#जीवनसंवाद : अधूरी तमन्ना!

हम अक्सर उन गलियों के दरवाज़े खटखटाते रहते हैं, जिन्हें समय ने जर्जर घोषित कर प्रवेश वर्जित कर दिया है!

दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 8:20 PM IST
दयाशंकर मिश्र | News18Hindi
Updated: July 15, 2019, 8:20 PM IST
राजस्थान के उदयपुर से प्रोफेसर नीता त्रिपाठी लिखती हैं, 'मुझे अधूरी तमन्ना अक्सर परेशान करती है. मैं अतीत के आंगन से जब भी वर्तमान के दरवाजे पर आने की कोशिश करती हूं, अधूरी तमन्ना मानो मेरे पांव खींचकर आंगन में कैद कर देती है!' नीता ने बात तो अपनी कही लेकिन यह मन:स्थिति हममें से बहुत से लोगों की है. हम अक्सर उन गलियों के दरवाज़े खटखटाते रहते हैं, जिन्हें समय ने जर्जर घोषित कर प्रवेश वर्जित कर दिया है!

हमारे मन पर से नियंत्रण खत्म होने की इससे सरल स्थिति दूसरी नहीं है. मन को हमेशा व्यस्त रहना भाता है. वह हमेशाा किसी न किसी कहानी का हिस्सा रहना पसंद करता है. जब तक आप किसी सर्जनात्मक काम से जुड़े हुए हैं मन आपको अतीत के आंगन में ले जाने में सक्षम नहीं होगा. वह आपको अधूरे ख्वाबों की गली में तभी ले जाता है, जब उसे लगता है कि आप वर्तमान से नाराज, असंतुष्ट और दुखी हैं.

एक उदाहरण से इसे समझते हैं. मुझे सीआईएसएफ के लिए एक वर्कशॉप के दौरान एक वरिष्ठ अधिकारी मिले. उन्होंने अपनी समस्या बताई. उनका कहना था कि जब भी घर पर कहासुनी होती है तो पति-पत्नी अतीत के आंगन से 'पत्थर' उठाकर एक-दूसरे को 'घायल' कर देते हैं. उन्होंने बताया कि कुछ दिनों तक इसका असर रहता है, कुछ दिन बाद सब ठीक हो जाता है. लेकिन जब तक इसका प्रभाव रहता है, जीवन नकारात्मकता से भरा रहता है! ऐसे दिन कुछ महीनों केे अंतराल में आते रहते हैं. जीवन की ऊर्जा को कम करते जाते हैं.

Jeevan Samvaad
#जीवनसंवाद अधूरी तमन्ना!


मैंने विनम्रता से कहा, इसका एक ही उपाय है, आप दोनों अतीत का जिक्र करना, झगड़े के दौरान ही नहीं, बल्कि सहज बातचीत में भी बंद कर दीजिए. क्योंकि अक्सर यही होता है हम अतीत की चीज़ों का ज़िक्र आराम से, प्रेमपूर्वक संवाद करते हुए करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी ऐसी घटना का जिक्र होता है, जिसमें किसी खास पक्ष के लिए अप्रिय घटना, अनुभव शामिल हो, तो वहां से संवाद की दिशा ही बदल जाती है. हम अधूरी तमन्ना के जाल में लिपटे हुए अनुभवों से भिड़ जाते हैं.

ऐसा न होकर 'वैसा' हुआ होता, तो कैसा होता! काश, जिंदगी में हम उस मोड़ पर न मुड़े होते. अगर, यह सब कभी-कभी आने वाले 'संचारी भाव' हैं तो कोई चिंता की बात नहीं, लेकिन अगर यह आपका स्थाई भाव बन गया है, तो आपको इसकी चिंता करनी चाहिए.

अधूरी तमन्ना, हसरत, आकांक्षा के प्रति मन में कड़वाहट, गुस्सा जितना कम होगा, जीवन में प्रेम और आत्मीयता उतनी ही प्रबल होगी. इसेे ऐसे समझिए कि अगर तैयारी से, घर से ठीक समय पर निकलने केेे बाद भी सड़क पर भारी जाम के कारण आपकी ट्रेन छूट जाती है, तो आप कितने दिन, कब तक और किस पर गुस्सा निकालते हैं. कुछ दिन तक! उसके बााद क्या आप उस छूटी हुुई ट्रेन से नाराज रहते हैं. नहीं न! क्या उस ट्रेन में आप दोबारा सफर करने से मना कर देते हैं. नहीं, क्योंकि इसमें ट्रेन की कोई गलती नहीं थी.
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अपनी अधूरी तमन्ना को भी उस छूटी हुई ट्रेन की तरह समझिए. जिंदगी को स्टेशन की तरह! हम जिंदगी से बहुत दिन तक नाराज नहीं रह सकते, क्योंकि जैसे गाड़ी पकड़ने के लिए स्टेशन पर आना ही पड़ता है वैसे ही तमाम खराब अनुभव, अधूरे ख्वाब, तमन्ना के बीच सुगंधित जीवन के लिए जिंदगी का दामन थामे रखना जरूरी है. जीवन के प्रति आस्था सबसेे बड़ा मूल्य है. अधूरी तमन्ना से बाहर निकलना परिपक्व जीवन के लिए सबसे बुनियादी काम है. आशा है, प्रोफेसर त्रिपाठी के सवाल के बहाने हम सबके जीवन की बात भी इस संवाद में शामिल हुई होगी!

ईमेल : dayashankarmishra2015@gmail.com
पता : जीवन संवाद (दयाशंकर मिश्र)

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First published: July 13, 2019, 7:31 PM IST
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