलझने की तरकीब पर.


यह प्रयोग सफल रहा. उनके बहुत सारे मसले हल हो चुके हैं. उनकी जिंदगी काफी हद तक उनके अपने नियंत्रण में है.

बेहद विनम्रता, संकोच के साथ मैं साझा कर रहा हूं कि उनको यह सुझाव इस संवाद के पाठक विनम्र शर्मा ने दिया. उनका कहना है कि यह विचार 'डियर ज़िंदगी' या जीवन संवाद के एक लेख से उन्हें मिला था. आभार विनम्र! हम सबको जीवन में एक-दूसरे को सुझाव देते हुए बस इतना ही याद रखना है कि हमारी भाषा कैसी हो. जो हम कह रहे हैं, उस पर हमारा यकीन कितना है. हमारा यकीन ही चीजों को विचार से परिणाम में बदलने की कहानी है.

एक छोटी सी कहानी रिश्तों को सुलझाने की तरकीब पर. एक बार गौतम बुद्ध से किसी ने पूछा, वह अपने दुख को कैसे पकड़े. बुद्ध ने अपने किसी शिष्य से कहा, जंगल से कुछ पौधे ले आओ. खयाल रहे, अलग-अलग तरह के हों, एकदम छोटे, जड़ सहित हों. जैसा कहा गया था, वह वैसा करके ही जंगल से लौटा. अब बुद्ध ने प्रश्नकर्ता से कहा कि इनकी पहचान कीजिए. पहले वह पत्तों की ओर देखते रहे, फिर बोले पौधे छोटे हैं, इसलिए इनकी पहचान मुश्किल है.

महात्मा ने कहा इनकी जड़ों की ओर देखो, थोड़ी कोशिश करो. अब उसने जड़ों की ओर ध्यान लगाया. कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा, यह पौधा नीम का होना चाहिए, इसकी जड़ में बीज का आवरण अटका हुआ है. थोड़े प्रयास के बाद उनने सभी पौधों के सही-सही नाम बता दिए.

बुद्ध ने कहा जिस प्रकार हर पौधे का एक बीज होता है, उसी तरह हर दुख का भी बीज है. बिना बीज के न तो कोई पौधा उगता है न ही बिना कारण के दुख की उत्पत्ति होती है.
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बुद्ध की यह कहानी पुरानी है. हम न जाने कबसे सुनते हैं, लेकिन गुनना हमारे जीवन से जैसे बाहर हो गया. सुख और दुख ठीक उसी तरह हैं, जैसे धूप और छाया. यह जीवन की, दुनिया की सबसे काम की बात है, इसे उपदेश समझकर, कहकर इनका मज़ाक मत उड़ाइए. जीवन अवसर है, यात्रा है. स्नेह और आत्मीयता से इसे पूरा कीजिए. जब आप इससे परेशान होने लगें, तो उनकी ओर देखने का सहज 'उपचार' कीजिए जो आपके जैसे जीवन की कल्पना में हैं. जबकि आप किसी दूसरे के जीवन की कल्पना में उलझे हैं. दुख की जड़ को जानने में वक्त देने, उसके सुलझने में आस्था, जिंदगी के लिए 'नया' मोड़ हो सकती है.

आपके इस प्रिय कॉलम के 500 से अधिक अंक हो चुके हैं, आपके साथ संवाद, जिंदगी की दूसरी जरूरतों से संघर्ष के बीच मैं आपसे साझा करना ही भूल गया. यह पूरी यात्रा सार्थक संवाद, ईमेल, पत्र और आपके संदेशों से भरी हुई है. सबसे सुखद पहलू मेरे जैसे सामान्य लेखक के लिए यह रहा कि मुझे हिंदी के साथ मराठी और बांग्ला, गुजराती में भी पाठक मिले. जीवन के प्रति नए नजरिए मिले. मेरे सभी अनुवादकों का भी बहुत-बहुत धन्यवाद!

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

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First published: July 10, 2019, 2:23 PM IST
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