जीवनसंवाद : स्नेह की कमी और बच्चे!

बच्‍चों में प्रेम की खुराक कम होती जा रही है. इससे धीरे- धीरे उनमें रूखापन आने के साथ गुस्‍सा बढ़ रहा है. इसे ही 'स्नेह की कमी' कहते हैं.

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 8:18 AM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 8:18 AM IST
गुजरात, अहमदाबाद से सुयश त्रिपाठी लिखते हैं कि इस बार गर्मियों में वह अपने बच्चों को दादा-दादी के पास नहीं ले जा सके. एक नई नौकरी जॉइन करने के कारण उनके लिए ऐसा करना संभव नहीं हो सका. सुयश को लगता है कि दादा-दादी के पास नहीं जाने के कारण इस बार बच्चे प्रेम की उस सालाना खुराक से वंचित हो गए, जो उन्हें हर गर्मियों में मिलती है. इस खुराक के सहारे साल के 11 महीने कट जाते हैं.

बहुत भावुकता, आत्मीयता, प्रेम के साथ हमें यह अनुभव मिला है. शहरों में छोटे छोटे परिवारों के बसने केे बाद सबसे अधिक अन्याय बच्चों के साथ ही हुआ. पहले बच्चों को माता-पिता के साथ दादा-दादी, नाना-नानी का प्यार सरलता से मिल जाया करता था. अब शहरों में रहने वाले अधिकांश बच्चे केेवल माता-पिता के प्रेम के सहारे हैं. हम सूरज की रोशनी की कमी से शरीर में होने वाली विटामिन डी की कमी का इलाज तो कराते हैं, क्योंकि इससे शरीर में कमजोरी आ जाती है और अन्य कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं. हम दादा-दादी, चचेरे, ममेरे भाई-बहनों से दूर रहने के कारण स्नेह की कमी का कोई ठोस उपाय खोजना तो दूर, इसके बारेे में विचार तक नहीं करते.

Jeevan Samvaad
स्नेह की कमी और बच्चे!


बच्चों को दादा-दादी, नाना नानी, रिश्तेदारों से मिलने वाले स्नेह की भरपाई कैसे होगी. गर्मियों की छुट्टियां इसलिए होती थीं, जिससे बच्चे अपने संयुक्त परिवार के साथ समय बिता सकें. धीरे-धीरे गर्मियों में गांव, अपने मूल घर जाना स्थगित होता जा रहा है. बच्चों के लिए समर क्लासेज जरूरी हैं, बड़ोंं को अब छुट्टियां नहींं मिलतीं. अगर मिलती भी हैं, तो वह पहाड़ों और देश-विदेश की यात्रा के काम आती हैं.

बच्चों के लिए यह सारे अनुभव जरूरी हो सकते हैं, लेकिन जिस प्रेम की कमी से वह आज गुजर रहे हैं, उसे आगे चलकर पूरा करना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसी वजह से बच्चों में धीरे धीरे एक किस्म का रूखापन आने लगता है. इसे हम सरल भाषा में 'स्नेह की कमी' कह सकते हैं. अंग्रेेेजी और विज्ञान की भाषा में इसे 'Deficiency of parenting/blessing' कहा जा सकता है. इधर कुछ वर्षों में मनुष्य हर चीज को विज्ञान से समझने की चेष्टा में है. उसे फूल की खुशबू, उसकी गंध, पत्तियों की सरसराहट, उनका संवाद नहीं लुभाता. वह उसके रसायन को समझने में जुटा हुआ है. वह हर चीज को टुकड़े टुकड़े करके, खंड खंड में समझना चाहता है. उसके गहरे विश्लेषण में जाना चाहता है, लेकिन क्या इससे वह फूल को ठीक तरह से समझ पाएगा! क्या वह फूल सेेे प्रेम कर पाएगा! हमारी बुद्धि का वैज्ञानिक होना अलग बात है, प्रेम सेेे दूर होना दूसरी बात. बहुत अधिक विज्ञान के नजदीक जाने के फेर में सहज मनुष्य होने का सुख गंवा बैठे. जापान में इन दिनों रोने का अभ्यास किया जा रहा है. जिससे तनाव के साथ मनुष्य की स्वाभाविकता को भी बचाया जा सके.

दूसरी ओर हम अपने लड़कों को दिन-रात यही कहते रहते हैं कि लड़कियों की तरह रोना बंद करो. बच्चों से हम उन्हें बड़ों से मिलने वाले प्रेम से वंचित करके उनके साथ ही अपना भी नुकसान कर रहे हैं. प्रेम से वंचित बच्चे आगे चलकर हमें क्या देंगे, हम जितना जल्दी समझ पाएं उतना बेहतर होगा. उनके स्नेह की चोरी को रोकना मनुष्य बने रहने की दिशा में सबसे जरूरी काम है. इस चोरी की कोई F.I.R. नहीं होती, लेकिन मनुष्यता को सबसे अधिक नुकसान इससे ही हो रहा है.

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पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

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First published: July 12, 2019, 6:12 PM IST
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